मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
ग्यारह खास मुसाफिर और एक शाही रेलगाड़ी PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Friday, 09 November 2012 09:30

प्रतिभा शुक्ल
नई दिल्ली । रेलवे के घाटा का रोना रोने वाले मंत्री और रेलवे बोर्ड के अफसर ही ओहदे और संसाधन का दुरुपयोग करके महकमे को चूना लगाने मे लगे हैं। एक ओर मंत्रालय से चंद चहेतों को मुंबई भेजने के लिए आनन-फानन में पूरी वातानुकूलित ट्रेन चला दी गई तो दूसरी ओर हजारों, लाखों लोग टिकट और ट्रेनों में जगह न मिलने से धक्के खा रहे हैं।
दिलचस्प बात यह भी है कि नई दिल्ली से रवाना होने वाली 19 कोच की इस ट्रेन में महज 11 यात्रियों ने सफर किया। इनके साथ रेलवे के 31 कर्मचारी इस परिचालन में लगाए गए। इसमें कितनी तत्परता बरती गई, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बुधवार शाम छह बजे रेलवे बोर्ड से संदेश भेजा गया, यह कहते हुए कि रात 11 बजकर 35 मिनट पर ट्रेन रवाना कर दी जाए। हालांकि ट्रेन के रखरखाव व मरम्मत के काम के कारण इसे गुरुवार सुबह छह बज कर  35 मिनट पर रवाना किया जा सका । 
रेल महकमे की कारगुजारी देखिए कि एक ओर महीनों पहले से टिकट कराए यात्रियों की ट्रेनों ऐन वक्त पर बिना किसी चिंता या वैकल्पिक इंतजाम के रद्द कर दी जाती है, दूसरी ओर कुछ खास लोगों के लिए चंद घंटे की नोटिस पर खास इंतजाम कर दिया जाता है।
बुधवार को रेलवे बोर्ड ने फरमान जारी किया कि म्ांुबई (बांद्रा टर्मिनस ) के लिए राजधानी दर्जे की विशेष ट्रेन चलाई जाए। तय हुआ कि सुपरफास्ट एसी एक्सप्रेस नाम से गाड़ी संख्या 04092 और 0491 चलाई जाएगी। इसे रात करीब साढ़े ग्यारह बजे का चलाने का समय भी मुकर्रर कर दिया गया। वीआईपी सुविधा का इतना खयाल कि रेलवे मे मौजूद सबसे बेहतरीन कोच (एलएचवी ) लगाए गए। इनमें एसी टू के चार कोच और एसी थ्री के 13 कोच शामिल हैं। इनके अलावा जनरेटर कोच और दूसरे डब्बे भी लगाए गए ।                                                                                 
बोर्ड के संदेश के आधार पर निकाले गए आदेश मे कहा गया है कि त्योहारों के मौके पर यात्रियों की अतिरिक्त भीड़ को निकालने के लिए यह ट्रेन चलाई गई है। जबकि इसमें नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से महज 11 यात्रियों ने सफर किया। बहरहाल, त्योहारों या गर्मियों की छुट्टी में विशेष टेÑन चलाने के नियम तो हैं, पर ज्यादा मांग होने पर विशेष गाड़ी चलाई जाती है। यानी उस सूरत मे जाने वालों की तादाद 11 नहीं करीब 1100 तो होती।
जानकारों की मानें तो रेलवे विशेष ट्रेन चलाने मे ऐसी जल्दबाजी


नहीं करता। कम से कम इतना समय दिया जाना चाहिए कि लोगों क ो उस ट्रेन के बारे मे पता चल सके। बाकायदा विज्ञापन दिया जाता। उस टेÑन के लिए टिकट बुकिंग कराई जाती है। पर रेलवे की इस ट्रेन के बारे मे ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। अब सवाल यह है कि अगर दिल्ली से विशेष गाड़ी मुंबई के लिए चलाए जाने की इतनी ही जरू रत थीतो यात्री कम क्यों हैं? अगर यात्री नहीं थे तो इस ट्रेन का तुक क्या था?  इस गाड़ी को चलाने मे लाखों रुपए खर्च हुए और ट्रेन खाली जाने से एसी थ्री के प्रति यात्री  1500 रुपए किराए का नुकसान अलग। एसी टू का किराया और अधिक है । टेÑन की यात्री वहन क्षमता 1144 यात्री रही ।
इस फिजूलखर्ची का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसे लेकर गए कर्मचारियों की संख्या भी यात्रियों से अधिक रही।  दूसरी ओर जाने वाली तमाम नियमित और विशेष टेÑनों में तिल रखने भर को जगह नहीं है। यह दुरुपयोग का आलम तब है, जब रेलवे में संसाधनों की मांग और आपूर्ति मे भारी अंतर है। उत्तर रेलवे के महाप्रबंधक ने खुद प्रेस कांफ्रेंस मे कहा था कि उत्तर रेलवे मे यात्रियों की मांग रोजाना आठ से 10 लाख सीट की है,  हम दो सवा दो लाख को ही सेवाएं दे पाते हैं। एक ओर संसाधन का इस कदर बेजा इस्तेमाल हो रहा है, दूसरी ओर महीने दो महीने से टिकट कराकर घर जाने का इंतजार कर रहे यात्री ठगे से रह गए , जब बिना पूर्व सूचना व विकल्प दिए उनकी टेÑन रद्द कर दी गई।
इसी महीने की चार तारीख को एक नियमित ट्रेन मगध एक्सप्रेस को बिना किसी पूर्व नोटिस के रद्द कर दिया गया था। उत्तर रेलवे के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार का कहना है कि कई बार कोच की जरूरत क ो देखते हुए एक जगह से दूसरी जगह कोच भेजे जाते हैं । हो सकता है कि मुंबई मे आगे कहीं और भेजने की इन कोच की जरूरत हो। अगर यह मान भी लें तो इन कोच को मुंबई मे ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए जबकि निकाले गए आदेश मे अगले ही दिन इसकी (ट्रेन संख्या 04091)वापसी के समय व रास्ते का ब्योरा भी दिया गया है। यहां तक कि उसके वापस नई दिल्ली  व हजरत निजामुद्दीन स्टेशन पहुंचने का समय तक दिया है। लिखा है- टेÑन पूरा एक फेरा लगाएगी। यानी जाना और आना, दोनों। एक ओर में 1373 किलो मीटर का सफर।

 
 

आप की राय

क्या आपको लगता है कि स्पॉट फिक्सिंग मामले में दोषी खिलाड़ियों पर आजीवन प्रतिबंध लगा देना चाहिए?