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शास्त्रीयता से कम ही नाता रहा है हिंदी फिल्मी संगीत का

फिल्मों को अलग पहचान देने में निस्संदेह संगीत का सबसे बड़ा योगदान है।
Author नई दिल्ली | July 7, 2017 01:07 am
पंडित रविशंकर

श्रीशचंद्र मिश्र

फिल्मों को अलग पहचान देने में निस्संदेह संगीत का सबसे बड़ा योगदान है। फिल्मी संगीत है तो शास्त्रीय संगीत का ही अंग लेकिन शास्त्रीयता की बंदिशों को तोड़ कर उसे सुगम बनाने का काम उसने किया जो उसकी अपार लोकप्रियता का कारण बना। लेकिन शुरू में शास्त्रीयता पर आश्रित रहने वाले फिल्मी संगीत ने एक अलग ही राह पकड़ ली जो शुद्धतावादियों की नजर में बेहद हल्की मानी गई। लेकिन इसी संगीत ने अपनी ज्यादा पैठ बना ली क्योंकि उसने आमजन तक अपनी पहुंच बनाई जबकि फिल्मों के उदयकाल से पहले राज दरबारों में सिमटा शास्त्रीय संगीत चरम पर था। फिल्म संगीत के विकास के साथ-साथ शास्त्रीय संगीत का दायरा सिकुड़ता गया। उसकी अहमियत कम नहीं हुई लेकिन लोकप्रियता उन्नीस रह गई। सुर-ताल और राग रागिनी के बिना संगीत का कोई अस्तित्व नहीं है। फिल्म संगीत ने इस अनिवार्यता को पारंपरिक बंदिशों से निकाल कर एक सहज प्रवाह दिया।

इसके बावजूद कम ही सही, शास्त्रीय संगीत के कुछ दिग्गजों ने फिल्म संगीत को अपना योगदान दिया। ऐसा तालमेल जब भी हुआ, कमाल हो गया। प्रख्यात बांसुरी वादक अमल ज्योति घोष उर्फ पन्ना लाल घोष अपने करिअर के शुरू में फिल्मों से जुड़े। 1936 में वे कलकत्ता के ‘न्यू थियेटर्स’ के संगीतकार राय चंद्र बोराल के संपर्क में आए। बंबई आकर वे हिमांशु राय की फिल्म निर्माण संस्था ‘बांबे टाकीज’ से जुड़ गए और ‘अनजान’ व ‘बसंत’ जैसी कुछ फिल्मों में संगीत दिया। लेकिन यह रिश्ता ज्यादा नहीं चला और पन्ना लाल घोष अपनी दुनिया में रम गए। 1957 में फिल्म ‘बसंत बहार’ के लता मंगेशकर के गाए गीत- ‘मैं पिया तेरी तू माने या न माने, दुनिया जाने तू जाने या न जाने’ के लिए पन्ना लाल घोष से बांसुरी बजाने का आग्रह किया गया। उनकी बांसुरी की तान ने गीत को अमर कर दिया।

शास्त्रीय संगीतज्ञ को राजी करना और उसकी शर्तों पर उससे काम कराने का धैर्य व जिद कम फिल्म संगीतकार ही दिखा पाए। उन्नीस सौ तीस के दशक में खुशीईद मिनोचर होमजी लखनऊ के मॉरिस संगीत कालेज में शास्त्रीय संगीत सिखाती थीं। ‘बांबे टाकीज’ के हिमांशु राय के आग्रह पर वे फिल्मों में संगीत देने के लिए राजी हुईं। उनका नाम बदल कर सरस्वती देवी रखा गया। ‘बांबे टाकीज’ की ‘अछूत कन्या’, ‘जीवन नैया’ जैसी फिल्मों में सरस्वती देवी के संगीत ने तहलका मचा दिया। विजय भट्ट के अनुरोध पर उनकी फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ के एक गीत ‘तकदीर का फसाना जाकर किसे सुनाए’ पर विख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खां की शहनाई ने जो मधुरता घोली उसे आज भी महसूस किया जा सकता है।

भारत रत्न पंडित रवि शंकर ने इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) की 1946 में बनी फिल्म ‘धरती का लाल’ में पहली बार संगीत दिया। उसी साल कान फिल्म समारोह में दिखाई गई और पुरस्कृत ‘नीचा नगर’ का संगीत भी रवि शंकर ने दिया था। 1948 में उनके भाई उदय शंकर ने फिल्म ‘कल्पना’ बनाई। इसमें संगीत देने के अलावा रवि शंकर ने सत्यजीत राय की बांग्ला फिल्मों- ‘पथेर पांचाली’ व ‘अपूर संसार’ और उनकी पहली हिंदी फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ का भी संगीत तैयार किया। 1960 में बनी ‘अनुराधा’ और ‘गोदान’ रवि शंकर की संगीतबद्ध की गई अन्य उल्लेखनीय फिल्में थीं।

उस्ताद अल्ला रक्खा खां ने 1950 के दशक में करीब 20 फिल्मों में संगीत दिया जिनमें ‘सबक’ व ‘बेवफा’ काफी चर्चित हुई। सरोद वादक उस्ताद अली अकबर खां ने 1952 में फिल्म ‘आंधियां’ का संगीत दिया। पंडित हरि प्रसाद चौरसिया ने शास्त्रीय दुनिया में अपनी धाक जमाने के बाद मशहूर संतूर वादक शिव कुमार शर्मा के साथ जोड़ी बना कर शिव-हरि के नाम से 1982 में यश चोपड़ा की फिल्म ‘सिलसिला’ में संगीत देकर तहलका मचा दिया। बाद में उन्होंने यश चोपड़ा की ही कुछ और फिल्मों ‘डर’, ‘लम्हे’, ‘चांदनी’ में भी संगीत दिया।
शुरुआती दौर के कई संगीतकारों को शास्त्रीय संगीत की भी अच्छी खासी समझ थी। इसीलिए उन्होंने शास्त्रीय गायन के दिग्गजों से विशेष अनुरोध कर फिल्मों के गीत गवाए। 1952 में बनी ह्यबैजू बावराह्णके लिए नौशाद ने डीवी पलुसकर व उस्ताद अमीर खां की आवाज का इस्तेमाल किया। उस्ताद अमीर खां ने 1955 में फिल्म ह्यझनक झनक पायल बाजेह्ण में वसंत देसाई के संगीत निर्देशन में भी एक गीत गाया।

1960 में बनी ह्यमुगल-ए-आजमह्ण का एक गीत गाने के लिए नौशाद ने बड़े गुलाम अली खां को राजी कर लिया। ह्यमिले सुर मेरा तुम्हारा में आवाज देने वाले पंडित भीमसेन जोशी ने 1957 में ह्यबसंत बहार हों मन्ना डे के साथ एक गीत गाने के बाद 1958 में तानसेन और 1985 में अनकही लिए भी गीत गाए। 1973 में ह्यबीरबल माय ब्रदर में उनकी पंडित जसराज के साथ गजब की गायन जुगलबंदी रही। किशोरी अमोनकर ने शांताराम की फिल्म ह्यगीत गाया पत्थरों ने का गीत गाया। फिल्म आरक्षण के गीत ह्यसांस अलबेली में अलका याज्ञनिक के साथ पंडित छन्नूलाल मिश्रा ने आवाज दी।

 

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