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विदेशी हाथ कहां है PDF Print E-mail
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Tuesday, 25 September 2012 11:47

सुनील
जनसत्ता 25 सितंबर, 2012: दोनों खबरें छोटी हैं, लेकिन उनके पीछे भारत की दुर्दशा का बड़ा राज छिपा है। कुछ हफ्ते पहले खबर आई कि भारत सरकार ने रघुराम जी. राजन को वित्त मंत्रालय का नया मुख्य आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया है। राजन के परिचय में बताया गया है कि वे अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के मुख्य अर्थशास्त्री रहे हैं। इसके पहले भी 2008 में प्रधानमंत्री ने उनको अपना मानद आर्थिक सलाहकार निुयक्तकिया था, जो भारत सरकार के सचिव के समकक्ष पद था। उसी साल में रघुराम राजन ने अपनी अध्यक्षता में बनी वित्तीय सुधारों पर उच्चस्तरीय समिति की रपट सौंपी थी।
दूसरी खबर आई कि इकतीस जुलाई को इसी पद से मुक्त हुए अर्थशास्त्री कौशिक बसु को विश्व बैंक ने अपना मुख्य अर्थशास्त्री और वरिष्ठ उपाध्यक्ष नियुक्त किया है। ये वही कौशिक बसु हैं जिन्होंने भारतीय वित्त मंत्रालय का सलाहकार रहते विगत जुलाई में अमेरिका में जाकर अफसोस प्रकट किया था कि भारत के बड़े आर्थिक सुधारों की राह में बहुत रोड़े हैं और 2014 के चुनावों के पहले कुछ नहीं होगा। उनका आशय यूपीए के अंदर सहयोगी दलों द्वारा कई मुद््दों पर विरोध करने से था। इसके पहले भ्रष्टाचार पर उठे बवाल के दौरान भी कौशिक बसु तब चर्चा में आए थे, जब एक उन्होंने सुझाव दिया था कि भ्रष्टाचार संबंधी कानूनों को बदल कर रिश्वत देने को कानून-सम्मत बना देना चाहिए और रिश्वत देने वाले को अपराधी नहीं मानना चाहिए।
नए आर्थिक सलाहकार रघुराम राजन के विचार भी गौरतलब हैं। वे घोषित रूप से उदारीकरण, निजीकरण और मुक्त बाजार के समर्थक हैं। इतने ज्यादा कि अगस्त 2010 में अपनी एक किताब के भारत में विमोचन के मौके पर उन्होंने शिक्षा अधिकार कानून का भी विरोध कर डाला। इस कानून में स्कूलों के लिए कुछ न्यूनतम जरूरतें और मानदंड तय किए गए हैं, जो निजी स्कूलों पर भी लागू होंगे। हालांकि ये बहुत अपर्याप्त हैं, पर राजन को इतनी कम दखलंदाजी भी पसंद नहीं है। उन्होंने कहा कि इससे तो लाइसेंस राज वापस आ जाएगा और निजी स्कूलों पर मुसीबत आएगी। इस साल अप्रैल में दिए एक भाषण में उन्होंने कहा कि ‘हमें विकास-वृद्धि के बारे में उसी तरह पागल (पेरेनॉइड) होना पड़ेगा, जैसे हम 1991 के प्रारंभ में थे।’ उन्होंने र्इंधन को नियंत्रण-मुक्तकरने और उनकी कीमतों में बढ़ोतरी की वकालत की। और सचमुच इस नए सलाहकार को पदभार संभाले पंद्रह दिन भी नहीं हुए और सरकार ने डीजल की कीमत में वृद्धि और रसोई गैस को महंगा बनाने का बड़ा कदम उठा लिया।
रघुराम राजन की पृष्ठभूमि भी गौरतलब है। वे मूलत: अर्थशास्त्री नहीं हैं। आइआइटी दिल्ली से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग करने के बाद आइआइएम-अमदाबाद से बिजनेस मैनेजमेंट में स्नातकोत्तर डिप्लोमा लेकर वे अमेरिका चले गए। वहां मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलॉजी से अर्थशास्त्र में पीएचडी की। तब से वे ज्यादातर वक्त अमेरिका में ही रहते हैं। वे शिकागो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हैं जो पूंजीवादी-बाजारवादी अर्थशास्त्र का अड््डा है। मिल्टन फ्रीडमेन और फ्रेडरिक हायेक जैसों के नेतृत्व में अर्थशास्त्र का शिकागो स्कूल पूर्ति-पक्ष अर्थशास्त्र, मौद्रिकवाद और मुक्तव्यापार का चैंपियन रहा है।
