ताज़ा खबर
 

…और मदन मोहन के संगीत में खामोश हो गया सितार

कई बार ऐसे मौके आते हैं जब छोटी-छोटी बातें रिश्तों में ऐसी दरार पैदा कर देती हैं, जिन्हें भरा नहीं जा सकता। संगीतकार मदन मोहन और सितारवादक उस्ताद रईस खान की प्रगाढ़ दोस्ती के बीच भी ऐसी ही दरार पैदा हुई।

कई बार ऐसे मौके आते हैं जब छोटी-छोटी बातें रिश्तों में ऐसी दरार पैदा कर देती हैं, जिन्हें भरा नहीं जा सकता। संगीतकार मदन मोहन और सितारवादक उस्ताद रईस खान की प्रगाढ़ दोस्ती के बीच भी ऐसी ही दरार पैदा हुई। दोनों एक दूसरे की भावनाओं को नहीं समझ पाए, अलग हो गए। हिट संगीत, मगर फिल्म फ्लॉप। इस नियति से लंबे समय तक मदन मोहन को जूझना पड़ा। उनकी फिल्म ‘भाई भाई’ (1956) जब सिनेमाघरों में 24वें हफ्ते में चल रही थी, तो लगता था कि यह सिल्वर जुबिली होगी। मगर इसके निर्माता-निर्देशक के बीच हुए झगड़े के कारण इसे 24वें हफ्ते में थियेटरों से उतारना पड़ा। मदन मोहन की ‘दस्तक’ ने चार राष्ट्रीय पुरस्कार जीते थे। उर्दू के नगमानिगार राजेंदर सिंह बेदी की बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म थी। फिल्म में रईस खान की सितार से सजे ‘बैयां न धरो…’ और ‘हम हैं मता-ए-कूचा ओ बाजार की तरह…’ गानों को अपार लोकप्रियता मिली।

रईस खान की सितार के सुरों से मदन मोहन ने ‘आज सोचा तो आंसू भर आए…’ (हंसते जख्म), ‘नैनों में बदरा छाए…’(मेरा साया) जैसे कई मधुर गाने बनाए। दोनों के बहुत करीबी रिश्ते बन गए थे और मदन मोहन हमेशा रईस खान को उनके काम के दौरान पूरी आजादी देते थे। मदन मोहन के एक पारिवारिक समारोह में रईस खान ने एक कार्यक्रम पेश किया। पैसों की बातें करने से हमेशा बचने वाले मदन मोहन ने अपने मैनेजर के जरिये इसका मेहनताना अदा करना चाहा, तो रईस खान के दिल को ठेस लगी, वह बहुत आहत हुए।

रईस खान अपने फन के माहिर थे। अगर लता मंगेशकर मदन मोहन को अपना भाई कहती थीं, तो रईस खान को ‘सितार का जादूगर’। उस्ताद इंदौर में पैदा हुए। मुंबई में पढ़े। चौथी बेगम के रूप में पाकिस्तानी गायिका बिलकिस खानम से निकाह करने के बाद पाकिस्तान चले गए थे और उन्हें वहां तीसरे नंबर का प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘सितारा-ए-इम्तियाज’ मिला। उस्ताद पहले ऐसे पाकिस्तानी गायक थे जिन्हें 2012 में भारतीय संसद में कार्यक्रम करने का सम्मान प्राप्त हुआ।

दूसरी ओर मदन मोहन थे, जिनमें अद््भुत प्रतिभा थी। बचपन में वह, सुरैया और राज कपूर साथ में गाते रहते थे। मदन मोहन ने शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली। मगर उनकी दो गजलों (‘आप की नजरों ने समझा प्यार के काबिल मुझे…’ और ‘है इसी में प्यार की आबरू…’ फिल्म अनपढ़) सुनकर संगीतकार नौशाद ने कहा था कि ये दो गजलें उनके दिए पूरे संगीत के बराबर हैं। राज कपूर ने उनके एक गाने को सुनने के बाद कहा था कि अगर यह संगीत मिल जाए तो उस पर वह ऐसी फिल्म बनाएंगे जो कभी सिनेमाघरों से न उतरे। मदन मोहन के निधन के सालों बाद यश चोपड़ा को उनके संगीत की जरूरत महसूस होती है और वह उनकी इस्तेमाल न की गई धुनों पर ‘वीर जारा’ बनाते हैं।

कहा जाता है कि जितना बड़ा कलाकार होता है, उतना ही बड़ा अहंकार होता है। तो हुआ यह कि पैसों की बात पर आहत रईस खान ने एक दिन मदन मोहन को अपने घर बुलाया और कहा कि उनके एक मित्र के यहां शादी है। क्या मदन मोहन उस शादी में गाना पसंद करेंगे। और अगर करते हैं तो इसके लिए कितना मेहनताना लेंगे। रईस खान की बात सुनकर मदन मोहन को बुरा लगा। वह समझ गए कि उस्ताद क्या कहना चाहते हैं।
रईस खान और मदन मोहन के अहंकारों के इस टकराव का नतीजा यह निकला कि 1972 के बाद मदन मोहन के संगीत से रईस खान की सितार गायब हो गई और सिनेमा संगीत प्रेमी कुछ और अच्छी धुनों से वंचित रह गए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग