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योगेंद्र यादव जनसत्ता 7 जनवरी, 2013: जंतर मंतर से दूर दो छवियां मेरे मन में अटक गई हैं। पहली छवि मेरी कॉलोनी की लड़कियों और महिलाओं के छोटे-से प्रदर्शन की है।
किसी के हाथ में मोमबत्ती है, किसी के हाथ में तख्ती। पल भर को हैरत हुई, क्योंकि इन महिलाओं को मैंने अब तक सात-सबेरे बच्चों को स्कूल-बस में चढ़ाते, जाड़े की धूप में स्वेटर बुनते या फिर दोपहर बाद के किसी भी वक्त ठेले पर सब्जी बेचने वाले से आलू-प्याज के मोल-भाव करते देखा था और वे ही महिलाएं आज मेरे सामने एक नए रूप में थीं- कुछ ‘क्षुब्ध हृदय है बंद जुबां’ की मूर्ति, तो कुछ मोमबत्ती की लौ में अपने आक्रोश को आवाज देती हुई। दूसरी छवि दिल्ली से पचास कलोमीटर दूर सोनीपत शहर में लगे दर्जनों फलैक्स बोर्ड की है- ‘भाई गोपाल कांडा को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं’। शुभकामनाएं पेश करते फ्लैक्स-बोर्ड महिलाओं पर हिंसा के खिलाफ जगी राष्ट्रीय चेतना को ठेंगा दिखा रहे थे। दोनों छवियां पिछले दिनों के घटनाक्रम की संभावनाओं और सीमाओं को रेखांकित करती हैं। इंडिया गेट और जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन देश के बदलते मिजाज के परिचायक हैं। पिछले डेढ़-दो साल में अण्णा आंदोलन की बदौलत देश का मनोभाव बदला है। बरसों से जमा गहरा असंतोष पिघला है- संकल्प से जुड़ा सकारात्मक क्रोध उभरा है और एक छोटी-सी आशा पैदा हुई है। सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद अपना-अपना प्रतिरोध दर्ज कराने वाले इन लोगों को किसी संगठन ने नहीं लामबंद किया था, यह खुद-ब-खुद आ जुटने वाली भीड़ थी और भीड़ का यह स्वरूप उलझन में डाल रहा है। प्रतिरोध की आवाज बुलंद करने वाली भीड़ के लिए एक तरफ प्रशंसा का भाव है कि ये जगे हुए लोग हैं, इन्हें जगाना नहीं पड़ा, तो दूसरी तरफ मिजाज आलोचना का भी बन पड़ा है कि आखिरकर यह एक भीड़ ही थी, ऐसी भीड़ जिसके पास अपने प्रतिरोध के पक्ष में कहने के लिए न तो कोई साफ एजेंडा था, न ही कोई नेता; और फिर इस भीड़ ने कुछ उपद्रवी तत्त्वों को अपने मन की कर ले जाने की छूट दी। भीड़ जिस वजह से जुटी उसकी प्रशंसा और भीड़ के जुटने के बाद जो नतीजे सामने आए उसकी आलोचना- यह एक पाखंड ही तो है। हम चाहते हैं कि राजनीति हो और यह भी चाहते हैं कि मुख्य दरवाजे से न हो। लेकिन जरा ठहरें, यह भी सोचें कि जंतर मंतर से लेकर दिल्ली की रिहायशी कॉलोनियों तक आ जुटने वाले लोगों के भीतर क्या किसी नई किस्म की राजनीति की तलाश है? इस जनाक्रोश की अधपकी व्याख्याएं हुई हैं। जो इस जनाक्रोश के पक्ष में खड़े हैं वे कह रहे हैं कि इस जनाक्रोश के जरिए एक नए किस्म के नागरिक का उदय हुआ है- एक ऐसा नागरिक जो आंदोलनधर्मी है- जागरूक, संकल्पवान और आक्रोश से भरा हुआ। और, यह नागरिक राजनीतिक सत्ता से जवाब मांग रहा है। इस नागरिक के लिए स्वागत-भाव रखने वाले व्याख्याकार अपनी पसंद के हिसाब से उसे अलग-अलग नाम दे रहे हैं। कोई इस नागरिक को आर्थिक तरक्की के पक्ष में खड़ा ‘महत्त्वाकांक्षी’ कह रहा है तो कोई समतामूलक समाज का हमराही; और इस नागरिक से अपने सपनों के नए भारत के निर्माण की उम्मीद लगाई जा रही है। लेकिन रूमानियत से भरी इस तस्वीर की तरफ आलोचक अंगुली उठा कर कहते हैं, और ठीक ही कहते हैं, कि प्रतिरोध में उठ खड़े हुए इन लोगों में ज्यादातर तो शहराती हैं, मध्यवर्ग मतलब खाते-पीते घरों के