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फ़िल्म ‘पीके’ में कुछ भी ग़लत नहीं: दिल्ली हाई कोर्ट

दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि आमिर खान अभिनीत फिल्म ‘पीके’ में कुछ भी अपमानजनक नहीं है और इन आरोपों में कोई दम नहीं है कि फिल्म हिन्दू संस्कृति और धार्मिक परंपराओं को चोट पहुंचाती है। मुख्य न्यायाधीश जी रोहिणी और न्यायमूर्ति आरएस एंडला की पीठ ने कहा कि फिल्म में कुछ भी […]
Author January 7, 2015 17:32 pm
उन्होंने दावा किया कि फिल्म में उठाए गए कई मुद्दे इस पुस्तक से ‘नकल’ किए गए हैं। याचिकाकर्ता ने कहा कि उपन्यास में और अधिक ऐसी स्थितियां है जो छोटे मोटे बदलाव के साथ बड़ी ही चालाकी से नकल की गई है। (फोटो: बॉलीवुड हंगामा)

दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि आमिर खान अभिनीत फिल्म ‘पीके’ में कुछ भी अपमानजनक नहीं है और इन आरोपों में कोई दम नहीं है कि फिल्म हिन्दू संस्कृति और धार्मिक परंपराओं को चोट पहुंचाती है।

मुख्य न्यायाधीश जी रोहिणी और न्यायमूर्ति आरएस एंडला की पीठ ने कहा कि फिल्म में कुछ भी गलत नहीं है और गुणदोष के आधार पर विस्तृत आदेश जारी किया जाएगा। पीठ ने कहा कि फिल्म में क्या गलत है?

आप हर चीज का बुरा नहीं मान सकते। हमें याचिका में बताए आरोपों में कोई दम नहीं लगी। हम गुणदोष के आधार पर आदेश पारित करेंगे। सुनवाई के दौरान, अतिरिक्त सालिसिटर जनरल संजय जैन ने अदालत से कहा कि उच्चतम न्यायालय पहले ही इसी तरह की एक याचिका खारिज कर चुका है।

HC, High Court, PK, Peekay, Aamir Khan, Rajkumar Hirani खंडपीठ ने कहा कि फिल्म में गलत क्या है? हमने कुछ भी आपत्तिजनक नहीं पाया है। हमें नहीं लगता कि याचिका का कोई अर्थ है। (फोटो: बॉलीवुड हंगामा)

 

उन्होंने कहा कि फिल्म के प्रमाणन के खिलाफ अपील दायर करने का प्रावधान है। इस पर, अदालत ने कहा कि प्रमाणन के खिलाफ अपील का अधिकार फिल्म निर्माताओं तक सीमित है, यह किसी बाहरी व्यक्ति के लिए नहीं है।

उच्च न्यायालय अजय गौतम की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में फिल्म ‘पीके’ से ‘आपत्तिजनक’ दृश्यों को हटाने का निर्देश देने का अनुरोध करते हुये दावा किया गया था कि फिल्म की सामग्री ने हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई है।

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  1. J
    Jatish Dubey
    Jan 7, 2015 at 6:33 pm
    आज के भारत के मानव संसाधन की मानसिकताओं में माने और जाने जाने वाले धर्म शब्द और विज्ञान शब्द के भेद और समानता को तर्कसंगत कसौटियों के औचित्यानौचित्य पर परख कर ी और गलत का निर्णय होना चाहिए. मैंने फिल्म देखी है और न्यायालय का निर्णय उचित प्रतीत होता है. निर्णय के औचित्यानौचित्य के प्रतिशत का निर्धारण निर्णय के एक एक शब्द और भाव की विस्तृत व्याख्या एवं विषाद विवेचन पर आधारित हो सकता है.
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