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ओबामा की जीत के मायने PDF Print E-mail
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Friday, 09 November 2012 11:15

वेदप्रताप वैदिक
जनसत्ता 9 नवंबर, 2012: बराक हुसैन ओबामा की जीत हमें कैसी लगती है? भारत में बैठ कर हम उसके बारे में क्या सोचते हैं? सबसे पहली बात तो हमें यही प्रभावित करती है कि अमेरिका जैसे गोरांग देश में एक अश्वेत व्यक्ति दुबारा राष्ट्रपति चुना गया। वह अश्वेत ही नहीं है, वह बाहर से आकर बसे एक अफ्रीकी व्यक्ति का पुत्र है। इतना ही नहीं, उसके नाम के साथ ‘हुसैन’ भी जुड़ा हुआ है। अमेरिका के कई वंशवादी और धार्मिक कट््टरपंथियों ने ओबामा के विरुद्ध अनेक अनर्गल अभियान चलाए, लेकिन जनता के सामने उनकी एक न चली। ओबामा का दुबारा चुना जाना इसलिए भी उल्लेखनीय है कि पहली बार तो यह मान लिया गया कि अमेरिका उत्सुक लोगों का देश है। उन्होंने नवीनता की चाह में मेककेन के मुकाबले ओबामा को चुन लिया। लेकिन दूसरी बार चुनते वक्त वे ओबामा से ऊबे नहीं, यह किस बात का सबूत है?
यह इस बात का सबूत है कि अमेरिका राजनीतिक दृष्टि से वास्तविक आधुनिक राष्ट्र बन चुका है। वह अपना राष्ट्रपति चुनते समय न उम्मीदवार के रंग को देखता है, न उसके मजहब, न उसके वर्ग को। वह केवल उसकी योग्यता से उसको नापता है। जबकि भारत जैसे देशों का क्या हाल है? हम अब भी हजार साल पुरानी दुनिया में रह रहे हैं। राष्ट्र के शीर्ष पद की बात जाने दें, छोटे-मोटे पदों पर भी किसी को बिठाते वक्त हम उसकी जात-बिरादरी, धर्म-मजहब, भाषा-प्रांत आदि को खंगाल डालते हैं। भारत के राष्ट्रपति की तरह अमेरिका का राष्ट्रपति सिर्फ अलंकारिक नहीं होता है। उसमें हमारे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति, दोनों की शक्तियां समाहित होती हैं। हमारे राष्ट्रपति तो लगभग सभी वर्गों से आते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री पद पर क्या ओबामा जैसे किसी भारतीय को हम अभी तक बैठा पाए?
अमेरिकी राष्ट्रपति तो अपने गुण-कर्म के आधार पर चुना ही जाता है, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि दोनों प्रमुख पार्टियां अपने उम्मीदवार कैसे चुनती हैं? भारत में तो ज्यादातर पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह हैं। वे नेताओं की जेब में रहती हैं। उनके मनपसंद उम्मीदवार ही लोकसभा और राज्यसभा के लिए खड़े किए जाते हैं। हां, दिखाने के लिए हर पार्टी अपनी एक चुनाव समिति बना देती है। जब प्रधानमंत्री बनने की बारी आती है तो या तो पार्टी का नेता ही प्रधानमंत्री बन जाता है या वह अपने किसी पसंदीदा व्यक्ति को प्रधानमंत्री नामजद कर देता है। वह ओबामा की तरह अल्पसंख्यक भी हो सकता है और अश्वेत की जगह दाढ़ी-पगड़ी वाला भी, लेकिन मूल प्रश्न यह है कि वह अपने पद पर आया कैसे? जनता उसे चुने, यह प्रावधान तो भारतीय संविधान में है ही नहीं, लेकिन वह पार्टी द्वारा भी चुना जाता है या नहीं?
पिछली बार ओबामा को डेमोक्रेटिक पार्टी में और इस बार रोमनी को अपनी रिपब्लिकन पार्टी में उम्मीदवारी के लिए जैसा लोकतांत्रिक संघर्ष करना पड़ा, क्या भारत के किसी प्रधानमंत्री को कभी करना पड़ा? जवाहरलाल नेहरू को गांधी ने नामजद कर दिया, राजीव गांधी को जैलसिंह ऐंड कंपनी और मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी ने गद्दी पर बिठा दिया। अमेरिकी चुनावों से हम क्या कुछ सबक लेंगे और हमारी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र का अवतरण करेंगे?
