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Tu Hai Mera Sunday movie review: सुकून की तलाश

आप अपना रविवार कैसे मनाते हैं? छुट्टी के एक दिन को कैसे गुजारते हैं?

आप अपना रविवार कैसे मनाते हैं? छुट्टी के एक दिन को कैसे गुजारते हैं? बड़े शहरों में, खासकर मुंबई जैसे महानगरों में अपने लिए जगह की तलाश कैसे करते हैं? या कभी यह सोचते हैं कि शहरों में आम आदमी के लिए सार्वजनिक जगह कम होती जा रही है और अगर कभी आपको लगे कि थोड़ी देर के लिए शहर में अपना कोई एकांत कोना हो तो क्या वह मिल पाएगा? ऐसे कई खयाल ‘तू है मेरा संडे’ को देखने के बाद आपके मन में आ सकते हैं। फिल्म पांच दोस्तों की कहानी है, जो हर रविवार मुंबई के एक बीच यानी समुद्र तट पर फुटबॉल खेलने जाते हैं। पर फुटबॉल खेलना तो एक बहाना है। असल बात है अपने लिए जगह की तलाश। सिर्फ भौगोलिक ही नहीं मानसिक सुकून देनेवाले जगह की तलाश। क्या उनकी यह तलाश पूरी होती है?

पांच दोस्त हैं अर्जुन ( बरुण सोबती), डॉमनिक (विशाल मल्होत्रा), मेहरनोश (नकुल भल्ला), राशिद (अविनाश तिवारी) और जयेश (जय उपाध्याय)। पाचों की जिंदगी की अपनी परेशानियां हैं। किसी के घर में तो किसी के दफ्तर में। इनमें से कुछ के अंदर गुस्सा भरा है। जैसे राशिद के भीतर इस बात का कि उसकी शादी अपनी हिंदू प्रेमिका से इसलिए नहीं हो पाई कि वह मुसलमान है। डॉमनिक के परिवार में झगड़े होते रहते हैं। इसी वजह से पाचों दोस्तों के रविवार-मिलन कार्यक्रम में यदाकदा सामूहिक जीवन में आपसी तनाव भी उभर आते हैं। इसी दौरान अर्जुन और काव्या (शाहना गोस्वामी) के बीच एक रिश्ता पनपता है। वजह है शहाना का पिता (शिव सुब्रमण्मयम), जो अलजाइमर का शिकार है।

अर्जुन उस अपने साथ फुटबॉल खेलने ले जाता है हालांकि उसके दोस्त नहीं चाहते। काव्या एक आत्मविश्वास से भरी लड़की है। लेकिन शहर में एक रिहायशी कॉलोनी की पानी की टंकी के ऊपर बैठकर एकांत महसूस करती है। उसे अर्जुन से लगाव होता है पर क्या अर्जुन इसके लिए तैयार है? क्या ये रिश्ता कभी परवान चढ़ सकेगा? ‘तू है मेरा संडे’ एक धीमी फिल्म जरूर है और कुछ जगहों पर अच्छे संपादन की भी कमी है, फिर भी यह सकारात्मक सोच की है और मुश्किलों के बावजूद जिंदगी को मन से जीने की तरफ ले जाती है।

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