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जयसिंह रावत
जनसत्ता 9 जनवरी, 2013: दिल्ली में चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार कांड से भारतीय जनमानस न केवल मर्माहत है बल्कि पिछले तीन हफ्तों से उसका गुस्सा सड़कों पर फूटता रहा है।
निश्चय ही यह एक राष्ट्रीय शर्म का विषय है, लेकिन समाज को दिशा देने वाले राजनेता और आईना दिखाने वाले मीडिया के साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा इस मामले पर जिस तरह की बयानबाजी की जा रही है वह भी कम चिंताजनक नहीं है। क्योंकि कानून भावावेश या दबाव में नहीं बल्कि न्याय की कसौटी पर बनते हैं। मृत्युदंड और अंग-भंग या नपुंसक बनाने की मांग मान ली गई तो उससे समस्या का समाधान तो निकलेगा नहीं, आपराधिक न्याय व्यवस्था (क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम) के प्रति अपराध अवश्य हो जाएगा। दिल्ली की इस घटना के बाद जिस तरह से लोग सड़कों पर उतरते रहे हैं, उससे उनके गुस्से की थाह ली जा सकती है। इस तरह के जघन्य अपराध के खिलाफ समाज को खड़ा होना ही चाहिए; यही एक जीवंत और सजग समाज की पहचान है। लेकिन क्या ही अच्छा होता अगर इसी तरह हमारे देश का मीडिया, पक्ष और विपक्ष के नेता, महिला आयोग समेत विभिन्न संगठन देश के अन्य हिस्सों में होने वाले इसी तरह के जघन्य अपराधों के खिलाफ भी खड़े होते और तमाम बलात्कार-पीड़िताओं के प्रति अपनी एकजुटता प्रदर्शित करते। वास्तव में देखा जाए तो एक ही तरह के अपराधों में दोहरा मापदंड अपने आप में एक नैतिक अपराध है। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। दिल्ली में एक बार दुर्भाग्य से संजय और गीता चोपड़ा नाम के भाई-बहन के साथ इसी तरह की दरिंदगी हुई थी। रंगा और बिल्ला नाम के दो हैवानों ने भाई को पहले मार डाला और फिर नाबालिग बच्ची से कुकर्म कर उसकी भी जीवन लीला समाप्त कर दी। ऐसे जघन्य कुकृत्य के लिए मृत्युदंड स्वाभाविक ही था। बाद में केंद्र सरकार ने इन दो बच्चों के नाम से राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार शुरू कर दिए। उसके बाद भी न जाने कितने मासूमों के साथ इस तरह की हैवानियत हुई होगी, मगर न तो केंद्र सरकार ने उन सबके नाम से पुरस्कार शुरू किए और न ही ऐसे संगठन सड़क पर उतरे। अगर कोई अनपढ़ या नासमझ बलात्कार के मामलों में मृत्युदंड की मांग करे तो बात समझ में आती है। लेकिन अगर इसी तरह फांसी की मांग देश का मीडिया और स्वयं कानून बनाने वाले लोग करने लगें तो आप उसे क्या कहेंगे! कुछ लोग बलात्कारियों को फांसी देने का प्रावधान करने की वकालत कर रहे हैं तो कुछ उन्हें नपुंसक बना डालने की मांग करने लगे हैं। कुछ विद्वान नर-नारी बलात्कारियों के लिए इंजेक्शन तैयार करने की राय दे रहे हैं तो कुछ अंगभंग की वकालत भी कर रहे हैं। कुल मिला कर देखा जाए तो इतना गंभीर मामला मजाक बनता जा रहा है। अब इसी से समझा जा सकता है कि ऊंची-ऊंची हांकने वाला हमारा सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व ऐसे मामलों में भी कितना गंभीर है! लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता ने भी बलात्कारियों के लिए मृत्युदंड की वकालत की है। लेकिन वे भूल गर्इं कि 1999 में जब लालकृष्ण आडवाणी गृहमंत्री थे तो उन्होंने भी कानून को कठोरतम बनाने की घोषणा की थी। अगर कठोरतम कानून ही एक समाधान होता तो यह काम सुषमा स्वराज की अपनी पार्टी के शासनकाल में क्यों नहीं हुआ। विडंबना देखिए कि एक तरफ तो आप पकड़े गए अधिकतर बलात्कारियों को एक दिन की भी सजा नहीं दिला पा रहे हैं और बात मृत्युदंड की कर रहे हैं। जिन लोगों को अदालत मृत्युदंड देती भी है उन्हें हमारी व्यवस्था फांसी के तख्ते तक नहीं पहुंचा पा रही है। अगर इसी तरह बलात्कार के लिए मृत्युदंड की व्यवस्था हो गई तो वह कानून के साथ मखौल ही होगा। