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कांग्रेस की बदलती राजनीति PDF Print E-mail
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Wednesday, 03 October 2012 10:33

पुण्य प्रसून वाजपेयी
जनसत्ता 3 अक्टुबर, 2012: कांग्रेस की राजनीति क्या बदल रही है। क्या कांग्रेस यह मान चुकी है कि पारंपरिक वोट बैंक अब उसके लिए नहीं है। क्या कांग्रेस नए राजनीतिक अर्थशास्त्र के सहारे खुद की नई पहचान बनाने में लगी है। यानी कांग्रेस को खड़ा करने से लेकर सरकार चलाने तक में क्या अब उन खांटी कांग्रेसियों की जरूरत नहीं है जो जमीनी संघर्ष से निकले और पार्टी की परंपरा के वाहक बने रहे? यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि पहली बार कांग्रेस-परंपरा कांग्रेसी सरकार के जरिए पलटी जा रही है। किसान, मजदूर, आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यक का सवाल वोट बैंक के दायरे से निकल कर विकास के अनूठे मंत्र में समा रहा है, जहां राष्ट्रवाद पिछड़ रहा है और क्षेत्रीयता दकियानूस लग रही है।
यह सवाल बीते दिनों का सच हो चला है कि कांग्रेस और सरकार की नीतियों में कोई मेल नहीं है। अब तो खांटी कांग्रेसी हाशिये पर हैं और जनता के बीच गए बगैर पिछले दरवाजे से घुसने वाले हुनरमंद कांग्रेसियों की ही चल निकली है। कल तक हुनरमंद कांग्रेसियों की मदद खांटी कांग्रेसी लेते रहे और सरकार चलाते रहे। राजीव गांधी ने सूचना प्रौद्योगिकी के महारथी सैम पित्रोदा की मदद ली, तो सोनिया गांधी ने अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को देश की बागडोर ही सौंप दी। और खुद मददगार की भूमिका में आ गर्इं।
ऐसी हुनरमंदी के इस दौर में खांटी कांग्रेसियों को यह समझ नहीं आया कि आने वाले वक्त में उनका राजनीतिक ज्ञान कहां टिकेगा। यह सवाल कांग्रेस के भीतर अचानक बड़ा और बड़ा होने लगा, क्योंकि हुनरमंद कांग्रेसी राजनीति की लकीर भी खींचने लगे और सरकार चलाने से लेकर चुनावी राजनीति की परिभाषा भी बदलने लगे। सात महीने पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस का घोषणापत्र जारी करते हुए लखनऊ में सैम पित्रोदा ने खुद की हुनरमंदी को वोट बैंक की शैली में बताते हुए कहा कि वे बढ़ई के बेटे हैं। तो क्या 2014 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी बताएंगे कि वे किसके बेटे हैं! यह सवाल इसलिए, क्योंकि भारत की ऊंची विकास दर और बाजारवादी चकाचौंध के बावजूद न तो सामाजिक न ही राजनीतिक ताना-बाना बदला है और न ही देश की परंपरा और उसके सरोकार बदले हैं।
लेकिन न सिर्फ राजनीति करने और सरकार चलाने के तौर-तरीकों में परिवर्तन आ रहा है बल्कि जिन हाथों में कमान है उनका समाज को देखने का नजरिया भी नई राजनीतिक जमीन बनाने पर आमादा है। शायद इसीलिए मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम, मोंटेक सिंह अहलूवालिया और आनंद शर्मा सरीखे कांग्रेसियों का नाम हर जुबान पर आ जाता है। लेकिन पुराने खांटी कांग्रेसी माखनलाल फोतेदार, कमलनाथ और नटवर सिंह से लेकर गुलाम नबी आजाद तक का नाम जुबान पर आता नहीं।
इस कड़ी में दिग्विजय सिंह सरीखे कांग्रेसी नारद मुनि की भूमिका में आने लगे हैं और इंदिरा गांधी के दौर की अंबिका सोनी एक चुकी हुई कांग्रेसी नेता के तौर पर लगने लगी हैं। जबकि बिना राजनीतिक जमीन के सलमान खुर्शीद जमीनी राजनेता लगने लगे हैं और मुकुल वासनिक से लेकर व्यालार रवि तक नई कांग्रेस के सिपहसलार बनने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखते हैं। यानी एक झटके में खांटी कांग्रेसियों के बदले हुनरमंद आधुनिक कांग्रेसी चेहरे ही सबसे महत्त्वपूर्ण और कांग्रेस के खेवैया के तौर पर मान्यता पाने लगे। असल में मान्यता पाने से ज्यादा कांग्रेस की सत्ता में जगह बनाने की होड़ ने कांग्रेस के राजनीतिक तौर-तरीकों को भी बदलना शुरू कर दिया।