हैं और इन लोगों में मर्दों की तादाद औरतों से बहुत-बहुत ज्यादा है। आलोचक यह भी याद दिलाने से नहीं चूकते कि दिल्ली में उमड़ा जनाक्रोश स्वत:स्फूर्त भले रहा हो लेकिन लोग दिनों तक डटे और टिके रहे तो इसमें कुछ मीडिया, खासकर टेलीविजन के लाइव कवरेज की भी मेहरबानी थी। इन आलोचनाओं में कुछ तो सच्चाई है लेकिन ऐसी आलोचनाएं मूल बात से मुंह फेर लेती हैं। मूल बात यह है कि शहरी सड़कों और गलियों में पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ और अब महिलाओं पर होने वाली हिंसा के खिलाफ उमड़ा जनाक्रोश एक नई किस्म की राजनीति की शुरुआत है। यह राजनीति हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक खाई को पाट रही है। जिन शिकायतों के लिए व्यवस्था के भीतर कोई सुनवाई नहीं है, यह राजनीति उन शिकायतों को मुहावरा दे रही है। जो आंदोलनधर्मी नागरिक हम देख रहे हैं, बेशक वह अपने परिवेश से शहराती है लेकिन उसका सामाजिक नजरिया शहराती संकीर्णता के दायरे में कैद नहीं। यह राजनीति हमारे समय की उपज है, पहले से खींची हुई लकीर की फकीर नहीं। यह नई राजनीति देश के लोकतांत्रिक जीवन में एक नई किस्म की हलचल पैदा कर रही है। एक तरफ लोकतंत्र की जड़ों को गहरे जमाने का अवसर भी इस राजनीति में मौजूद है तो दूसरी तरफ व्यवस्था को अस्थिर बनाने वाले तत्त्व भी इसमें हैं। जाहिर है, सारा कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि चालू राजनीति इस नई स्थिति से किस खूबी या खामी के साथ निबटती है। शहरी-गंवई, धनी-निर्धन या फिर शिक्षित-अशक्षित जैसे बने-बनाए चौखटों से बाहर जाकर हमें इस नए ‘आंदोलनधर्मी नागरिक’ को समझना होगा। यह अपना संकीर्ण हित साधने के लिए निकले चंद
लोगों का समूह नहीं है। यह मंडल-विरोधी हुजूम से अलग है। जनाक्रोश के इस उभार में जो लोग शामिल हुए वे स्वार्थ के दायरे से बाहर जाकर सोच रहे थे, वे अपनी जिंदगी और उसकी समस्याओं को शेष समाज की जिंदगी और समस्याओं से जोड़ कर देख रहे थे। बेशक इन लोगों में त्याग की वह भावना नहीं जैसी कि गांधीवादी या नक्सलवादी ढंग की राजनीति मांग करती है और जिस भावना के वशीभूत होकर शेष भारत से अपनी आत्मा को जोड़ने के लिए कोई सत्याग्रही मध्यवर्गीय जिंदगी की सुख-सुविधाओं से मुंह मोड़ लेता है। नया ‘आंदोलनधर्मी नागरिक’ अपने आत्म के विस्तार की राजनीति करने उतरा है और यह विस्तार कहां तक जाएगा यह अभी अनिश्चित है। यह नई राजनीति बीसवीं सदी की विचारधाराओं के गढ़े-गढ़ाए जुमले नहीं बोलती। इस जनाक्रोश की तख्ती पर भले लिखा हो ‘हमें इंसाफ चाहिए’, लेकिन यह इंसाफ न तो पश्चिमी उदारवादी परंपरा का है न ही समाजवादी या नारीवादी ढर्रे का। इसलिए, इस जनाक्रोश या उसकी मांगों को जांचना हो तो विचारधाराओं की बनी-बनाई शब्दावली बहुत मददगार साबित नहीं होने वाली। और याद रहे कि इस जनाक्रोश का स्वर सिर्फ नकार का नहीं है। भ्रष्टाचार या फिर महिलाओं पर होने वाली हिंसा के खिलाफ उठ खड़ा होने वाला जनाक्रोश एक विकल्प की मांग कर रहा था, भले ही विकल्प की यह मांग ‘बलात्कारियों को फांसी दो’ जैसी अतिरेकी भाषा में हुई हो। इस जनाक्रोश को विकल्प की तलाश थी- एक शुभत्व की। यह राजनीति किसी दिवास्वप्न (यूटोपिया) को छूने के बदले संभावनाशील शुभ को सच में बदलने की कोशिश करती है। इस राजनीति की मांग है कि हम व्यक्ति बनाम समूह के चौखटे से बाहर जाकर सोचें। महिलाओं पर होने वाली हिंसा के खिलाफ जुटी भीड़ पर किसी जाति