ताज़ा खबर
 

आॅनलाइन कथक: कहीं बिगड़ न जाए लय-ताल

मंदिरों में पनपी, विकसित और प्रफुल्लित हुई शास्त्रीय नृत्य की विधा कथक मुगल काल में दरबार में पहुंची तो कई विकारों से ग्रस्त हुई थी पर उसमें सौम्यता, भक्ति भावना, समर्पण और आस्था तब भी विद्यमान रही।
Author July 7, 2017 01:55 am
कथक में पारंगत दिव्या दीक्षित गोस्वामी

वंदना शर्मा
मंदिरों में पनपी, विकसित और प्रफुल्लित हुई शास्त्रीय नृत्य की विधा कथक मुगल काल में दरबार में पहुंची तो कई विकारों से ग्रस्त हुई थी पर उसमें सौम्यता, भक्ति भावना, समर्पण और आस्था तब भी विद्यमान रही। इसके बाद बॉलीवुड के जरिए यह विधा ‘कर्ता’ के साथ कब कैमरों के लेंस तक सिमट गई, पता ही नहीं चला। इसके साथ ही अनगिनत आॅनलाइन द्रोणाचार्य उग आए जिन्होंने शारीरिक रूप से तो जरूर इसे आमजन तक पहुंचाने का वादा पूरा किया है पर इसकी आत्मा को बहुत जख्म दिए हैं।
बेशक ये आॅनलाइन गुरु दावा करते हैं कि उन्होंने लाखों लोगों को कथक में पारंगत बना दिया है। लेकिन सवाल यह है कि इस दैवीय विधा को आॅनलाइन सीखना कितना संभव है। यह भी सवाल उठता है कि बिरजू महाराज भी तो आॅनलाइन कक्षाएं पढ़ाते हैं, तो क्या वे भी इसे सही मानते हैं?
बिरजू महाराज के भतीजे और नृत्य गुरु मुन्ना शुक्ला तो आॅनलाइन कक्षाओं को सिरे से ही नकार देते हैं। मुन्ना शुक्ला का कहना है कि इसमें घोर साधना, तपस्या जरूरी है जो बिना प्रत्यक्ष गुरु के संभव ही नहीं।

कथक में पारंगत दिव्या दीक्षित गोस्वामी कहती हैं-यह सही है कि प्रौद्योगिकी हमारी सुविधा के लिए है पर इसका इस्तेमाल एक सीमा तक ही ठीक है। यहां तक कि उनके गुरु बिरजू महाराज ने भी अपने गुरु के संग बरसों तक रियाज करने के बाद ही इस ऊंचाई को प्राप्त किया। उन्होंने कहा कि सिर्फ आॅनलाइन देख कर ‘टुकड़ा’, ‘तिहाई’ सीखना कथक कतई नहीं है। 26 वर्षीय पल्लवी पुष्पराज नृत्य सीखती भी हैं और सिखाती भी हैं। उन्हें आॅनलाइन नृत्य सीखने से परहेज नहीं है। उसका मानना है कि शुरू में गुरु के पास सीखना बहुत जरूरी है पर उसके बाद अगर छोटे शहरों में रहने या आर्थिक वजह से कोई इसे नहीं सीख सकता है तो ऐसे में आॅनलाइन कक्षाएं बेहद फायदेमंद हैं।

प्राचीन कला केंद्र की प्रमुख शोभा कौसर का स्पष्ट कहना है कि सभी शास्त्रीय नृत्यों को सीखने समझने के लिए प्रत्यक्ष रूप से गुरु बेहद जरूरी है। वह दलील देती हैं कि शास्त्रीय नृत्य सीखने के लिए भक्ति भावना की बेहद जरूरत है। यह विधा ही गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित है। जब तक इस परंपरा का निर्वहन नहीं होगा तब तक भाव कैसे आ पाएंगे। शिष्य को हर पल गुरु के सान्निध्य में रहना होता है। शास्त्रीय नृत्य सीखने के लिए जिस आस्था, अनुशासन, समर्पण की जरूरत है वह आॅनलाइन प्रशिक्षण से संभव नहीं है।

दिव्या दीक्षित गोस्वामी सवाल करती हैं कि क्यों इस नृत्य को सीखने और इसमें पारंगत होने में इतने वर्ष लग जाते हैं? कई बार तो इसके लिए एक उम्र भी कम पड़ जाती है। फिर जवाब भी खुद ही देती हैं-ऐसा इसलिए होता है ताकि हर तरह से शिष्य में परिपक्वता आ सके। तो यह सब बिना प्रत्यक्ष गुरु के कैसे संभव है?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग