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बेटे दिनेश ने कहा- शैलेंद्र की ‘लॉबी’ होती तो जरूर मिलते पुरस्कार

बहुत से गीत ऐसे हैं जिनके मुखड़े बातचीत करते, सड़क पर चलते अधरों से यूं ही फिसल जाते थे।
Author मथुरा | August 30, 2017 10:38 am
गीतकार शैलेंद्र और राज कपूर।

अशोक बंसल

गीतकार शैलेंद्र की कोई लॉबी नहीं थी और वह इस सब पर यकीन भी नहीं करते थे। यदि लॉबी होती तो उनके निधन (1966) के बाद उन्हें कई पुरस्कार मिलते। हां, यह जरूर है कि उनकी याद में भारत सरकार ने डाक टिकट निकाला था। यह सम्मान उल्लेखनीय है। यह बात शैलेंद्र के बेटे दिनेश शंकर ने जनसत्ता से यहां साक्षात्कार में कहीं। दिनेश शंकर अभी मुंबई में रहते हैं। दुबई से यहां आईं उनकी बेटी अमला ने भी पिता की यादें ताजा कीं। दिनेश और अमला पिछले दिनों अपने पिता के गृहनगर मथुरा में उनकी याद में एक सड़क का नाम रखने से संबंधित कार्यक्रम में आए थे। यह कार्यक्रम प्रतिष्ठित संस्था ‘जन सांस्कृतिक मंच’ ने किया।  उल्लेखनीय है कि मथुरा की सांसद हेमामालिनी ने शैलेंद्र्र की स्मृति में मथुरा में एक द्वार बनवाने की घोषणा की थी लेकिन बाद में उन्होंने यह कहकर कन्नी काट ली कि यह काम सांसद का नहीं, पालिका अध्यक्ष का है। पालिका अध्यक्ष मनीषा गुप्ता ने द्वार तो नहीं एक सड़क का नाम शैलेंद्र्र पर करने की घोषणा की और फिर उस पर अमल भी किया। शैलेंद्र का परिवार इस कार्य से गदगद है। दलित परिवार के शैलेंद्र्र ने अंग्रेजी जमाने में मथुरा से हाईस्कूल और इंटर किया था और नौकरी की शुरुआत भी मथुरा रेलवे से की थी।

बेटे दिनेश के मुताबिक बहुत से गीत ऐसे हैं जिनके मुखड़े बातचीत करते, सड़क पर चलते अधरों से यूं ही फिसल जाते थे। जैसे -फिल्म ‘सपनों के सौदागर’ के निर्माता बी. अनंथा स्वामी ने एक गाना लिखने को दिया। काफी वक्त निकल गया।एक दिन अनंथा स्वामी और बाबा का आमना-सामना हो गया। अनंस्था को नाराज देखकर बाबा के मुंह से निकल पड़ा -‘तुम प्यार से देखो, हम प्यार से देखें, जीवन की राहों में बिखर जाएगा उजाला।’ यह लाइन सुन स्वामी बोले आप इसी लाइन को आगे बढाइए। इस तरह ‘सपनों के सौदागर’ फिल्म के इस गाने का जन्म हुआ। इसी तरह 1955 में आई फिल्म ‘श्री 420’ के गाने ‘मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के’ के जन्म की कहानी है। बाबा ने नई कार ली थी। बाबा सैर पर निकले। लाल बत्ती पर कार रुकी। तभी एक लड़की कार के पास आकर खड़ी हो गई। सभी उसे कनखियों से निहारने लगे। बत्ती हरी हुई तो कार चल पड़ी। शंकर उस लड़की को गर्दन घुमा कर देखने लगे। बाबा ने चुटकी ली ‘मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के’ बस फिर क्या था। सभी चिल्लाए- पूरा करो, पूरा करो’ कार चलती रही और पूरे गाने का जन्म कार में हो गया।

राजकपूर और शैलेंद्र्र के रिश्तों में खटास आने की बात पर बेटी अमला ने कहा कि कुछ वैचारिक मतभेद ‘तीसरी कसम’ के अंत हुए थे। राज अंकल चाहते थे कि फिल्म का अंत सुखद हो। बाबा ने कहा कि अंत ट्रेजिक है तभी तो कहानी टाइटिल ‘तीसरी कसम’ को चरितार्थ करती है। बाबा अड़े रहे। इससे राज अंकल दुखी हुए थे। इसी तरह ‘जिस देश में गंगा बहती है’ फिल्म में एक गाना है- ‘कविराज कहे, न राज रहे न ताज रहे न राज घराना …..’ लोगों ने राज अंकल को भड़काया कि शैलेंद्र्र ने इस गाने में आप पर चोट की है। राज अंकल ने शैलेंद्र्र के आलोचकों की खिल्ली उड़ाई। राज अंकल ने बाबा के जाने के बाद हमारे परिवार की बहुत मदद की। बाबा के ऊपर कर्ज देने वालों ने मुकदमे चलाए तब मदद की। वे मेरी शादी में आए थे। मुझे याद है बाबा के अंतिम संस्कार के दौरान राज अंकल हमारे घर में गैराज के पास दुखी खड़े थे। हम सबने उन्हें कहते सूना-‘कमबख्त, तुझे आज का दिन ही चुनना था।’ (दरअसल, 14 दिसंबर जिस दिन शैलेंद्र्र की मृत्यु हुई उस दिन राजकपूर का जन्मदिन भी था)। दिनेश ने बताया कि बाबा की मौत की वजह ‘तीसरी कसम’ से होने वाले घाटे के बाद मित्रों और रिश्तेदारों का मुुंह मोड़ लेना रहा। इसके अलावा मदिरा पान भी था। उन्हें लिवर सिरोसिस हुआ था।

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