भारत में भ्रष्टाचार के सबसे बड़े स्रोत चुनाव हैं। चुनाव में बेतहाशा खर्च किया गया पैसा कहां से आता है? क्या आम जनता देती है? अमेरिकी चुनाव में लाखों लोग चेक से उम्मीदवारों को पैसा देते हैं। बड़े-बड़े उद्योग भी देते हैं। प्राप्त राशि को कोई पार्टी छिपा कर नहीं रखती। उलटा, पार्टियां चंदे की रकम को जग-जाहिर करके यह सिद्ध करती हैं कि वे कितनी लोकप्रिय हैं। मिट रोमनी बड़े उद्योग-धंधों और उच्च मध्यवर्ग के प्रतिनिधि थे, लेकिन उनसे काफी ज्यादा चंदा ओबामा को मिला, जिसने यह सिद्ध किया कि ओबामा का जनाधार रोमनी से बड़ा था।
अमेरिका में चुनाव-खर्च की कोई सीमा नहीं है। इसीलिए कोई झूठा हिसाब पेश नहीं करता, लेकिन भारत में राजनीति की शुरुआत ही झूठ से होती है। कौन उम्मीदवार है, जो चुनाव आयोग को अपने खर्चे का सही-सही ब्योरा देता है? भारत में चुनावों के लिए जिन धन्ना-सेठों से पैसा मिलता है, चुने हुए प्रतिनिधि संसद में जाकर मुख्यत: उन्हीं की सेवा करते हैं। जिन मतदाताओं की सेवा करने की वे शपथ लेते हैं, उनके वोट तो उन्हें इसी पैसे के कारण मिले हैं न! इसलिए भारत में धनपतियों की सेवा प्रमुख और जनता की सेवा गौण बन जाती है। काले धन का धुआंधार इस्तेमाल सबसे ज्यादा चुनावों में ही होता है। अपने मंत्रियों और नेताओं का पेट भरने के लिए नौकरशाह भ्रष्टाचार करते हैं। चुनावों से पैदा हुआ यह भ्रष्टाचार कैंसर की तरह पूरे राज्य-शरीर में फैल जाता है।
ओबामा और रोमनी की टक्कर में एक अन्य तथ्य पर भी भारतीयों का ध्यान जाता है। दोनों उम्मीदवारों पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे। न तो उन पर सीधे भ्रष्टाचार करने के आरोप लगे, न भ्रष्टाचार पर आंख मींचे रहने या अपने रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाने के आरोप लगे।
इसका अर्थ यह नहीं कि अमेरिकी राजनीति में पूर्ण आर्थिक और राजनीतिक शुचिता है। अगर ऐसा होता तो ‘वाटरगेट स्कैंडल’ क्यों होता? लेकिन भारतीय नेताओं को ओबामा और रोमनी से सीखने के लिए बहुत कुछ मिल सकता है। रोमनी ने अपनी हार पर जो गरिमा दिखाई और ओबामा के लिए जैसी शुभकामना दी और ओबामा ने रोमनी, तमाम रिपब्लिकनों और उनके विरुद्ध वोट   डालने वालों से


जैसे मिल कर काम करने का आह्वान किया, वह किसी भी लोकतंत्र के लिए अनुकरणीय उदाहरण है। दोनों उम्मीदवारों के अंतिम भाषणों ने मन पर यह छवि छोड़ी कि अमेरिका के नेतागण अपने राष्ट्र को सर्वोपरि मानते हैं और अपनी पार्टी और खुद को उसके नीचे रखते हैं।
अब खुद ओबामा को अपनी कांग्रेस (संसद) में कड़ी परीक्षा देनी होगी। वैसे तो उन्हें रोमनी से ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ के लगभग सौ वोट ज्यादा मिले हैं, लेकिन वास्तविक मतदाताओं के व्यक्तिगत वोट 2008 के मुकाबले काफी कम मिले हैं। यानी अमेरिकी जनता आधे-आधे में बंटी हुई है। अगर शहरी, युवा, अश्वेत, महिलाएं, हिस्पानी और दक्षिण एशियाई मूल के लोग ओबामा के साथ हैं तो श्वेत पुरुष वर्ग, भद्रलोक और बेरोजगार लोगों ने रोमनी को पसंद किया है। जैसे मतदाता बंटे हुए हैं वैसे ही कांग्रेस भी बंटी हुई है। सीनेट में उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत है। प्रतिनिधि सदन में रिपब्लिकन पार्टी का है। हालांकि सीनेट की शक्तियां प्रतिनिधि सदन के मुकाबले बहुत ज्यादा हैं तो भी सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी का दो तिहाई बहुमत नहीं है। ऐसी स्थिति में कोई भी कानून आसानी से पास करा ले जाना संभव नहीं है।
सीनेट और प्रतिनिधि सदन में चुने गए रिपब्लिकन नेताओं से ओबामा, रोमनी की तरह नरमी की आशा नहीं कर सकते। वे हर बात में अड़ंगा लगाएंगे और ओबामा को इस दलदल में से अपनी नाव खे कर बाहर निकालना होगा। अगले तीन-चार महीनों में सरकारी खर्चों की कटौती और टैक्स की उगाही के मामले मुंह खोल कर खड़े होंगे। अमेरिका इस समय भयंकर आर्थिक संकट में है। उसका जितना सकल राष्ट्रीय उत्पाद है, उतना ही उसका राष्ट्रीय कर्ज है। अगर खर्च में कटौती हुई और टैक्स ज्यादा लगे तो कहीं मंदी का नया दौर शुरू न हो जाए।
