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Friday, 09 November 2012 15:52 |
नयी दिल्ली (एजेंसी) उच्चतम न्यायालय ने पूर्व केन्द्रीय मंत्री सी के जाफर शरीफ के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप में अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही आज निरस्त कर दी।
पूर्व रेल मंत्री पर आरोप था कि वह उन्होंने आधिकारिक पद का दुरुपयोग किया और वह अपने साथ चार सहायकों को लंदन ले गये थे। न्यायमूर्ति पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने पूर्व रेल मंत्री के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही निरस्त करते हुए कहा कि जाफर शरीफ के खिलाफ ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि स्टाफ के चार सदस्यों को 1995 में लंदन ले जाने से उन्हें या उनके किसी सहयोगी को कोई आर्थिक लाभ मिला। न्यायालय ने कहा कि इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है कि शरीफ ने सरकारी विदेश यात्रा के लिये अपने सहयोगियों को साथ ले जाने के लिए भ्रष्ट या गैरकानूनी तरीका अपनाया। जाफर शरीफ के खिलाफ आरोप था कि सरकारी दौरे पर अपने स्टाफ के चार सदस्यों को साथ ले जाने के कारण करीब सात लाख रुपए के राजस्व का नुकसान हुआ। इस विदेश यात्रा के दौरान रेल मंत्री अपने अतिरिक्त निजी सचिव बी एन नागेश, स्टेनो एस एम मस्तान और वी मुरलीधरन तथा चालक सी एच समाउल्लाह को भी लंदन ले गये थे। शरीफ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के
11 अप्रैल के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ लंबित कार्यवाही रद्द करने से इंकार कर दिया था। इस प्रकरण की जांच के बाद केन्द्रीय जांच ब्यूरो ने यह मामला बंद करने के लिए अदालत में रिपोर्ट दाखिल की थी। लेकिन निचली अदालत ने जाफर शरीफ के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप में मामला बंद करने का आग्रह ठुकरा दिया था। सीबीआई की विशेष अदालत ने विदेश यात्रा के दौरान कथित रूप से राजस्व के नुकसान के मामले में पूर्व रेल मंत्री के खिलाफ तीन जुलाई को अभियोग निर्धारित किये थे। इस मामले में केन्द्रीय जांच ब्यूरो ने 1998 में जाफर शरीफ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। लेकिन 2005 में जांच एजेन्सी ने मामला बंद करने के लिए रिपोर्ट दायर की थी क्योंकि उसे पूर्व मंत्री पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं मिली थी। विशेष अदालत ने मामला बंद करने की रिपोर्ट अस्वीकार करते हुए कहा था कि ऐसा लगता है कि मुकदमा चलाने की अनुमति देने वाले प्राधिकारी के समक्ष सारे तथ्य पेश नहीं किये गये थे। इसके बाद एक बार फिर जांच एजेन्सी ने मामला बंद करने की रिपोर्ट दाखिल की लेकिन विशेष न्यायाधीश ने उसका अनुरोध अस्वीकार करते हुये भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत मामले का संज्ञान ले लिया था।
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