December 08, 2016

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अमृता ने साहिर के संग पहली मुलाकात पर लिखा था ‘आखिरी खत’ लेकिन नहीं आया था कोई जवाब…

8 मार्च 1921 को लुधियाना में जन्मे साहिर ने 25 अक्टूबर 1980 को मुंबई में आखिरी सांस ली थी।

साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम (Source: Express Archive)

उर्दू शायर और फिल्म गीतकार साहिर लुधियानवी और पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम की प्रेम कहानी भारतीय साहित्य इतिहास की सबसे मिथकीय प्रेम कथाओं में एक है। दोनों ने बहुत कम वक्त एक साथ गुजारा, वो जब मिलते थे तो बहुत कम बातें करते थे लेकिन साहित्यिक दायरे में उनके प्यार के बातें अक्सर होती रहती हैं। साहिर जब अमृता से पहली बार मिले तो वो शादीशुदा थीं। दोनों के मुलाकात की वजह बनी शायरी। वही शायरी जिसके लिए उर्दू साहित्य में साहिर और पंजाबी साहित्य में अमृता अहम मकाम रखती हैं। लेकिन जब वो मिले थे तो दोनों ही नौजवान थे। दोनों ने तब अदबी शोहरत नहीं हासिल की थी। साहिर और अमृता दोनों का ही इंतकाल अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में हुआ था। 8 मार्च 1921 को लुधियाना में जन्मे साहिर ने 25 अक्टूबर 1980 को मुंबई में आखिरी सांस ली थी। वहीं 31 अगस्त 1919 को गुजरांवाला( अब पाकिस्तान) में जन्मीं अमृता का निधन 31 अक्टूबर 2005 को हुआ था।

अमृता और साहिर पहली बार 1944 में लाहौर के करीब प्रीत नगर में एक उर्दू-पंजाबी मुशायरे में मिले थे।  अमृता को पहली मुलाकात में ही साहिर से प्यार हो गया। खुद अमृता के शब्दों में, “पता नहीं ये उसके लफ्जों का जादू था या उसकी खामोश निगाह का, लेकिन मैं उससे बंधकर रह गई थी।” उस रात मुशायरा खत्म होते ही बाहर बारिश होने लगी। उस रात और बारिश को याद करते हुए अमृता ने लिखा है, “अब जब मैं उस रात के बारे में सोचती हूं तो लगता है कि नियति ने मेरे दिल में प्यार का बीज बोया और बारिश ने उसे सींचा।”

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भारत के बंटवारे के बाद अमृता अपने परिवार के साथ दिल्ली चली आईं, वहीं साहिर कुछ साल बाद मुंबई चले गए। उसके बाद उन दोनों के बीच मिलना-जुलना लगभग बंद हो गया। लेकिन उनके दिलों का प्यार कभी नहीं मिटा। साहिर से जुड़े अहसास अमृता की कविताओं-कहानियों में जाहिर होते रहे। सभी अहसासों के बीच साहिर से पहली मुलाकात की उनकी दिल में खास जगह हमेशा बनी रही। 1955 में जब दिल्ली से निकलने वाली उर्दू पत्रिका आईना ने अमृता से कोई कहानी मांगी तो उन्होंने साहिर के संग अपनी पहली मुलाकात का किस्सा “आखिरी खत” कहानी के रूप में लिखकर दे दिया। हालांकि कहानी छपने के बाद साहिर की तरफ से उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।

अक्षय मानवानी ने साहिर की जीवनी “साहिर लुधियानवी: द पीपल्स पोएट” लिखी है। मनवानी लिखते हैं उस कहानी के छपने के बाद जब एक बार अमृता अचानक साहिर से टकरा गईं। साहिर ने उन्हें बताया कि “आखिरी खत” पढ़कर उन्हें इतनी खुशी हुई थी कि वो चाहते थे कि अपने सभी दोस्तों को वो कहानी पढ़वाएं कि देखो ये कहानी मेरे लिए लिखी गई है लेकिन वो चुप रहे। साहिर को डर था कि ख्वाजा अहमद अब्बास और कृशन चंदर जैसे दोस्त उनकी बात सुनकर हँसेंगे और उन्हें पागल समझेंगे।

साहिर और अमृता की कहानी का अंत बहुत सुखद नहीं रहा। साहिर ने कभी अमृता के सामने विवाह का प्रस्ताव नहीं रखा। उधर अपने पहले पति से तलाक ले चुकीं अमृता चित्रकार इमरोज के साथ रहने लगीं। साहिर ने ताउम्र शादी नहीं की।  लेकिन अमृता साहिर के लिए क्या थीं ये मनवानी की किताब में जिक्र किए गए एक वाक़ये से पता चलता है। दिल्ली में एक बार अमृता साहिर और उनकी मां से मिलने आईं थीं। उनके जाने के बाद दोस्तों के सामने ही साहिर ने अपनी मां से कहा, “मांजी, ये अमृता थी, जानती हो ना? ये आपकी बहू बन सकती थी।” उनकी मां ने जवाब में कहा था, “बेटा, बहू बनाओ तो सही किसी को।”

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First Published on October 25, 2016 6:06 pm

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