सय्यद मुबीन ज़ेहरा जनसत्ता 12 मई, 2013: समाज में जब भी किसी हादसे या प्रकरण के जरिए अंधविश्वास के पनपने का पता चलता है तो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि उसका मुख्य शिकार महिला होती है।
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अजेय कुमार जनसत्ता 12 मई, 2013: अपूर्वानंद ने अपने लेख ‘सहमत व्यक्तित्व’ (जनसत्ता, 5 मई) में बहुत संजीदा ढंग से कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य के रूप में काम करने के अपने अनुभवों का साझा किया है।
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विवेकानंद जनसत्ता 12 मई, 2013: ‘अनंतर’ (5 मई) में ओम थानवी हिंदी की दुर्दशा से पीड़ित, बल्कि किसी हद तक आहत जान पड़े।
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तरुण विजय जनसत्ता 12 मई, 2013: उसका निर्दोष, मनोहर, सुदर्शन चेहरा मैं भूल नहीं पाता। हल्की बिस्कुटी शर्ट, छोटा-सा दार्इं ओर बंधा भूरी किनारी का परंपरागत मुंड (शायद उत्तर भारत में उसे लुंगी कहेंगे), पांव में हवाई
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अशोक वाजपेयी ‘वायु की भटकी एक तरंग’ जनसत्ता 12 मई, 2013: कहूं, क्या हूं मैं उद्भ्रांत! विवर में नील गगन के आज वायु की भटकी एक तरंग, शून्यता का उजड़ा-सा राज।
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लक्ष्मीधर मालवीय जनसत्ता 12 मई, 2013: आधी सदी से अधिक पुराना वाकया है। हिंदू यूनिवर्सिटी में हम उस बंगले में रहते थे, जो अब मालवीय भवन नामक स्मारक है।
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जनसत्ता 12 मई, 2013: सुपरिचित कथाकार शैलेंद्र सागर का नया उपन्यास एक सुबह यह भी पिछड़ी जातियों में हो रहे उस घात-प्रतिघात पर रोशनी डालता है, जिसका एकमात्र मकसद सत्ता पाना और हर कीमत पर उसे अपने पास बनाए रखना है।
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जनसत्ता 12 मई, 2013: सबसे अच्छी यात्राएं वे होती हैं जो सिर्फ भूगोल में नहीं, इतिहास में भी की जाती हैं। इसी तर्क से सबसे अच्छे यात्रा वृत्तांत वे होते हैं जो सिर्फ भूगोल का नहीं, इतिहास का भी सुराग देते हैं।
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तवलीन सिंह जनसत्ता 12 मई, 2013: कर्नाटक से जब खबर मिली कि भारतीय जनता पार्टी की तगड़ी हार हुई है चुनाव में, तो मुझे खुशी हुई।
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ओम थानवी
जनसत्ता 5 मई, 2013: चंडीगढ़ में दस साल रहा हूं। जयपुर की तरह जब-तब वहां के अखबारों को नेट पर देख आता हूं। इस तरह शहर से एक रिश्ता बना रहता है। कुछ मीठी यादें, कुछ सोए गम जाग जाते हैं।
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अपूर्वानंद जनसत्ता 5 मई, 2013: बात कोई पचीस साल पहले की है। हम कम्युनिस्ट पार्टी के नए-नए सदस्य हुए थे। पार्टी के जिला सम्मेलन में बतौर ‘डेलिगेट’ शामिल होने के सौभाग्य से जो रोमांच हुआ था, आज उसे खुद समझ पाना कठिन
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