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फिल्म रिव्यू ‘Manjhi’ : ‘एक पहाड़तोड़ की शौर्यकथा और प्रेमगाथा’

यह एक शौर्यगाथा भी है और प्रेम कहानी भी। पर वैसी शौर्यगाथा नहीं जैसी हम सुनते या पढ़ते आए हैं। और वैसी प्रेम कहानी भी नहीं जो ‘आई लव यू’ से या तो शुरू होती है या अंत।
Author August 22, 2015 10:41 am
मांझी मूवी रिव्यू

निर्देशक- केतन मेहता

कलाकार- नवाजुद्दीन सिद्दिकी, राधिका आप्टे, तिग्मांशु धुलिया, पंकज त्रिपाठी

 

यह एक शौर्यगाथा भी है और प्रेम कहानी भी। पर वैसी शौर्यगाथा नहीं जैसी हम सुनते या पढ़ते आए हैं। और वैसी प्रेम कहानी भी नहीं जो ‘आई लव यू’ से या तो शुरू होती है या अंत। इस शौर्यगाथा और प्रेम कहानी में वास्तविकता है। प्रेम के लिए आसमान से तारे तोड़कर लाने की बात होती है। लेकिन कोई ला नहीं पाता। मगर यहां एक शख्स है जो अपनी मृत पत्नी को याद करते हुए पहाड़ को ललकारता है कि वो उसे तोड़ देगा और आखिर में, बाईस साल के अथक परिश्रम से, उसे तोड़ भी देता है।

यह कहानी है दशरथ मांझी की जो बिहार के गया जिले के दलित (मुसहर) परिवार में पैदा हए और घोर अभाव में जीते हुए भी वो काम कर गए तो लैला के लिए मजनू भी नहीं कर पाया था। सच में दशरथ मांझी ने अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद पहाड़ को काटकर रास्ता बनाया था और केतन मेहता ने पर्दे पर उनकी ही कहानी दिखाई है। कहानी कहने या दिखाने के अंदाज में कल्पना का पुट जरूर है लेकिन मांझी की जिंदगी का दर्द और संघर्ष भी यहां मौजूद है।

निर्देशक केतन मेहता ने दशरथ मांझी के जीवन को जिस तरह पर्दे पर उतारा है उसमें एक ऐसा व्यक्तित्व उभरता है जिसकी शख्सियत में चट्टानी दृढ़ता है। जिस व्यक्ति ने जीवन में ककहरा भी नहीं नहीं पढ़ा, जो एक साधारण आदमी की तरह था, वो एक प्रेरणा पुरुष बन गया। दशरथ मांझी की जिंदगी तो बिहार में एक दंतकथा बन ही गई थी पर अब इस फिल्म के बाद उसे सार्वकालिकता मिल गई है।

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डॉक्टर जॉनसन का व्यक्तित्व बड़ा था लेकिन बॉसवेल ने उसे अपनी लेखनी से अविस्मरणीय बना दिया। केतन मेहता ने बॉसवेल की तरह, दशरथ को बिहार के भूगोल से बाहर निकालकर दिगंत में फैला दिया। कई दृश्य तो मन में समा जानेवाले हैं। एक वो जिसमें युवा दशरथ प्यास बुझाने के लिए कुएं में उतरता है और वहां भी उसे पानी नहीं मिलता क्योंकि कुआं सूख गया है, और वो वहां नीचे जमी घास खाता है।

यथार्थ और अतियथार्थ में फर्क मिट जाता है। हास्य के भी कई मजेदार दृश्य हैं। विशेषकर वो जिसमें दशरथ और उसकी पत्नी कुछ बदमाशों से बचने के लिए कादो (कीचड़) में कूद जाते हैं और उसी में घुल जाते हैं। निर्देशक ने उस सामाजिक स्थिति को दिखाया जिसमें आज भी गावों में दलितों को रहना पड़ता है। नक्सलवाद के प्रसंग भी हैं।

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नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने दशरथ मांझी के जीवट को जिस तरह उतारा है वो उनके फिल्मी सफर का सबसे बड़ा अध्याय तो है ही साथ ही हिंदी फिल्मों के इतिहास में भी वो अमिट रहेगा। दशरथ के संकल्प और जिजीविषा से लेकर उसकी उधेड़बुन और निराशाएं भी नवाजुद्दीन ने जिस तरह दिखाई हैं उनकी अभिनय क्षमता का पता चलता है। राधिका आप्टे ने दशरथ की पत्नी फगुनिया की भूमिका निभाई है और ये चरित्र भी सहजता और मासूमियत को दिखानेवाला है।

आखिर में यह बता देना भी प्रासंगिक होगा कि दशरथ की पुत्रवधु का निधन भी इस वजह से हो गया था कि उसे समय पर चिकित्सा की सुविधा नहीं मिली थी। ठीक उसी तरह जिस तरह युवा फगुनिया को वक्त पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सकता। दशरथ ने पहाड़ तोड़ कर रास्ता निकाला कि वक्त पर शहर पहुंचा जा सके। इसके बावजूद देश में बहुतों के लिए अस्पताल अभी भी दूर है।

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