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Tuesday, 08 January 2013 10:41 |
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मधु पूर्णिमा किश्वर जनसत्ता 8 जनवरी, 2013: राजधानी में तेईस साल की युवती के साथ वहशियाना सामूहिक बलात्कार के बाद उपजे देशव्यापी रोष और विरोध ने अपूर्व जनमत तैयार किया है।
हालांकि आंदोलनकारी बलात्कार के खिलाफ कड़े कानून बनाने की मांगको लेकर सड़कों पर उतरे, पर उनका मंतव्य यह जाहिर करना भी था कि सरकारी तंत्र पर उनका एतबार नहीं रहा। खास तौर पर सियासी वर्ग, पुलिस, कानून और अदालत पर उनका भरोसा नहीं है। शायद इसीलिए शासन की कई पावन घोषणाओं के बावजूद यह आंदोलन काबू में नहीं आया। सरकार की घोषणाओं में बलात्कार संबंधी कानून में बदलाव के लिए आयोग की नियुक्ति और विशेष कार्यबल बनाने के अलावा बलात्कारियों के रासायनिक बधियाकरण, सजाए-मौत जैसे सुझाव शामिल हैं। इसके अलावा यौन हिंसा के हर मामले में प्राथमिकी दर्ज करने को वैधानिक बनाने, विशेष त्वरित अदालतों के गठन की बातें भी कही गई हैं। फिलहाल आम धारणा यही है कि यौन अपराधों से जुड़ी हर शिकायत दर्ज करने के लिए पुलिस को कानूनी तौर पर बाध्य होना चाहिए। इसके अलावा बलात्कार को गैर-जमानती जुर्म बनाना चाहिए और अपराधियों को लंबी और कड़ी से कड़ी कैद का प्रावधान हो। यह मांग भी जोरदार तरीके से उठाई गई है कि बलात्कार के मामलों में सबूत की जिम्मेदारी अभियुक्त पर डाली जाए। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने इस दिशा में खास पहल की है। उन्होंने बलात्कार के अपराधों पर अंकुश के लिए तेरह सूत्री योजना पेश की है। इसमें यौन अपराधियों पर गुंडा एक्ट लगाने जैसा कदम भी है। इसी सिलसिले में सामूहिक बलात्कार के हादसे से उबरी एक बहादुर आंदोलनकारी सुनीता कृष्णन ने महत्त्वपूर्ण मांग रखी है कि निचली अदालत में बलात्कारी को कसूरवार ठहराए जाने के बाद, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में उसकी अपील मंजूर न की जाए। याद रहे, मथुरा नाम की युवती के बलात्कार के बाद महिला संगठनों के भारी दबाव के कारण 1983 में बलात्कार कानून में संशोधन किया गया था। इस कानून के तहत कम से कम सात साल तक कैद का प्रावधान है और यह सजा उम्रकैद तक हो सकती है। इसमें हिरासत में हुए बलात्कार के लिए कम से कम दस साल की कैद का प्रावधान है। मथुरा के साथ एक थाने में बलात्कार किया गया था। जाहिर है, इस मौजूदा कानून को एकदम ‘नरम’ नहीं कहा जा सकता। महिला संगठनों के दबाव के बाद ही सरकार ने दहेज कानून को सख्त बनाया था और बेकसूर होने के लिए सबूत देने का भार आरोपितों पर डाल दिया गया। पर कानून में बदलाव के बाद आज क्या कोई दावा कर सकता है कि दहेज के कांड थमे हैं। बल्कि इस कानून के बेजा इस्तेमाल के मामले देखने को मिले हैं। पुलिस और वकीलोंं के लिए तो यह कानून बेकसूरों को फंसाने और उगाही का जरिया बन गया। आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कानूनी कायदों और हकीकत के बीच खाई और बढ़ गई है। जब कानून अपना वादा और मकसद पूरा करने में नाकाम हो जाता है तो देश के लोग यह मानने लगते हैं कि कानून उनके किसी काम का नहीं है। इसमें काफी खामियां हैं और इसका फायदा अपराधी उठा ले जाते हैं। दरअसल, यह समस्या वास्तविक पीड़ित के मामले दर्ज करने में पुलिस की आनाकानी तक महदूद नहीं है। बल्कि बेकसूर लोगों के खिलाफ फर्जी मामले दर्ज कर उन्हें ब्लैकमेल करने से भी जुड़ी है। अक्सर पुलिस लोगों पर केस वापस लेने का दबाव डालने और उन्हें धमकाने से भी बाज नहीं आती। पुलिस के इस रवैए को कई निजी अनुभवों से साबित किया जा सकता है। इस कटु अनुभव से