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार , देश भर की अदालतों में वर्ष 2010 के शुरू में 89,707 बलात्कार के मामले विचाराधीन थे। इनमें से उस साल 10,475 मामलों में आरोपी दोषमुक्त हो गए और मात्र 3,788 मामलों में बलात्कारियों को सजा हो पाई। इस प्रकार हमारी कानूनी व्यवस्था सिर्फ 26.55 प्रतिशत मामलों में सजा दे पाई और 73.44 प्रतिशत मामलों में आरोपी दोषमुक्त होकर छूट गए। यही नहीं, उस साल के अंत में अदालतों में 75,295 मामले लंबित पड़े थे। इस प्रकार समय से न्याय न मिलने पर भी पीड़िताएं न्याय से वंचित रह गर्इं, क्योंकि न्याय की ही भावना है कि ‘जस्टिस डिलेड, जस्टिस डिनाइड’, यानी अगर न्याय में विलंब होता है तो न्यायार्थी न्याय से वंचित हो जाता है। अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार, विभिन्न राज्यों और संघशासित प्रदेशों की पुलिस के पास जनवरी 2010 में बलात्कार के कुल 33436 मामले विवेचनाधीन थे। इनमें से एक मामला वापस हुआ तो चौवालीस में पुलिस ने जांच स्वीकार नहीं की। इनके अलावा पुलिस ने 1681 बलात्कार के आरोप फर्जी पाए, जबकि 18654 मामलों में ही पुलिस अदालत में आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल कर सकी। साल के अंत में पुलिस के पास 11980 मामले लंबित पड़े थे या आरोपियों के खिलाफ पूरे साल भर तक कोई
कार्यवाही नहीं हो सकी थी। मतलब यह कि पुलिस एक साल में मात्र 79 प्रतिशत मामलों को न्याय के लिए अदालत में पेश कर सकी। बलात्कार ही नहीं, हमारी आपराधिक न्यायिक व्यवस्था में हत्या जैसे अन्य जघन्य अपराध के मामलों में भी कानून निरीह नजर आता है। कानून के छेदों के कारण बलात्कारी ही नहीं, हत्यारे भी साफ बच जाते हैं और दिन-प्रतिदिन उनके हौसले बुलंद होते जाते हैं। ऐसी स्थिति में बलात्कारियों को मृत्युदंड की मांग करना भावावेश ही है। दुनिया में जहां मानवाधिकारों के तर्क पर मृत्युदंड का विरोध हो रहा है वहीं भारत में हर मामले में मृत्युदंड की मांग उठ रही है। लगता है कि हमारा देश मध्यकाल में जा रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय से मृत्युदंड उन्मूलन के प्रयास लगातार होते रहे हैं। 1977 में छह देशों ने इसका निषेध किया था। वर्तमान स्थिति यह है कि पंचानवे देशों ने मृत्युदंड को अलविदा कह दिया है, नौ देशों ने इसे अन्य सभी अपराधों के लिए निषेध किया है, सिवाय विशेष परिस्थितियों के, और पैंतीस देशों ने पिछले दस वर्षों में इस सजा के लिए किसी को आरोपित नहीं किया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, वर्ष 2009 में अठारह देशों ने कम से कम 714 मृत्युदंड दिए हैं और उन्हें क्रियान्वित भी किया है। हाल ही में कसाब को तो फांसी हो गई, मगर देश में अफजल गुरु और राजोआणा जैसे अब भी 401 ऐसे कैदी हैं जिन्हें फांसी की सजा सुनाई गई है। इनमें से दस फीसद कैदियों ने ही राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिकाएं दायर की हैं, जिनका निपटारा नहीं हो पाया है। इनमें पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के दोषी तीन कैदी भी शामिल हैं। भारत में 1975 से 1991 के बीच कम से कम चालीस लोगों को फांसी के फंदे पर लटकाया गया था। लेकिन तमिलनाडु के सलेम में 27 अप्रैल 1995 को सीरियल किलर आटो शंकर को फांसी देने के नौ साल बाद अगस्त 2004 में कोलकाता में धनंजय चटर्जी को फांसी के फंदे पर लटकाया गया। उसके बाद मुंबई आतंकी हमले के दोषी पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब को फांसी पर लटकाया जा सका। भारतीय दंड संहिता की धारा 302 असल में 307 के मुकाबले ज्यादा संगीन अपराध के लिए लागू होती है। धारा 302 हत्या के मामले में प्रभावी होती है, जबकि धारा 307 हत्या के प्रयास की घटनाओं में। धारा 302 के मामलों में पीड़ित गवाही के लिए जिंदा नहीं रह पाता है, जबकि हत्या के प्रयास वाली दफा 307 में हिंसा-पीड़ित व्यक्ति गवाही के लिए स्वयं मौजूद रहता है। पिछले रिकार्ड देखें तो हत्या के प्रयास के मामलों में सजा की दर हत्या के मामलों से कहीं अधिक नजर आती है। अगर बलात्कार के सभी मामलों में मृत्युदंड का प्रावधान कर दिया गया तो बलात्कारी को मृत्युदंड मिले या न मिले, मगर पीड़िता की मृत्यु तय मानी जा सकती है। बलात्कारी सबूत मिटाने के लिए पीड़िता के जीवन को ही मिटा देंगे। भावनाओं में बह कर कानून नहीं बनाए जा सकते। सड़क और संसद की भाषा में भी फर्क होना चाहिए। जो कानून भावावेश में बनेंगे उनसे न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती। अगर सिर्फ कानूनों को कठोर बना कर समाज को अपराध-मुक्तकिया जा सकता तो मृत्युदंड के भय के कारण समाज में हत्या जैसे जघन्य अपराध न होते। यौन अपराध क्यों बढ़ रहे हैं, इस पर समाजशास्त्रियों और जागरूक नागरिकों को मंथन करने की जरूरत है। स्त्री देह का न केवल फिल्मों और टीवी चैनलों पर बेजा इस्तेमाल हो रहा है, बल्कि उनकी देखादेखी कर फैशन का नंगा नाच खुलेआम देखा जा सकता है। इस तरह के फैशन शो का आप अगर विरोध करते हैं तो आपको मध्ययुगीन सोच या विकृत सोच से ग्रसित होने की पदवी दे दी जाती है। वर्तमान बाजारीकरण ने एक तरफ स्त्री को यौन वस्तु के रूप में बदलने में पूरी ताकत लगाई है, दूसरी तरफ पुरुष की यौनेच्छा को वह बराबर उकसाने में लगा रहता है। समाज अगर सचमुच में स्त्रियों के प्रति बढ़ते बलात्कार और यौन हिंसा से चिंतित है, तो उसे स्त्री को यौन वस्तु के रूप में दिखाने वाली हर एक चीज का विरोध करना पड़ेगा। गौर से देखने पर पाएंगे कि पूरे माहौल में ‘सेक्स’ घुला हुआ है। अखबार, पत्रिकाओं और टीवी में आने वाले विज्ञापन, फिल्में, अश्लील गाने, साहित्य, समाचार, फोटो, फिल्मी संवाद, इंटरनेट हर जगह स्त्री को सबसे ‘सेक्सी’ रूप में परोसा जा रहा है। अब तो अगर किसी लड़की की तारीफ करनी है तो उसे सेक्सी कहा जा रहा है। बीते वर्ष इंटरनेट पर पूनम पांडे और ‘जिस्म- 2’ की हीरोइन सनी लिओन को लोगों ने सबसे ज्यादा ढूंढ़ा है। सनी लियोन की पोर्न छवि को भुना कर अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए एक चैनल उसे अपने एक कार्यक्रम में ले आया था। ऐसी परिस्थितियों में अगर आप केवल कानून से बलात्कार रोकने की सोच रहे हैं तो भूल कर रहे हैं। कानून के मोर्चे पर मुस्तैदी, पुलिस सुधार और त्वरित अदालती कार्यवाही के साथ-साथ हमें स्त्रियों के प्रति समाज की मानसिकता बदलने के लिए भी अभियान चलाना होगा।
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