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नृत्यः सत्रीय नृत्य अनंत सागर है

सत्रीय नृत्य असम का लोकप्रिय शास्त्रीय नृत्य है। वहां हर घर की लड़कियां इसे सीखतीं हैं। असम में कला, साहित्य और संस्कृति के प्रति जनमानस में गहरी अभिरुचि है।
फाइल फोटो

सत्रीय नृत्य असम का लोकप्रिय शास्त्रीय नृत्य है। वहां हर घर की लड़कियां इसे सीखतीं हैं। असम में कला, साहित्य और संस्कृति के प्रति जनमानस में गहरी अभिरुचि है। शहर के हर चौराहे पर किताब और वाद्य यंत्रों की दुकानें नजर आती हैं। फिर, महान संत शंकर देव ने सत्र परंपरा को स्थापित किया। उसे आज भी समाज सत्रीय नृत्य संगीत को प्रोत्साहित करके किसी न किसी रूप में संरक्षित कर रहा है। इस क्रम में संगीत नाटक अकादमी का प्रयास भी सराहनीय है। यह तथ्य भी महत्त्वपूर्ण है कि कुछ कलाकार अपने प्रयासों से सत्रीय नृत्य को असम के अलावा, देश के सभी प्रदेशों के लोगों से इसे परिचित करवाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। इसमें एक नाम नवोदित नृत्यांगना मीनाक्षी मेधी का है।

मीनाक्षी मेधी ने सत्रीय नृत्य की आरंभिक शिक्षा जीवनजीत दत्ता से ग्रहण की। इसके बाद, वह माजुलि के उत्तर कमलाबाड़ी सत्र से जुड़ीं। उन्होंने डॉ जगन्नाथ महंत और हरिचरण भूइयां बरबायन से नृत्य सीखा। इस दौरान मीनाक्षी को आभास हुआ कि सत्रीय नृत्य सिर्फ साधारण अंग, हस्त या पद संचालन नहीं है, बल्कि यह पूरा दर्शन-शास्त्र है। इसी क्रम में उन्होंने दर्शनशास्त्र से अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की और फिर दर्शन शास्त्र की गहराइयों वाली भावनाओं से सत्रीय नृत्य की बारीकियों को देखना शुरू किया। मीनाक्षी मेधी बताती हैं कि एक सत्रीय नृत्यांगना को लगभग सात साल तक नृत्य सीखने के बाद पारंगत माना जाता है। लेकिन, मुझे लगता है कि मैं सत्रीय नृत्य में विशारद की उपाधि पाकर भी अभी सीख ही रही हूं। सत्रीय नृत्य में भक्ति और अध्यात्म का भाव प्रधान है। मुझे लगता है कि किसी भी शास्त्रीय नृत्य को सीखना तभी सफल माना जा सकता है, जब आप उसे पूरे समर्पण और लगन से सीखते हैं। हमारा नृत्य भगवान को समर्पित होता है। ईश्वर यानी आत्मा यानी हम स्वयं अर्थात नृत्य सीखना, दरअसल खुद से परिचित होना है। आप पेशेवर नर्तक बनें या न बनें इससे फर्क नहीं पड़ता है, न ही आपको मंच पर प्रस्तुति देने के लिए उतावला होने की जरूरत है। जरूरत है तो नृत्य के जरिए अपने साहित्य और संस्कृति से गहराई से जुड़ने और उससे परिचित होने की।

नृत्यांगना मीनाक्षी मेधी ने भरतनाट्यम और सत्रीय दोनों नृत्य सीखे हैं। मीनाक्षी कहती हैं कि जिस तरह भरतनाट्यम में अरईमंडी महत्त्वपूर्ण भंगिमा है, वैसे ही सत्रीय नृत्य में ओरा है। भरतनाट्यम में हम लास्य और तांडव भावों को प्रधानता देते हैं, वहीं इस नृत्य शैली में प्रकृति और पुरुष हैं। शंकरदेव जी ने अंकीय भावना की शुरुआत की। इसमें नृत्य नाटिका शैली प्रचलित थी। माधव देव ने इसे ही परिष्कृत करके सत्रीय नृत्य के ओजापाली, अभिनय, हस्तकों, चारी भेद, पद संचालन कोमल और सौम्य हैं।

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली के इंदिर गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में कार्यशाला सहनर्तन का आयोजन किया गया। इसके दौरान मीनाक्षी मेधी ने दिल्ली, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल के प्रतिभागियों को सत्रीय नृत्य की बारीकियों से परिचित करवाया। इस दौरान, उन्होंने कृष्ण नृत्य, महादेव घोष-श्रीमंत शंकर हरि भक्तारा, अपराध विनाशोनो तोजू नमो नारायण, अभिनय लउनू चोरी, सालि नाच रामदानी व मुक्तिता निस्पृह इतु सेहि नृत्यों को सिखाया। फिर, पंद्रह दिवसीय कार्यशाला के अंतिम दिन प्रतिभागियों ने नृत्य प्रस्तुत किया।

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