मेरा भी पाला पड़ चुका है। उसघटना का जिक्र करना चाहती हूं जो पुलिस-मुजरिम सांठगांठ की नजीर कही जा सकती है। घटना बीते साल जुलाई की है। दक्षिण दिल्ली वासी मेरे भाई के घर आधी रात दो पुलिस वाले एक शातिर ब्लैकमेलर के साथ आ धमके। आरके पुरम साउथ कैंपस थाने के एक सब इंस्पेक्टर और एक सिपाही ने मेरे भाई को बताया कि वे राहुल डेविड की शिकायत पर उन्हें गिरफ्तार करने आए हैं। डेविड ने शिकायत में उस पर अप्राकृतिक मैथुन का आरोप लगाया है, इसलिए दफा 377 के तहत उनकी गिरफ्तारी होगी और इस अपराध में मय जुर्माना दस साल तक की कैद हो सकती है। दरोगा ने कहा कि डेविड ने थाने में फोन कर उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। उसका आरोप था कि मेरा भाई उसे मुनीरका बाजार में बीकानेरवाला के बाहर मिला और एक आटो में बैठा कर शांतिनिकेतन के पार्क में ले गया और जबरन दुराचार किया। भाई ने कई सबूतों के साथ दरोगा को बताने की कोशिश की वह कथित वारदात के वक्त घर में था। लेकिन पुलिस ने कहा कि वह चुपचाप थाने नहीं चला तो जबरन घसीट कर ले जाएंगे। इसी बीच भाई ने मुझे फोन कर सारा माजरा बताया। जब मैंने दरोगा से फोन पर बात की और बेवक्त घर आ धमकने की बात की तो उसने उलटा धमकाने वाले लहजे में कहा कि बेहतर है आप इस मामले में टांग न अड़ाएं, नहीं तो परेशानी में पड़ जाओगी। खैर, मैं अपने एक वकील मित्र को लेकर आरके पुरम थाने पहुंची। लेकिन पुलिस अपने नापाक इरादे से हिलने को तैयार नहीं थी। हालांकि राहुल के दागी और जुर्मदार अतीत से पुलिस भी वाकिफ थी और यह भी साफ था कि उसने फर्जी कहानी गढ़ी है। लेकिन दरोगा इस मामले को ले-देकर सुलटाने पर अडिग था। जब मैंने पुलिस वालों से पूछा कि वे डेविड की शिकायत की पड़ताल क्यों नहीं करना चाहते, तो
सिपाही ने कहा कि ‘मैडम जी इन मानवाधिकार वालों ने पुलिस के हाथ बांध रखे हैं और इसकेपास अधिकार नहीं हैं। हमारे पास कोई चारा नहीं है। हमें उसकी शिकायत पर मामला दर्ज करना ही होगा, वरना हमें ड्यूटी में कोताही पर कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।’ इतना ही नहीं, पुलिस ने मेरे भाई को धमकीदी कि अगर उसने पैसा नहीं दिया तो गैर-जमानती अपराध का मामला झेलना पडेÞगा और उसे नौकरी तक से हाथ धोना पड़ सकता है। हालांकि भाई अपनी जिद पर कायम था कि वह केस को आगे बढ़ाएगा। पर हमारे वकील मित्र ने बताया कि ब्लैकमेल की सारी पटकथा साजिशन तैयार की गई है। इसमें दोनों पुलिसियों और डेविड की मिलीभगत है। बहरहाल, मैंने अपने भाई को समझाया और कहा कि पुलिसियों को पैसा देकर मामला सुलटाने में ही फिलहाल भलाई है। इस मौके पर पुलिसिया दबाव के आगे झुकना मैंने इसलिए भी ठीक समझा, क्योंकि मैं अपने संगठन मानुषी के जनहितकारी अभियान को लेकर राजनीतिक माफिया की नाराजगी पहले ही झेल रही थी। हमारा संगठन पुलिस की निगाहों में भी चढ़ा हुआ था। यहां तक कि हमारे एक अहम सदस्य पर ‘बलात्कार की कोशिश’ का आरोप भी लगा था। मेरे भाई के लिए नतीजा और भी पुरहौल हो सकता था। वह सरकारी नौकरी में था। महज एक दिन की जेल से उसे मुअत्तली झेलनी पड़ती और जिल्लत का तो कोई अंत नहीं। पैसा लेने के बाद दरोगा ने डेविड से शिकायत वापस करवा ली। लेकिन इस घटना से हमारे परिवार को गहरा संताप झेलना पड़ा, क्योंकि हममें से किसी ने पहली बार घूस दी थी। पुलिस की ओर से मामला ‘सुलटाने’ से यह बात मेरी समझ में आ गई कि अप्राकृतिक मैथुन और यौन दुराचार कानून के बेजा इस्तेमाल का यह एकमात्र मामला नहीं हो सकता। इसलिए मैंने शिकायत दर्ज कराने का फैसला किया। पुलिस उपायुक्त के रहमोकरम से 23 जुलाई को हमारी शिकायत दर्ज कर ली गई। मंैने अपनी शिकायत में दो