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Lipstick Under My Burkha Review: चाहतें चोरी भी कराती हैं

य ह एक साहसी फिल्म है और इसी कारण इसे सेंसर का सर्टिफिकेट मिलने में पांच महीने से ज्यादा लग गए। यह स्त्री की उन चाहतों और आकांक्षाओं को दिखाती है, जिनके बारे में समाज में ज्यादातर मौन ही रहना बेहतर समझा जाता है।

य ह एक साहसी फिल्म है और इसी कारण इसे सेंसर का सर्टिफिकेट मिलने में पांच महीने से ज्यादा लग गए। यह स्त्री की उन चाहतों और आकांक्षाओं को दिखाती है, जिनके बारे में समाज में ज्यादातर मौन ही रहना बेहतर समझा जाता है। जाहिर है कि सेंसर बोर्ड भी इसी समझ के दायरे में सोचता है। इसीलिए उसकी आरंभिक राय थी कि यह महिला विषयक (वीमेन ओरिएंटेंड) है। गोया यह कोई अपराध हो। फिल्म को सेंसर बोर्ड की हरी झंडी मिलने में खासा वक्त लगा।
यह सच है कि समाज स्त्री को अपनी चाहतें पूरी करने से रोकता है और उस पर कई तरह की बंदिशें लगाता है। निर्देशक ने इसी को रेखांकित किया है। फिल्म में चार प्रमुख महिला किरदार हैं। रेहाना (प्लाबिता बोरठाकुर) नाम की एक मुसलिम लड़की है जिसका काम है घर में चुपचाप बुर्के सीना। पर वह कॉलेज भी जाती है और लिपस्टिक भी लगाना चाहती है। पर वह खुलेआम ऐसा कर नहीं पाती। पारिवारिक बंधन उसे ऐसा नहीं करने देते। वह एक डिपार्टमेंटल स्टोर से लिपस्टिक की चोरी भी करती है। चाहत के लिए चोरी।

एक बुआ जी (रत्ना पाठक शाह) नाम की किरदार हैं जो पचपन साल की हो चुकी है और एक हवेली की मालकिन है। दुनिया चाहती है कि बुआ जी पूजा पाठ करें और सत्संग में मन लगाएं। लेकिन बुआ जी तो स्विमिंग सीखना चाहती हैं और छिपछिपाकर स्विमिंग कॉस्ट्यूम खरीदती हैं। उसके बाद स्विमिंग पूल में भी जाने लगती हैं। फिर शिरीन (कोंकणा सेनशर्मा) है जो घर घर जाकर घरेलू जरूरत की चीजें बेचती है पर उसका पति इसके बारे में नहीं जानता और वह उसके साथ सिर्फ यौन संबंध बनाने में दिलचस्पी रखता है। चौथी महिला किरदार लीला (अहाना कुमारा) नाम की लड़की है जो अपना ब्यूटी पार्लर चलाती है और एक मुसलिम युवक से प्रेम करती है। पर इन चारों औरतों की चाहतें पूरी नहीं पातीं।

अलंकृता श्रीवास्तव ने हालांकि एक शहर, भोपाल, पर केंद्रित यह फिल्म बनाई है पर इसमें उस हकीकत का बयान हुआ है जो पूरे देश में हैं। औरतें क्या कपड़े पहने और किससे शादी करें, इस पर सामाजिक प्रतिबंध की खबरें अक्सर आती रहती हैं। फिल्म में एक दृश्य है जिसमें कॉलेज जाने वाली लड़कियां जींस पहनने के अधिकार के लिए आंदोलन कर रही हैं।
यह एक तरह से ड्रेस कोड का मामला है जो लड़कियों पर थोपा जाता है। फिल्म यह संकेत करती हैं औरतें भले ही खास तरह से पहनावे या शादी के सपने देखें, वे आखिर में चकनाचूर हो जाते हैं। समकालीन महिला विमर्श को यह फिल्म आगे ले जानेवाली है और महिलाओं व लड़कियों की इच्छाओं के प्रति संवेदनशील भी बनाती है। अगर कोई होना चाहे तो।

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