आइए कौशिक बसु की पृष्ठभूमि देखें। वे अमेरिका के कोरनेल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हैं। उन्होंने स्नातक शिक्षा दिल्ली के सबसे आभिजात्य कॉलेज सेंट स्टीफन्स से हासिल की और उसके बाद स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स में कुछ साल पढ़ाने के अलावा वे ज्यादातर अमेरिका-ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों से जुड़े रहे हैं। अब वे विश्व बैंक के खास पद पर पहुंच गए हैं।
भारत की अर्थनीति के कुछ और कर्णधारों के बायोडाटा पर नजर दौड़ाएं। योजना आयोग के ताकतवर और बहुचर्चित उपाध्यक्ष मोंटेकसिंह अहलूवालिया भी सेंट स्टीफन्स कॉलेज से निकले हैं (इस कॉलेज का भारत के नवउदारवादी, बाजारवादी रूपांतरण से खास रिश्ता मालूम होता है, क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में बाजारवादी सुधारों को अंधाधुंध लागू करने वाले केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल भी इस कॉलेज के पूर्व छात्र हैं और भारत के आधुनिक युवराज राहुल गांधी भी इसी कॉलेज की उपज हैं)। इस कॉलेज से निकलने के बाद मोंटेकसिंह इंग्लैंड के आॅक्सफर्ड के एक कॉलेज मे चले गए। उनकी एमफिल आॅक्सफर्ड विश्वविद्यालय से ही हुई। उनका कैरिअर विश्व बैंक से शुरू हुआ। भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य न होने के बावजूद बीच-बीच में वे वित्त और वाणिज्य मंत्रालयों और प्रधानमंत्री के सचिव और सलाहकार जैसे पदों पर रहे। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से भी उनका जुड़ाव रहा। वे भारत के कथित आर्थिक सुधारों के प्रमुख शिल्पकारों और अमलकारों में से एक हैं।
उन्होंने योजना आयोग का भरपूर इस्तेमाल राज्य सरकारों को झुकाने और सुधारों को स्वीकार करवाने में किया। यानी केंद्रीय मदद और अंतरराष्ट्रीय मदद और कर्ज तभी मिलेंगे और उसी राज्य सरकार को मिलेंगे, जो सुधारों को लागू करती है, ऐसी शर्तें और ऐसे दबाव उन्होंने बनाए। गरीबी रेखा को ग्रामीण क्षेत्र में छब्बीस रुपए और शहरी क्षेत्र में पैंतीस रुपए रोज के अमानवीय और हास्यास्पद स्तर पर लाने का काम उन्हीं के नेतृत्व में हुआ। इसी के साथ पिछले दिनों योजना भवन में पैंतीस लाख रुपए के दो अत्याधुनिक शौचालय बनवाने के लिए भी वे चर्चा में रहे


हैं।
इसी मंडली के सदस्य सी रंगराजन हैं जो भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे हैं और इस वक्त प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष हैं। वे बारहवें वित्त आयोग के अध्यक्ष और योजना आयोग के सदस्य भी रहे हैं। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष में भी भारत की ओर से कार्यकारी निदेशक रहे हैं। दिल्ली के सेंट स्टीफन्स जैसे ही अभिजात चेन्नई के लॉयोला कॉलेज से उन्होंने बी काम किया है और अमेरिका के पेनसिलवेनिया विश्वविद्यालय से पीएचडी की है। देश में बाजारवादी सुधारों के वे एक बड़े चैंपियन हैं।
यही कहानी देश के मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की है जो इन सबके मुखिया हंै। उन्होंने तो स्नातक शिक्षा भी इंग्लैंड के कॉलेज से पाई है और आॅक्सफर्ड विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल की है। 1991 में वित्तमंत्री बनने से पहले वे भारत के वित्त और वाणिज्य मंत्रालयों के सचिव और सलाहकार के अलावा रिजर्व बैंक के गवर्नर और योजना आयोग के उपाध्यक्ष जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और एशियाई विकास बैंक के गवर्नर पद पर भी वे रहे। वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री पदों पर लंबे समय तक रहने के बावजूद उन्होंने एक भी सीधा चुनाव नहीं जीता है। एकमात्र लोकसभा चुनाव वे 1999 में नई दिल्ली से लड़े, जो हार गए थे। वे असम से राज्यसभा में निर्वाचित होते हैं, जहां के निवासी वे नहीं हैं और सिर्फ चुने जाने के लिए अपना निवास गुवाहाटी में बताते हैं। इस तरह पिछले दो दशक से भारत का नीति-नियंता और नियति-निर्धारक एक ऐसा आदमी बना हुआ है जो मूलत: एक नौकरशाह है और जो जनता के जरिए चुने जाने की जरूरत महसूस नहीं करता।