पुलिसियों की संदिग्ध भूमिका का जिक्र किया था। लेकिन प्राथमिकी में इसका उल्लेख नहीं था। मैंने डीसीपी से कहा कि डेविड का साथ देने वाले पुलिसियों की भूमिका की भी जांच करनी चाहिए। लेकिन उन्होंने किन्हीं कारणों से असमर्थता जताई। यह बताने की जरूरत नहीं कि राहुल डेविड को जल्द जमानत मिल गई। और कोई अचरज नहीं कि वह पुलिस के साथ मिल कर पुराने धंधे में लग गया हो। मेरी समझ में यह बात भी आ गई कि कानून के बेजा इस्तेमाल का यह धंधा बड़े पैमाने पर चल रहा होगा। बलात्कार के खिलाफ कड़े कानून की मांग के साथ फौरी प्राथमिकी और कथित बलात्कारी को जमानत से वंचित करने की बात की जाती है तो यह आशंका लाजिमी है कि इस प्रावधान से फर्जी मामलों और पुलिसिया उगाही का रास्ता खुल जाएगा। अगर यौन हिंसा के अभियुक्तों पर गुंडा एक्ट लगाने और बिना जमानत एक साल की हिरासत की मांग कानून में बदल गई तो निरंकुश पुलिस के हाथों कानून के मनमाने इस्तेमाल को रोकना मुमकिन नहीं होगा। हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि बलात्कार के झूठे आरोप का निशाना देश के सबसे ताकतवर घराने के नेता राहुल गांधी भी बन चुके हैं। पर हर किसी के पास राहुल जैसी कुव्वत नहीं कि वह बिना जमानत के जेल से बाहर रह सके। भयानक हिंसा के अभियुक्तों पर खुद के बेकसूर साबित होने का साक्ष्य देने के कानून का दुरुपयोग एकदम मुमकिन है। दहेज हत्या के मामलों में बेकसूर लोगों को फंसाने की नजीर सामने आती रही है।इससे साबित होता है कि एक ईमानदार, पेशेवराना दक्षता केसाथ की जानी वाली पड़ताल का कोई विकल्प नहीं है। यहां तक कि आतंकवाद से जुड़े मामलों में भी पुलिस ने जमानत न देने के कानून का गलत उपयोग किया। इस कारण तमाम निर्दोष लोगों को विपदा झेलनी पड़ी और असली दहशतगर्द छुट्टा घूमते रहे। इन मांगों में सबसे खतरनाक है- निचली अदालत में दोषी करार दिए गए अभियुक्त को उच्च न्यायालय और सर्वोच्चन्यायालय में अपील करने से वंचित रखा जाए। जाहिर है, इस मांग का आशय बुरा नहीं है। अपील के अधिकार और सुस्त न्याय व्यवस्था का फायदा बलात्कारी उठाते ही हैं और कई बार पीड़ित पर दबाव बनाते हैं। इसके बावजूद अभियुक्त को इस हक से महरूम नहीं किया सकता। आतंकवादी हमलों और सामूहिक हत्याकांड में शामिल लोगों को भी अपील का अधिकार मिला हुआ है। सिर्फ महिलाओं पर जुल्म करने वाले अपराधियों के लिए ऐसे कानून की मांग करना गलत परंपरा की शुरुआत करना है। असल में हमारी अदालतें बलात्कार पीड़ितों को इंसाफ के मामले में ही नाकाम नहीं साबित हुई हैं। वे जातीय-सांप्रदायिक जनसंहार और अन्य अपराधों में भी न्याय देने में विफल रही हैं। बलात्कार के मामलों में विशेष त्वरित अदालतों की मांग का भी औचित्य नजर नहीं आता। जिस तरह नियमित थानों में भ्रष्टाचार के रहते महिलाओं के लिए विशेष पुलिस थाने कोई चमत्कार नहीं कर सकते, उसी तरह नियमित अदालतें नाकारा रहती हैं तो त्वरित अदालतें सांकेतिक ही रह जाएंगी। वैसे किसी भी मामले में ‘फास्ट ट्रैक’ प्रावधान हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में नहीं है। होना तो यह चाहिए कि जरूरी प्रक्रिया को खत्म किए बिना सभी मुकदमों का निपटारा त्वरित हो। बेशक, बलात्कार कानून में सुधार की जरूरत है। लेकिन सिर्फ ‘कड़ी से कड़ी’ सजा के प्रावधान से कुछ खास हासिल नहीं होगा। अगर एक संस्था के तौर पर पुलिस में पूरी तरह रद्दोबदल नहीं किया जाता तो कानून के दुरुपयोग का दायरा ही बढ़ेगा। अदालती प्रक्रिया को आसान और कानून को और तर्कसम्मत बना कर ही त्वरित इंसाफ संभव होगा।
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Last Updated on Saturday, 12 January 2013 12:59 |