यह मंदी यूरोप के साथ भारत और चीन को भी प्रभावित किए बिना नहीं रहेगी। इससे निपटने के डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन फार्मूले अलग-अलग हैं। पक्ष और विपक्ष के बीच जैसा गतिरोध भारतीय संसद में आजकल अक्सर हो जाता है, वैसे ही गतिरोधों का सामना अब उन्हें आए दिन करना होगा।
ऐसे में ओबामा को पार्टीबाजी से उठ कर राष्ट्रीय नेता होने का प्रमाण देना होगा। इससे भी भारत सरकार के वर्तमान नेता कुछ सबक ले सकेंगे। ओबामा के जीतने से अमेरिका में जितने लोग खुश हैं, उससे कहीं ज्यादा सारी दुनिया में खुश हैं। पाकिस्तान के अलावा लगभग हर देश के बहुसंख्य लोगों ने ओबामा का समर्थन किया है। भारत को भी सशंकित होने की जरूरत नहीं है।
यह ठीक है कि ओबामा भारत को मिलने वाली ‘आउटसोर्सिंग’ के विरुद्ध लगातार बोलते रहे हैं, लेकिन वे ऐसा न करते तो उन्हें रोमनी के मुकाबले वोट कैसे मिलते? बेरोजगारी आज अमेरिका का सबसे बड़ा मुद्दा है, लेकिन ओबामा भी जानते हैं कि भारत की सस्ती मजदूरी और दक्ष-सेवाओं के बिना अमेरिकी कंपनियां ज्यादा घाटे में उतर जाएंगी। जो कंपनियां भारत में खोले गए दफ्तरों से अपने काम-धंधे चलाती हैं, वे सब अमेरिकी सरकार की कठपुतलियां नहीं हैं। वे निजी कंपनियां हैं। सरकार उन पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती। हां, टैक्स लगा सकती है। वे टैक्स देकर भी अपना काम-काज चालू रखेंगी।
सीनेटर के तौर पर ओबामा भारत का कई मामलों पर मुखर विरोध करते थे और राष्ट्रपति बनते ही उन्होंने रिचर्ड होलब्रुक को जम्मू-कश्मीर में टांग अड़ाने के लिए भेज दिया था, लेकिन अब उनकी गाड़ी सही पटरी पर है। पिछले दो-तीन वर्षों में वे न केवल भारत आए, बल्कि उन्होंने भारत के साथ आर्थिक और सामरिक संबंध बढ़ाने के लिए कई नई पहल भी की।
आजकल उनका एक जुमला काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। वह है, एशिया का ध्रुव (पीवट टू एशिया)! यानी एशिया का केंद्र कौन है? क्या कोई राष्ट्र है या कोई क्षेत्र है या कोई क्षेत्रीय समूह या कोई नीतियां हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ चाहेंगे कि अपनी दूसरी अवधि में वे इस ‘एशियाई धु्रव’ का रहस्य खोलें। अगर चीन पर उनका भरोसा नहीं रहा तो क्या अब वे भारत को एशिया का चौधरी बनाने की तैयारी कर रहे हैं? ओबामा को अब तक यह पता चल गया होगा कि भारत के वर्तमान नेतागण अमेरिका के कितने ही प्रशंसक हों, वे भारत को किसी महाशक्ति का दुमछल्ला नहीं बनने देंगे। वे अमेरिका की खातिर किसी भी राष्ट्र से दुश्मनी मोल लेने को तैयार नहीं होंगे। यों भी अब अमेरिका की आर्थिक और सामरिक स्थित ऐसी नहीं है कि वह भारत जैसे राष्ट्रों से अपना अंधानुकरण करवा सके।
यह ठीक है कि ओबामा और रोमनी के वाग्युद्धों में भारत कहीं नजर नहीं आया, लेकिन पाकिस्तान और चीन आए। इसका अर्थ यह है कि भारत को डेमोक्रेट और रिपब्लिकन, दोनों अपना मित्र और महत्त्वपूर्ण मानते हैं। ओबामा ने अपनी पहली अवधि में भारत के प्रति बुश-भाव को कायम रखा। भारत को सुरक्षा परिषद का सदस्य बनने और परमाणु सप्लायर्स ग्रुप में प्रवेश के लिए अमेरिका सक्रिय सहायता करता रहा।
अब अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी के दौर में ओबामा भारत को पर्याप्त महत्त्व देंगे, इसमें जरा भी शक नहीं है। अब ओबामा तिबारा चुने जाने के मोह से मुक्त हैं, इसलिए पाकिस्तान के साथ कड़ाई से पेश आएंगे। सुदूर पूर्व और चीन के प्रति भी उनका रवैया बदलेगा। यह भारत के नेताओं की दक्षता पर निर्भर है कि ओबामा के इस निर्णायक दौर में भारत-अमेरिकी सामरिक सहकार को वे कितने ऊंचे स्तर तक ले जा   सकते हैं।

 
 

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