वर्ष 2005 में आक्सफर्ड विश्वविद्यालय ने अपने इस पुराने छात्र का सम्मान किया और मानद उपाधि प्रदान की। तब मनमोहन सिंह ने जो कृतज्ञता-भाषण दिया, वह तो गजब का था। इस भाषण में उन्होंने अंगे्रजों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि अंगे्रजों से हमारा रिश्ता बहुत फायदेमंद रहा है। हमारे कानून, संविधान, लोकतंत्र, न्यायपालिका, स्वतंत्र पे्रस, प्रशासनिक सेवाएं, पुलिस, आधुनिक विश्वविद्यालय, अनुसंधान प्रयोगशालाएं, शिक्षा व्यवस्था, अंग्रेजी भाषा, क्रिकेट का खेल आदि सब कुछ तो हमें अंग्रेजों से मिला है।
यह भी विडंबना रही कि इस भाषण के बाद भारत में कोई ज्यादा बवाल नहीं मचा। किसी और देश में यह संभव नहीं है कि वहां का प्रधानमंत्री अपने देश की पिछली गुलामी को महिमामंडित करे और देश जनता चुपचाप उसको बर्दाश्त कर ले। इस भाषण से मनमोहन सिंह और उनके जैसे लोगों की मानसिकता का पता चलता है।
कुल मिला कर मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह, रंगराजन, रघुराम राजन और कौशिक बसु उन अर्थशास्त्रियों, नौकरशाहों, विशेषज्ञों और सलाहकारों की बानगी पेश करते हैं जो पिछले काफी वक्तसे भारत के बारे में बड़े-बड़े फैसले ले रहे हैं या उन फैसलों को प्रभावित कर रहे हैं। ये फैसले इतने बड़े हैं कि इनसे भारत की तात्कालिक अर्थव्यवस्था ही नहीं, भारतीय जनजीवन का हर पहलू प्रभावित हो रहा है। भारत की राजनीति, समाज-रचना, शिक्षा, सेहत, संस्कृति, पर्यावरण और भारत का भविष्य भी भारी रूप से प्रभावित हो रहा है। मगर पूरे देश के लिए और पूरे देश की ओर से फैसले लेने वाले ये व्यक्ति ऐसे हैं जो भारत के शीर्षस्थ अभिजात वर्ग से हैं, जिनका भारत के गांवों या साधारण लोगों से कोई रिश्ता नहीं है, जिन्होंने कभी गरीबी नहीं देखी है, जिनकी पढ़ाई-लिखाई विदेशों में हुई है और जिनका दिलो-दिमाग पूरी तरह वहां के रंग में रंग चुका है।
विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के साथ भारत सरकार में वे ऐसे आते-जाते रहते हैं, जैसे हम मकान के एक कमरे से दूसरे कमरे में आते-जाते हैं। भारत सरकार के पदों पर आकर वे विश्व बैंक, मुद्रा कोष और अमेरिका की नीतियों-निर्देशों को लागू करते हैं।
भारत सरकार की आर्थिक नीतियों के ज्यादातर फैसले ये अर्थशास्त्री-नौकरशाह ही लेते हैं, राजनेता या मंत्री नहीं। इस बारे में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का एक किस्सा मौजूं है। 1991 में प्रधानमंत्री नरसिंह राव और वित्तमंत्री मनमोहन सिंह की जिस सरकार ने इस देश में बड़े परिवर्तनकारी फैसले लेने शुरू किए, उसके ठीक पहले छह महीने तक चंद्रशेखर प्रधानमंत्री थे। बाद में उन्होंने बताया कि मेरे प्रधानमंत्री रहते भारत सरकार के मंत्रालयों में एक मसौदा घूमता रहा जिसमें जिक्र था कि भारत की आर्थिक नीतियों को विश्व बैंक-मुद्राकोष की सलाहों के मुताबिक किस-किस तरह से बदलना चाहिए। मुझे इसकी हवा भी नहीं लगने दी गई। मेरे हटते ही इस मसौदे को लागू करना शुरू कर दिया गया।
यह भी एक रहस्य है कि जो मनमोहन सिंह न तो राजनीति में थे और न किसी राजनीतिक दल के सदस्य, वे अचानक कैसे वित्तमंत्री के महत्त्वपूर्ण पद पर बिठा दिए गए और युगांतरकारी और विनाशकारी फैसले लेने लगे। इसी से पता चलता है कि भारत की सरकारों में विदेशी घुसपैठ कितनी गहरी है। साम्राज्यवाद के खिलाफ एक शानदार लड़ाई लड़ने वाला, उसमें दुनिया की अगुआई करने वाला और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भरने वाला यह विशाल देश इस हालत में कैसे पहुंचा, यह एक गंभीर चिंतन-मनन-अनुसंधान का विषय है।

 
 

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