या समुदाय का ठप्पा नहीं लगा था। विरोध-प्रदर्शन में जुटने वाले लोग किसी स्थापित राजनीतिक संगठन, पार्टी या उनके किसी मोर्चे सदस्य नहीं थे। बेशक, विरोध-प्रदर्शन में जुटने वाले लोग चाह रहे थे कि उनके आसपास राजनेता क्या उनकी छाया तक न दिखाई दे। लेकिन लोगों की इस चाह के भीतर यह तलाश छिपी हुई थी कि बने-बनाए राजनीतिक संगठनों से काम नहीं चलने वाला, राजनीति के मोर्चे पर कुछ नया होना चाहिए। बहरहाल, विरोध-प्रदर्शन करने वाले लोग हर किस्म की समुदायगत पहचान से मुक्त हों- ऐसा भी नहीं। आखिर इस विरोध-प्रदर्शन के केंद्र में लैंगिक पहचान तो थी ही, और लैंगिक अस्मिता कई अन्य अस्मिताओं की स्वीकृति का प्रतीक है। यह अराजक विरोध-प्रदर्शन नहीं था जो हर तरह के संगठन से मुक्ति चाह रहा हो। इस नई राजनीति की आत्मा नई काया को तलाश रही है। मौजूदा दलीय राजनीति में आमूलचूल बदलाव खोज रही है। बेशक इस नएपन के साथ कुछ आशंकाएं भी जुड़ी हैं। मुंहबाए खड़े टीवी के इशारे पर आक्रोश प्रदर्शन और हाथोंहाथ इंसाफ चाहने वाली भीड़ कोई शुभ लक्षण नहीं। ऐसे विरोध-प्रदर्शनों को अधिनायकवादी प्रवृत्ति के कुछ नेता अपनी मुट््ठी में कर सकते हैं। विरोध-प्रदर्शन की ऊर्जा प्रदर्शनकारियों के संकीर्ण स्वार्थों के दायरे में कैद हो सकती है। ये प्रदर्शन सरकार को लोक-लुभावन, सस्ते और फिजूल कदम उठाने को बाध्य कर सकते हैं। यह डर तो है ही कि आंदोलन की यह हवा अपने आप गायब हो जाएगी। जमीन पर संघर्ष के निशान तो बचेंगे नहीं, तिस पर यह भी हो सकता है कि अस्त-व्यस्त होकर विरोध-प्रदर्शन बगैर अपनी विरासत छोड़े, समाप्त हो जाय। इससे आगे, जमीन तोड़ने का जनांदोलनों का काम और कठिन हो जाएगा। अधपकी और अधबुनी यह नई राजनीति फिलहाल व्यवस्था की अलस तंद्रा तोड़ने के लिए उसे झकझोरने का काम कर रही है। सत्ता के सुचिक्कन और जमे-जमाए समीकरणों में इसने खलल पैदा की है, भले जिम्मेवारी का संस्कार न बना हो। अण्णा हजारे के अनशन ने थोड़े समय के लिए ही सही, सरकार और राजनीतिक दलों को जिस तरह घुटने टेकने पर मजबूर किया, वैसा हाल का कोई बड़ा जनांदोलन भी नहीं कर पाया था। अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने घोटालों का पर्दाफाश किया और इस पर्दाफाश ने सत्ता-वर्ग को जितना बेचैन किया उतना हाल की किसी संसदीय बहस ने नहीं। ठीक इसी तरह, महिलाओं पर होने वाली हिंसा के खिलाफ हाल के जनाक्रोश ने पुलिस और उसके राजनीतिक आकाओं को जिस किस्म से जवाब देने के लिए मजबूर किया, वैसा दशकों तक चले महिला-अधिकारों या फिर मानवाधिकारों से जुड़े आंदोलन नहीं कर सके थे। शायद सत्ताधारी वर्ग की राजनीतिक सूझ इतनी कच्ची थी कि इस आंदोलन की ताकत वक्त से पहले ही भारी-भरकम जान पड़ने लगी। ऐसे विरोध-प्रदर्शनों के देर तक ठहरने की क्षमता, दमखम और दिशा के बारे में अभी से अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि कितनी तेजी और समझदारी से यह नई ऊर्जा हमारे लोकतंत्र के भीतर दलगत राजनीति के दलदल की सफाई कर पाती है। बहरहाल, एक बात साफ है- भारत की लोकतांत्रिक राजनीति के सामने विकल्पों की तलाश में लगे जनाक्रोश का अश्वमेधी घोड़ा खड़ा है, और सत्तावर्ग अब अपनी मनमर्जी की चाबुक फटकार कर उसे अपने रथ में नहीं हांक सकता। सवाल यह है कि यह घोड़ा स्थापित राजनीति के स्थापित विकल्पों की राह लग जाएगा या कि एक वैकल्पिक राजनीति की डगर बनाएगा।
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