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रुपहले परदे की चकाचौंध में PDF Print E-mail
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Saturday, 05 January 2013 13:04

पुण्य प्रसून वाजपेयी
जनसत्ता 5 जनवरी, 2013: चालीस बच्चों के मां-बाप अपने बच्चों के साथ आगरा में पांच दिनों तक अपने खर्चे पर इसलिए रुके रहे कि साबुन बनाने वाली कंपनी के विज्ञापन में उनके बच्चे नजर आ जाएं।

सभी बच्चे चौथी-पांचवीं के छात्र थे और ऐसा भी नहीं कि इन चार-पांच दिनों के दौरान बच्चों के स्कूल बंद थे। या फिर बच्चों को मोटा मेहनताना मिलना था। महज दो से चार हजार रुपए की कमाई होनी थी। विज्ञापन में बच्चे का चेहरा नजर आ जाए, इसके लिए मां-बाप इतने व्याकुल थे कि वे ठीक उसी तरह काफी कुछ लुटाने को तैयार थे जैसे एक वक्त किसी स्कूल में दाखिला कराने के लिए मां-बाप डोनेशन देने को तैयार रहते हैं।
तो क्या बच्चों का भविष्य अब काम पाने और पहचान बना कर नौकरी करने में ही जा सिमटा है। या फिर शिक्षा हासिल करना इस दौर में बेमानी हो चुका है। या शिक्षा के तौर-तरीके मौजूदा दौर के लिए फिट नहीं हैं। तो मां-बाप हर उस रास्ते पर बच्चों को ले जाने के लिए तैयार हैं, जिस रास्ते पढ़ाई-लिखाई मायने नहीं रखती है।
असल में यह सवाल इसलिए कहीं ज्यादा बड़ा है, क्योंकि सिर्फ आगरा नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में करीब चालीस लाख से ज्यादा बच्चे टेलीविजन विज्ञापन से लेकर मनोरंजन की दुनिया में सीधी भागीदारी के लिए पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर भिड़े हुए हैं। इनके अपने वातावरण में टीवी विज्ञापन में काम करने वाले हर उस बच्चे की मान्यता उन दूसरे बच्चों से ज्यादा है, जो सिर्फ स्कूल जाते हैं। सिर्फ छोटे-छोटे बच्चे नहीं, बल्कि दसवीं और बारहवीं के बच्चे जिनके लिए शिक्षा के मद्देनजर करिअर का सबसे अहम पड़ाव परीक्षा में अच्छे नंबर लाना होता है, वे भी विज्ञापन या मनोरंजन की दुनिया में कदम रखने का कोई मौका छोड़ने को तैयार नहीं होते।
आलम तो यह भी है कि परीक्षा छोड़ी जा सकती है, लेकिन मॉडलिंग नहीं। मेरठ में ही बारहवीं के छह छात्र परीक्षा छोड़ कंप्यूटर साइंस और बिजनेस मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट की विज्ञापन फिल्म में तीन हफ्ते तक लगे रहे। यानी पढ़ाई के बदले पढ़ाई के संस्थान की गुणवत्ता बताने वाली फिल्म के लिए परीक्षा छोड़ कर काम करने की ललक।
