जनसत्ता 20 मई, 2013: गणपत तेली के लेख ‘लफ्फाजियों के खंडहर’ (7 मई) में ‘चिड़ियाखाने में मार्क्सवाद’ (3 मई) का उत्तर देने की फिक्र है। मगर उस लेख की किसी बात का खंडन नहीं होता।
जनसत्ता 20 मई, 2013: दिग्विजय सिंह का कहना है कि अदालतों को सर्वोच्च पदों पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए, इनके हिसाब से ऐसा करना लोकतंत्र को खतरे में डालना है। उनके इस वक्तव्य से मेरे मन में कुछ सवाल उभरते हैं। क्या लोकतंत्र
जनसत्ता 18 मई, 2013: पाकिस्तानी अवाम ने नवाज शरीफ को मुल्क की बागडोर सौंपी है। नवाज शरीफ इस नई पारी में कितने सफल होंगे यह तो वक्त बताएगा लेकिन फिलहाल उनके लिए समस्याएं मुल्क के अंदर और बाहर दोनों ओर मुंह बाए खड़ी हैं।
जनसत्ता 18 मई, 2013: आइपीएल प्रतियोगिता इन दिनों चरम पर है। शीघ्र ही फाइनल मैच भी खेला जाएगा। जिसके पास समय की कमी नहीं है, वह इसे देख रहा है- चाहे घर पर या मैदान में।
जनसत्ता 17 मई, 2013: पाकिस्तान की हर छोटी-बड़ी घटना हमारे लिए महत्त्वपूर्ण बन जाती है। इस समय मीडिया और प्रबुद्ध वर्ग के लिए पाकिस्तान में सत्ता का हस्तांतरण चर्चा का विषय बन गया है।
जनसत्ता 17 मई, 2013: शंकर शरण का लेख ‘चिड़ियाखाने में मार्क्सवाद’ (जनसत्ता, 3 मई) जहां वामपंथियों को अपना निशाना बनाता है तो उसके विरुद्ध गणपत तेली का लेख ‘लफ्फाजियों के खंडहर’ (जनसत्ता, 7 मई) दक्षिणपंथी संघियों को।
जनसत्ता 16 मई, 2013: मुल्क की राजनीति का चाल, चरित्र और चेहरा कितना विकृत और विचित्र हो चुका है इसका अनुभव उन्हें जरूर होगा, जिन्होंने कांग्रेस पार्टी को सर्वहारा वर्ग की राजनीति करते देखा-सुना था।
जनसत्ता 16 मई, 2013: कोयला घोटाला मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने देश की सबसे प्रतिष्ठित जांच एजेंसी सीबीआइ को पिंजड़े में कैद सरकारी तोता कहा जो अपने मालिक (यानी सत्ताधारी पार्टी) की जुबान बोलता है।