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Lucknow Central movie review: बज गया बैंड बाजा

Lucknow Central movie review:

लगता है फरहान अख्तर हिंदी फिल्मों में म्यूजिकल बैंड बनाने का खेल बार बार खेलते रहेंगे। ‘रॉक आॅन’ में उन्होंने ऐसा किया था और ‘रॉक आॅन- 2’ में भी। अब ‘लखनऊ सेंट्रल’ में भी वे अपना म्यूजिकल बैंड बनाने निकले हैं। लेकिन ये आम किस्म का बैंड नहीं है। कैदियों का बैंड है। लखनऊ सेंट्रल जेल के कैदियों का बैंड। बैंड तो बन गया लेकिन फिल्म का बैंड भी बज गया। एक तो फिल्म की कहानी अच्छी होते हुए भी उसकी पटकथा बहुत लचर है, दूसरे फिल्म के गानों में ज्यादा दम नहीं है। अगर आप म्यूजिकल बैंड पर फिल्म बनाने चले हैं तो कम से चार गाने तो धांसू होने चाहिए। एक भी ऐसा गाना नहीं है। ले देकर ‘तीन कबूतर…’ और ‘कावा कावा…’ गाने कुछ हद तक दमदार हैं लेकिन उनमें इतना दम नहीं है कि दर्शकों को झुमाकर रख दें।

फरहान अख्तर ने किशन गिरहोत्रा नाम के ऐसे युवक का किरदार निभाया है जो निरपराध होते हुए भी जेल चला जाता है और एक आइएएस अधिकारी की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा है। किशन बहुत अच्छा गायक है और उसका सपना है कि बड़ा बैंड बनाए। लेकिन जेल जाने के बाद ये सपना चकनाचूर हो जाता है। उधर राज्य के मुख्यमंत्री ( रवि किशन) को लगता है कि जेल में बंद कैदियों के गाने बजाने की एक प्रतियोगिता रखी जाए। कैदी किशन का लखनऊ जेल में तबादला होता है और वहां वह सजा काट रहे चार कैदियों- पंडित जी (राजेश शर्मा), विक्टर चट्टोपाध्याय (दीपक डोबरियाल), परमिंदर सिंह गिल (गिप्पी ग्रेवाल) और लियाकत अंसारी (इमानुल्लाह)- के साथ जेल में म्यूजिकल बैंड बनाने का काम शुरू करता है।
उसका साथ देती है गायत्री (डायना पेंटी) जो एक एनजीओ से जुड़ी हैं और जेल में बंद कैदियों की मदद करती है। लेकिन जेलर (रॉनित राय) को शक होता है कि म्यूजिक बैंड बनाने की आड़ में ये कैदी जेल से फरार होने की योजना बना रहे हैं। और उसका शक वाजिब भी है क्योंकि ये पांचों सच में ऐसी इच्छा मन में पाले बैठे हैं। क्या ये पांचों सच में भाग जाएंगे या किशन का सपना पूरा होगा?

फिल्म में कई तरह के लोचे हैं। एक तो यह कि आखिर किशन लखनऊ जेल में जाकर ये क्यों बहाना बनाता है कि वो गूंगा है? वो एक बैंड बनानेवाला हैं जिसमें उसे एक गायक की भूमिका निभानी है। जब आगे चलकर गाना ही गाना है तो ये बहाना क्यों? फिल्म के अदालती दृश्य भी वाहियात हैं। किसी को सिर्फ गवाही के आधार पर सजा नहीं होती, गवाह के साथ जिरह भी होती है। वो फिल्म में कही नहीं है।
फिर किशन जब बैंड बनाने का सपना पाले हुए है तो जेल से भागने की योजना क्यों बनाता है? भाग जाने के बाद तो वो बाहर निकलकर छुप कर भले जी ले लेकिन बैंड बनाकर शोहरत की जिंदगी नहीं जी सकता? काश, फिल्म में ये झोल न होते?

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