जाहिर है, यहां भी सवाल सिर्फ पढ़ाई के बदले मॉडलिंग करने की ललक का नहीं है, बल्कि जिस तरह शिक्षा को बाजार में बदला गया है और निजी कॉलेजों से लेकर नए-नए कोर्स की पढ़ाई हो रही है उसमें छात्र को न तो कोई भविष्य नजर आ रहा है और न ही शिक्षण संस्थान भी शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए कोई मशक्कत कर रहे हैं। सिवाय अपने-अपने संस्थानों को खूबसूरत तस्वीर और विज्ञापनों के जरिए उन्हीं छात्रों के विज्ञापन के जरिए चमका रहे हैं, जो पढ़ाई-परीक्षा छोड़ कर मॉडलिंग कर रहे हैं।
महज सपने नहीं, बल्कि स्कूली बच्चों के जीने के तरीके भी कैसे बदल रहे हैं इसकी झलक इससे भी मिल सकती है कि एक तरफ सीबीएसइ दसवीं और बारहवीं की परीक्षा के लिए छात्रों को परिक्षित करने के लिए मानव संसाधन मंत्रालय से तीन करोड़ का बजट पास कराने के लिए जद्दोजहद कर रहा है तो दूसरी तरफ स्कूली बच्चों की  विज्ञापन फिल्म का हर बरस का बजट दो सौ करोड़ रुपए से ज्यादा का हो चला है।
एक तरफ सरकार मौलिक अधिकार के तहत चौदह बरस तक की उम्र के बच्चों को मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराने के मिशन को कामयाब बनाने में जुटी है, तो दूसरी तरफ चौदह बरस तक की उम्र के बच्चों के जरिए टीवी मनोरंजन और रुपहले परदे की दुनिया हर बरस एक हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का मुनाफा बना रही है। जबकि मुफ्त शिक्षा देने का सरकारी बजट इस मुनाफे का दस फीसद भी नहीं है।
यहां सवाल सिर्फ प्राथमिकताएं बदलने का नहीं है। सवाल है कि देश के सामने देश के भविष्य के लिए कोई मिशन, कोई एजेंडा नहीं है। इसलिए जिंदगी जीने की जरूरतें, समाज में मान्यता पाने का जुनून और आगे बढ़ने का सोच उस बाजार पर आ टिका है, जहां मुनाफा और घाटे का मतलब सिर्फ भविष्य की कमाई है। और कमाई के तरीके भी सूचना तकनीक के गुलाम हो चुके हैं।
यानी वैसी पढ़ाई यों भी बेमतलब-सी है, जो इंटरनेट या गूगल से मिलने वाली जानकारी से आगे जा नहीं पा रही है। और जब गूगल हर सूचना उपलब्ध कराने का सबसे बेहतरीन साधन बन चुका है और शिक्षा का मतलब भी सिर्फ सूचना के तौर पर जानकारी हासिल करना भर बन कर रह गया है तो फिर देश में पढ़ाई का मतलब अक्षर ज्ञान से आगे जाता कहां है। इसका असर सिर्फ मॉडलिंग या बच्चों के विज्ञापन तक का नहीं है।
समझना यह भी होगा कि यह रास्ता कैसे धीरे-धीरे देश को खोखला भी बना रहा है। क्योंकि