इसका असर अब आर्थिक सुधार के पीछे खडेÞ होकर सरकार के सुर में कांग्रेसी सुर के मिलने से भी समझा जा सकता है और पारंपरिक वोट के सहारे कांग्रेस के खांटी नेताओं के हाशिये पर जाने से भी जाना जा सकता है। ओड़िशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल से लेकर मध्यप्रदेश तक देश का एक बड़ा हिस्सा, जो कभी कांग्रेस की सियासत का गढ़ था, वहां आज कांग्रेस काफी सिमट चुकी है। कहा जा सकता है कि कांग्रेस के वोट बैंक को क्षत्रपों ने हड़प लिया। लेकिन कारण यह भी है कि कांग्रेस की अपनी प्राथमिकता इस दौर में या तो बदलती चली गई या फिर कांग्रेस ने अपना विस्तार सामाजिक-आर्थिक तौर पर नहीं किया।
यहां विस्तार का सीधा मतलब राजनीतिक संघर्ष से है और व्यापक तौर पर इसका मतलब रूपांतरण से है। कांग्रेस की सत्ता में बदलाव के साथ भले आर्थिक नीतियां पूरी तरह बदल गई हों, लेकिन सच तो यह है कि कांग्रेसी उसी बुनियाद से उम्मीदे बांधे रहे जो आजादी के बाद कांग्रेस को राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर मान्यता दिलाए हुए थी।
यह उम्मीद किसान, आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक पर आश्रित खांटी कांग्रेसियों में टूटी, क्योंकि कांग्रेस की हुनरमंद धारा ने खांटी कांग्रेसियों की जमीन पर खडेÞ वोट बैंक के लिए राजनीतिक पैकेज और पैकेज से पेट भरने वाले वोट बैंक की सामाजिक सरोकार की जमीन को राष्ट्रीय नीति से


जोड़ दिया। वित्त मंत्रालय से लेकर योजना आयोग ने वोट बैंक के उस मिथ को ही तोड़ दिया।
खांटी कांग्रेसियों को लगता है कि राजनीति के जरिए पीढ़ियों तक कांग्रेस से मतदाताओं के मन को जोड़ा जा सकता है। लेकिन देश की सवा दो सौ लोकसभा सीटों पर कांग्रेस का उम्मीदवार गिनती में नहीं आता है या कहें चुनाव लड़ता भी है तो उसका नंबर चौथा या पांचवां रहता है। बाकी सवा तीन   सौ सीटों पर कांग्रेस की इतनी हैसियत नहीं कि 272 सीटें जीत ले। यानी चुनावी गणित के फेल होते मॉडल को तोड़ने की जरूरत कांग्रेस की भी है। मगर हुनरमंद कांग्रेसियों ने इस मॉडल को तोड़ने की दिशा में भी कदम बढ़ा दिए। इसी का नतीजा है कि पहली बार मनमोहन सिंह सरकार की नीतियों के खिलाफ न सिर्फ विपक्ष बल्कि कई सहयोगी दलों ने भी मोर्चा खोल दिया है।
पहली बार कांग्रेस की विचारधारा के दामन पर भी दाग लगे। क्योंकि आर्थिक सुधार की उड़ान ने कांग्रेसी धारा को ही नहीं उलटा बल्कि आने वाले वक्त में क्षत्रपों के सामने भी यह सवाल बड़ा हो गया कि चुनाव के बाद अगर वे भाजपा के साथ सांप्रदायिकता के कारण खड़े नहीं हो सकते तो कांग्रेस के साथ आर्थिक गुलामी के सवाल पर कैसे खड़े हो सकते हैं। जबकि उनके अपने वोट बैंक पहली बार सांप्रदायिकता से कहीं ज्यादा आर्थिक गुलामी से प्रभावित हो रहे हैं और आने वाले वक्त में अपने मतदाताओं के सामने उन्हें जवाब देना है कि उनका रास्ता जाएगा किधर। यह सवाल समाजवादियों के सामने भी है और वामपंथियों के सामने भी।
लेकिन इस सिलसिले में पहला सवाल खांटी कांग्रेसियों का है जिनके सामने नई राजनीतिक विचारधारा हुनरमंद कांग्रेसियों के आर्थिक सुधार की है तो दूसरा सवाल उन युवा कांग्रेसियों का है जो पिता की विरासत लेकर संसद में पहुंचे और अब उस विरासत को ढोते हुए कांग्रेस की धारा को बदलने के लिए उन्हें तैयार होना है।
सचिन पायलट या जीतेंद्र प्रसाद सरीखे युवा कांग्रेसी किस रास्ते चलें? और राहुल गांधी के कहने पर कांग्रेसी परंपरा को निभाने के लिए जो युवा कांग्रेस से जुडेÞ, अगर उन्हें वर्धा के गांधी आश्रम से राजनीति का ककहरा पढ़ाया जा रहा है तो फिर वर्धा से निकल कर वे किस कांग्रेस की पालकी उठाएंगे?
