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फिल्मकारों को आज भी खींचते हैं चंबल के बीहड़

आज भी फिल्मकारों का मोह चंबल के बीहड़ों से है । खूंखार डाकुओं की शरणस्थली चंबल घाटी दशकों से सिनेमाई फिल्मकारों के आकर्षण का केंद्र रही है।
Author August 11, 2017 02:00 am
तिग्मांशु धूलिया

तिग्मांशु धूलिया बॉलीवुड के ऐसे फिल्मकार हैं जो किसी भी परिचय के मोहताज नहीं है। जहां बॉलीवुड के ज्यादातर निर्देशक विदेशी लोकेशन को पंसद करते हैं वही धूलिया का लगाव अपने देश की चंबल घाटी से है। चंबल घाटी के प्रति उनकी दीवानगी इतनी है कि वे इसकी तुलना अमेरिका के ग्रांड कैनीयन से करने से भी पीछे नहीं रहे लेकिन चंबल के बदलते मिजाज से परेशान धूलिया यह कहने से भी नहीं चूकते कि अगर समय रहते चंबल के लिए कुछ किया नहीं गया तो देश के बेहतरीन पर्यटन केंद्र को हम खो देंगे।

आज भी फिल्मकारों का मोह चंबल के बीहड़ों से है। खूंखार डाकुओं की शरणस्थली चंबल घाटी दशकों से सिनेमाई फिल्मकारों के आकर्षण का केंद्र रही है। यहां पर सैकड़ों की तादाद में डकैतों की जिंदगी से जुड़ी हुई फिल्मों का निर्माण हो चुका है। भारतीय सिनेमा इतिहास मे अभी तक डाकुओं के जीवन या फिर डाकुओं से जुड़ी हुई फिल्मों को बनाने के दौरान इस बात का ध्यान जरूर रखा गया है कि निर्माता निर्देशकों ने चंबल के बीहड़ों का ही रुख किया है। इस लिहाज से एक बात साफ हो चली है कि चंबल आज भी डाकुओं की फिल्मों के लिए निर्माता निर्देशकों के लिए पहली पसंद बना हुआ है। डाकुओं से जुड़ी हुई अभी तक भारतीय सिनेमा निर्माता निर्देशकों की जो भी फिल्में आई हैं, उसमें चंबल की भूमिका लोकेशन के हिसाब से सबसे अहम रही है। दरअसल बीहड़ में फिल्म का अधिकांश भाग शूट किया गया है।

डाकुओं के जीवन से जुड़ी नामी और गैरनामी फिल्मों की बात करें तो कई सैकड़ा फिल्में इस चंबल की गवाह बन चुकी हैं लेकिन लोकप्रियता के मुहाने पर हर फिल्म नहीं पहुंच सकी है। शोले फिल्म को सिनेमाई दुनिया का मील का पत्थर माना जाता है। 1975 में बनी इस फिल्म मे चंबल को जिस ढंग से पेश किया वो वाकई काबिले तारीफ है। हिंदी फिल्मकारों के लिए डकैत और बीहड़ शुरू से ही पसंदीदा विषय रहे हैं। जिस देश में गंगा बहती है, मेरा गांव मेरा देश मुझे जीने दो, बिंदिया और बंदूक, डकैत, शोले जैसी कई फिल्मों में खूबसूरत बीहड़ और डकैतों के जुल्म की दास्तां को पर्दे पर उतारा गया है। इससे पहले डाकू हसीना, डाकू सुल्ताना, मदर इंडिया, डाकू मंगल ंिसंह, जीने नही दूंगा, मेरा गांव मेरा देश के अलावा सिनेमा निर्माताओं को कोई नाम नहीं सूझा तो चंबल की कसम और चंबल के डाकू नाम से ही फिल्में बना दी गईं ।

यह तो सिर्फ बानगी भर थी। यही कारण है कि प्रकृति की इस अद्भुत घाटी को दुनिया भर के लोग सिर्फ और सिर्फ डकैतों की वजह से ही जानते हैं। फूलन देवी के जीवन पर बनी शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन की चर्चा किए बिना रहा नहीं जा सकता है। इसी तरह से कृष्णा मिश्रा की सीमा परिहार के जीवन पर बनी फिल्म वुंडेड को भी जगह मिल सकती है। वुंडेड नामक फिल्म बना करके चंबल का आंनद ले चुके फिल्म निर्माता कृष्णा मिश्रा का कहना है कि चंबल का बीहड़ रियल शूटिंग के लिए सबसे उपयुक्त है। इसी वजह से चंबल के आकर्षण से निर्माता दूर नहीं जा पा रहा है।

चंबल के डकैतों पर सौ से अधिक फिल्में बन चुकी हैं। इसमें से सनी देओल की फिल्म डकैत रही है। यह फिल्म अटेर के गांव चोम्हों में स्थिति हवेली में शूट हुई थी। डकैतों पर अब तक की सबसे प्रसिद्ध फिल्म बैंडिट क्वीन फूलन देवी की जीवन पर थी। इसके अलावा चंबल की कसम फिल्म की शूटिंग भी यादगार रही । तिग्मांशु धूलिया निर्देशित पान सिंह तोमर का तो कोई मुकाबला ही नहीं है क्योंकि पान सिंह तोमर की वास्तविक जिंदगी पर फिल्म बना कर तोमर के डाकू बनने की कहानी पेश कर पुलिसिया कारगुजारियों को उजागर किया गया।
फिर आई बुलेट राजा की भी कुछ शूटिंग चंबल घाटी में ही हुई।

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