मौजूदा वक्तमें न सिर्फ उच्च शिक्षा, बल्कि शोध करने वाले छात्रों में भी कमी आई है और जिन विषयों पर शोध हो रहा है वे विषय भी संयोग से उसी सूचना तकनीक से आगे बढ़ नहीं पा रहे हैं, जिससे आगे शिक्षा-व्यवस्था नहीं बढ़ पा रही है।
यह बेवजह नहीं है कि देश में ज्यादातर शोधपत्र नकल करके तैयार हो रहे हैं और देश के विकास में उनकी कोई उपयोगिता नहीं है। वे महज डिग्री हासिल करने का जरिया साबित होते हैं। यह सोच समूचे देश पर कैसे असर डाल सकती है यानी ज्यादा कमाई, ज्यादा मान्यता, ज्यादा चकाचौंध और कोई भी वस्तु जो ज्यादा से जुड़ रही है, जब उसमें शिक्षा कहीं फिट बैठ नहीं रही। ज्यादा कमाई और ज्यादा मान्यता के इस सोच के असर की व्यापकता देश की सेना के मौजूदा हालात से भी समझी जा सकती   है। सिर्फ 2012 में दस हजार से ज्यादा सेना के अधिकारियों ने रिटायरमेंट लेकर निजी क्षेत्रों में काम शुरू कर दिया क्योंकि वहां ज्यादा कमाई, ज्यादा मान्यता थी।
बीते पांच बरस में वायुसेना के जहाज उड़ाने वाले पांच सौ इकहत्तर पायलट नौकरी छोड़ कर निजी विमान उड़ाने लगे, क्योंकि वहां ज्यादा कमाई और अपने वातावरण में ज्यादा मान्यता थी। किसी भी निजी हवाई जहाज को उड़ाने के जरिए जो मान्यता समाज में मिलती है उतनी पूछ वायु सेना से जुड़ कर नहीं रहती।
चाहे सेना का फाइटर विमान ही क्यों न उड़ाने का मौका मिल रहा हो। सोच कैसे, क्यों बदली है? इसकी नींव को जानने से पहले इसकी पूंछ को सेना के जरिए ही पकड़ लें। क्योंकि भारत दुनिया का एकमात्र देश है, जहां देश की सेना में पैंसठ हजार से ज्यादा पद खाली हैं। और सेना में नौकरी ही सही, उसके लिए भी कोई शामिल होने की जद्दोजहद नहीं कर रहा है।
करीब तेरह हजार आॅफिसर रैंक के अधिकारियों के पद खाली हैं। लेकिन जिस दौर में ये पद खाली हो रहे थे उसी दौर में सेना छोड़ कर अधिकारी देश की निजी कंपनियों के साथ जुड़ रहे थे। कहीं डायरेक्टर का पद तो कहीं चेयरमैन का पद। कहीं बोर्ड मेंबर तो कहीं सुरक्षा सर्विस खोल कर नया बिजनेस शुरू करने की कवायद। यह सब उसी दौर में हुआ, जिस दौर में सेना को सेना के अधिकारी ही टाटा-बाय-बाय बोल रहे थे।
देश के लिए यह सवाल कितना आसान और हल्का बना दिया गया है, यह इससे भी समझा जा सकता है कि संसद में सेना के खाली पदों की जानकारी देते हुए रक्षा मंत्री साफ कहते हैं कि थल सेना में बयालीस हजार से ज्यादा, नौसेना में सोलह हजार से ज्यादा और वायुसेना में करीब आठ हजार पद खाली हैं। और देश भर में जितनी भी एकेडमी हैं, जो सेना के लिए युवाओं को तैयार करती हैं, अगर सभी को मिला भी दिया जाए तो हर बरस दस हजार कैडेट भी नहीं निकल पाते।
जबकि इसी दौर में हर बरस औसतन बीस हजार से ज्यादा युवाओं को मनोरंजन उद्योग अपने यहां खपा लेता है। उन्हें काम मिल जाता है। और जिन स्कूलों की शिक्षा-दीक्षा पर सरकार नाज करती है और प्राइमरी के दाखिले से लेकर उच्च शिक्षा देने वाले संस्थानों में डोनेशन के जरिए दाखिले की मारामारी में युवा फंसा रहता है, अब वही बच्चे बड़े होने के साथ ही तेजी से उसी शिक्षा व्यवस्था को ठेंगा दिखा कर चकाचौंध की दुनिया में कूद रहे हैं।
महानगर और छोटे शहरों के उन बच्चों के मां-बाप, जो कल तक अत्याधुनिक स्कूलों में दाखिले के लिए हाय-तौबा करते हुए मुंहमांगा डोनेशन देने को तैयार हैं अब वही अपने बच्चों का भविष्य स्कूलों की जगह विज्ञापन या मनोरंजन की दुनिया में रुपहले परदे पर चमक दिखाने से लेकर सड़क किनारे लगने वाले विज्ञापन बोर्ड पर अपने बच्चों को टांगने के लिए तैयार हैं।
आंकड़े बताते हैं कि हर नए उत्पाद के साथ औसतन देश भर में सौ बच्चे उसके विज्ञापन में लगते हैं। इस वक्त दो सौ से ज्यादा कंपनियां विज्ञापनों के लिए देश भर में बच्चों को छांटने का काम इंटरनेट पर अपनी अलग-अलग साइटों के जरिए कर रही हैं। इन दो सौ कंपनियों ने तीस लाख बच्चों का पंजीकरण कर रखा है।
इनका बजट ढाई हजार करोड़ से ज्यादा का है। जबकि देश की सेना में देश का नागरिक शामिल हो इस जज्बे को जगाने के लिए सरकार दस करोड़ का विज्ञापन करने का सोच रही है। यानी सेना में शामिल हों, यह बात भी पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर मॉडलिंग करने वाले युवा ही देश को बताएंगे।
ऐसे में देश की नई पीढ़ी किधर जा रही है, यह सोचने के लिए इंटरनेट, गूगल या विज्ञापन की जरूरत नहीं है। बस बच्चों के दिमाग को पढ़ लीजिए या उनके माता-पिता के नजरिए को समझ लीजिए, जान जाइएगा।

 

Last Updated on Saturday, 12 January 2013 12:59
 
 

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