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हैप्‍पी बर्थडे नुसरत फतेह अली खान: जादुई सरगम से करोड़ों को झुमाने वाले उस्‍ताद की टॉप-5 कव्‍वालियां

नुसरत साहब के जन्‍मदिन के मौके पर हम आपके लिए लेकर आए हैं उनकी टॉप-5 कव्‍वालियां।
Author February 23, 2017 21:16 pm
उस्‍ताद नुसरत फतेह अली खान। (File Photo)

कव्‍वाली के फन में माहिर उस्‍ताद नुसरत फतेह अली खान का आज जन्‍मदिन है। पाकिस्‍तान में 13 अक्‍टूबर, 1948 को जन्‍मे नुसरत साहब को दुनिया की महानतम आवाजों में शुमार किया जाता है। उनके पास सुरों से खेलने का अज़ीम फन था और कई घंटों तक दिल-ओ-दिमाग को झकझोर देने वाली मौसिकी से समां बांधना उन्‍हें खूब आता था। 600 सालों से भी ज्‍यादा पुरानी कव्‍वाली की रवायत को नुसरत ने अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर मशहूर किया। उन्‍हें ‘शहंशाह-ए-कव्‍वाली’ कहा जाता है, और ऐसा इसलिए क्‍योंकि उन्‍होंने 40 से ज्‍यादा देशों में अपने फन का मुज़ाहिरा किया है। महज 16 साल की उम्र में अपने पिता के साथ मंच पर आने वाले नुसरत ने 1971 में पारिवारिक कव्‍वाली पार्टी की कमान संभाली। 1980 के शुरुआती दशक में उन्‍हें इंग्‍लैण्‍ड के बर्मिंघम के ओरियंटल स्‍टोर एजेंसीज ने साइन किया। नुसरत सा‍हब ने यूरोप, भारत, जापान, पाकिस्‍तान और अमेरिका में कई सारे गाने और एलबम रिलीज किए। नुसरत साहब को अज़ीम कव्‍वाल ही नहीं, धुनों का भी शहंशाह माना जाता है।

1997 में दुनिया को अलविदा कहने से पहले, नुसरत साहब ने बॉलीवुड फिल्‍मों के लिए संगीत रचना शुरू कर दिया था। ‘और प्‍यार हो गया’ नाम की फिल्‍म में उन्‍होंने ‘कोई जाने, कोई ना जाने’ और ‘जिंदगी झूमकर’ गाया। उन्‍होंने फिल्‍म ‘कारतूस’ के लिए ‘इश्‍क दा रुतबा’ और ‘बहा ना आंसू’ संगीतबद्ध किए। बॉलीवुड के लिए उनकी आखिरी धुन अजय देवगन-सैफ अली खान की फिल्‍म ‘कच्‍चे धागे’ के लिए दी, जिसमें उन्‍होंने ‘इस शान-ए-करम का क्‍या कहना’ को कव्‍वाली के रूप में पेश किया। खास बात ये है कि बॉलीवुड के लिए इतने कम समय में ही नुसरत साहब ने लता मंगेशकर और आशा भोसले जैसी गायिकाओं से गवाया। उन्‍होंने सन्‍नी देओल की फिल्‍म ‘दिल्‍लगी’ में ‘साया भी साथ जब छोड़ जाए’ गाया था, जो उनके इंतकाल के दो साल बाद रिलीज हुई। नुसरत साहब ने ही 2000 में आई ‘धड़कन’ का मशहूर ‘दूल्‍हे का सेहरा’ गीत गाया था। कव्‍वाली के रंग में गाए इस गाने को भारतीय शादियों में जरूर बजाया जाता है।

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नुसरत साहब ने भारत की आजादी की 50वींं वर्षगांठ के मौके पर एअार रहमान के साथ मिलकर ‘वंदे मारतम’ एल्‍बम के ‘गुरुस ऑफ पीस’ में योगदान दिया। रहमान, नुसरत साहब के बहुत कद्रदान थे, मगर वे उनके साथ और संगीत नहीं बना सके। बाद में रहमान ने ‘गुरुस ऑफ पीस’ नाम से एक एलबम जारी किया जिसमें नुसरत साहब का ‘अल्‍लाहू’ भी रखा। 2007 में रहमान ने फिल्‍म ‘गुरु’ में ‘तेरे बिना’ गाने को भी नुसरत सा‍हब को याद करने के लिए संगीतबद्ध किया था।

नुसरत साहब के कद्रदानों की संख्‍या भारत में कम नहीं है। उनके जन्‍मदिन के मौके पर हम आपके लिए लेकर आए हैं उनकी टॉप-5 कव्‍वालियां, यकीन मानिए, इन्‍हें सुनकर आपको एहसास होगा कि सूफी संगीत में कितनी गहराई है। खूबसूरत शायरी के बीच में जब उस्‍ताद साहब सरगम छेड़ते थे तो लोग बस झूम उठते थे।

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5. तुम एक गोरखधंधा हो…

सनम के रास्‍ते ख्‍ुादा से सवाल करती यह कव्‍वाली युवाओं में खासी लोकप्रिय है। इसकी अासान मगर गहराई भरी धुन के साथ नुसरत साहब की ट्रांस भरी आवाज आपको एक अलग दुनिया में ले जाती है। सुनिए, और खुद महसूस कीजिए।

4. अंखिया उडीद दियां…

नुसरत साहब की ज्‍यादातर कव्‍वालियां पंजाबी में हैं, मगर भाषा संगीत के आड़े नहीं आती। यह कव्‍वाली यही साबित करती है। इसे आज तक कई कव्‍वालों ने गाया, कई बॉलीवुड के गानों में इसकी धुन इस्‍तेमाल हुई मगर उस्‍ताद साहब सरीखा जादू किसी में नहीं मिला। सुनिए:

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3. आफरीन… आफरीन…

शायद ही 90 के दशक का कोई ऐसा शख्‍स होगा, जिसने यह गाना न सुना हो। खुद नुसरत साहब ने इसे पांच अलग-अलग तरह से पेश किया है। यहां हम आपसे एक लाइव कंसर्ट के दौरान कव्‍वाली का वीडियो शेयर कर रहे हैं, इसमें आपको नौजवान राहत फतेह अली खान भी नजर आएंगे। देखिए:

2. ये जो हल्‍का-हल्‍का सुरूर है…

नुसरत साहब की सबसे मशहूर कव्‍वालियों में से एक। उस्‍ताद ने इस कव्‍वाली को कई धुनों के साथ पेश किया है। उनके कंसर्ट में इस कव्‍वाली की मांग सबसे ज्‍यादा होती थी। जिस कव्‍वाली का वीडियो हम शेयर कर रहे है, वह करीब 68 मिनट की है, सोच सकते हैं कि इतने लंबे समय तक श्राेताओं को झुमा पाना आसान काम नहीं है। देखिए:

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1. अल्‍लाहू… अल्‍लाहू…

नुसरत साहब के चुनिंदा ‘हम्‍द’ में से एक। ‘हम्‍द’ गाने के लिए आवाज का पाक़ होना बेहद जरूरी है। पिछली वाली की तरह इसे भी उस्‍ताद साहब ने अलग-अलग गाया है। सुनिए:

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First Published on October 13, 2016 2:48 pm

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