राहुल गांधी ही जब कांग्रेस संगठन को किसी राजनीतिक मंडी की तरह खोल कर चंद चेहरों या खांटी कांग्रेसी परिवारों में सिमटी कांग्रेस को विस्तार देना चाहते हैं तो फिर आने वाले वक्त में कांग्रेस का रास्ता क्या होगा?  मौजूदा वक्त में कांग्रेस न तो नेहरू की लीक पर मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाने को तैयार है न उसे इंदिरा गांधी की गरीबों से जुड़ी धारा में रुचि है और न ही राजीव गांधी के आधुनिक भारत के नजरिए से कुछ लेना-देना है। यानी न उद्योग न खेती, अब कॉरपोरेट की पूंजी के बुलबुले में विकास दर को मापने का वक्त है। पीवी नरसिंह राव के दौर से उपजे हुनरमंद कांग्रेसियों की राजनीति जमने के बाद से कांग्रेस कभी अपने बूते खड़ी नहीं हो पाई और सरकार का मतलब कॉरपोरेट के जरिए अपनी सत्ता बरकरार रखने का ढोल पीटना हो गया।
यह सत्ता मंत्रिमंडल-विस्तार में कांग्रेसियों को मिलने वाले मंत्रालय से भी मापी जा सकती है। यह सत्ता संगठन को दुरुस्त करने के लिए खांटी कांग्रेसियों की उपयोगिता से भी मापी जा सकती है। यह सत्ता युवा कांग्रेसियों को मंत्रिमंडल में स्वतंत्र प्रभार से भी मापी जा सकती है।
अल्पमत की सरकार चलाने के हुनर के जरिए भी  यह सत्ता जानी जा सकती है। वहीं कांग्रेस की सरकार को टिकाए रखना समाजवादियों की खासियत बन चुकी है। और वोट बैंक के सहारे दलितों के सवालों को देश से काट कर सरकार के साथ खडेÞ रहना बहुजन समाज पार्टी की विशेषता है। तो क्या पहली बार हुनरमंद कांग्रेसियों ने चुनावी राजनीति की धारा और उससे मिलने वाली सत्ता के समीकरणों को भी बदल दिया है?
गांधी परिवार की समझ कांग्रेस की जरूरत नहीं रही। लोहियावाद समाजवादियों की जरूरत नहीं रहा। बहुजन समाज पार्टी के लिए आंबेडकर और कांशीराम की राजनीतिक समझ बेमानी हो गई। बीजू पटनायक की विरासत नवीन पटनायक की जरूरत नहीं है और जेपी का संघर्ष लालू के लिए बेमतलब का है। भाजपा भी संघ के राजनीतिक स्वयंसेवक के तौर पर नहीं रहना चाहती और सड़क के आंदोलन भी राजनीति का वही ककहरा पढ़ना चाहते हैं जहां सत्ता उनके सोच के अनुकूल चले।
तो क्या राजनीति का यह दौर लोकतंत्र के पारंपरिक प्रयोगों को भी बदल रहा है? 2014 को लेकर भले खांटी कांग्रेसी या दूसरे दल परंपरागत तरीके से शह-मात देने को तैयार हो रहे हैं, मगर हुनरमंद कांग्रेसी अब चुनावी तरीकों को भी बदल रहे हैं। यह सवाल इसलिए, क्योंकि पहली बार समूचे देश के नाम पर बन रही नीतियों पर सवालिया निशान लगे हैं। एक तरफ पारंपरिक राजनीति है तो दूसरी तरफ हुनरमंद कांग्रेसी सत्ता।

 
 

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