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अधूरा रह गया गुलशन कुमार का सपना

मुंबई फिल्मजगत में अपना मकाम बनाना कभी भी आसान नहीं रहा है। यहां शुरुआत में संघर्षरतों की जमकर उपेक्षा की जाती है।
गुलशन कुमार

मुंबई फिल्मजगत में अपना मकाम बनाना कभी भी आसान नहीं रहा है। यहां शुरुआत में संघर्षरतों की जमकर उपेक्षा की जाती है। कई बार तो सफलता पाने के बावजूद फिल्मजगत उन्हें अपनाने के लिए तैयार नहीं होता। कमल हासन ने 90 के दशक में एक साक्षात्कार में मुंबई फिल्मजगत में अपनी उपेक्षा पर कहा था, ‘मुंबई फिल्मजगत किसी मछुआरे की तरह व्यवहार करता है। वे कहते हैं यहां जाल मत डालो। मछलियां कम हो जाएंगी।’ गुलशन कुमार के साथ भी यही हुआ। उन्होंने 11 जुलाई, 1983 को सुपर कैसेट कंपनी की नींव रखी थी। 1984 में उन्होंने अपनी कंपनी टी-सीरीज के जरिये फिल्मों का संगीत बेचना शुरू किया। तब फिल्मजगत में एचएमवी कंपनी का बोलबाला था। नामी गिरामी निर्माता अपनी फिल्मों का संगीत एचएमवी को ही देते थे। लिहाजा टी-सीरीज नए गायकों को मौका देकर उनसे मशहूर गानों के कवर वर्शन गवाने लगी जिससे फिल्मजगत के कई लोग बुरी तरह चिढ़ गए थे।
टी-सीरीज भजन, लोकगीत और कवर वर्शन के कारोबार से आर्थिक तौर पर मजबूत हो चुकी थी मगर गुलशन कुमार की उपेक्षा अभी भी खत्म नहीं हुई थी। 90 के दशक में फिल्में बनाना शुरू किया तो पता चला कि कोई भी बड़ा हीरो उनकी फिल्म में काम नहीं करना चाहता। 1992 में दक्षिण के दिग्गज निर्देशक के विश्वनाथ की साख के दम पर ‘संगीत’ (माधुरी दीक्षित की दोहरी भूमिका) के साथ महेश भट्ट के निर्देशन में ‘आशिकी’ (1990) और ‘दिल है के मानता नहीं’ (1995) बनाने के बावजूद बड़े हीरो गुलशन कुमार के साथ काम नहीं करना चाहते थे।

आखिर गुलशन कुमार ने एक दूसरा उपाय निकाला। 1995 में उन्होंने खुद एक कहानी लिखी, उसका निर्देशन करना तय किया और भाई किशन कुमार-शिल्पा शिरोड़कर को लेकर ‘बेवफा सनम’ बनाई, जो सुपर हिट हुई। गुलशन कुमार को लगा कि अब शायद स्थापित हीरो-हीरोइन उनकी उपेक्षा करना बंद कर देंगे। मगर फिर भी ऐसा नहीं हुआ। कहा जाता है कि संगीत में काम करने के बावजूद माधुरी दीक्षित ने किशन कुमार की हीरोइन बनने से इनकार कर दिया था। गुलशन कुमार ने एक करोड़ रुपए का आॅफर दिया, मगर माधुरी नहीं मानीं। संगीतकार नदीम-श्रवण के जुड़ने के बाद टी-सीरीज का दबदबा संगीत बाजार में बढ़ गया था। बावजूद इसके गुलशन कुमार इंडियन म्यूजिक इंडस्ट्री के सदस्य तक नहीं थे। अपनी ही बिरादरी में उनका हुक्का-पानी बंद था।

1996-97 में भारतीय संगीत बाजार में फिल्म संगीत 70, गैरफिल्म संगीत 20 और अंतरराष्ट्रीय संगीत का हिस्सा 10 फीसद था। इस 70 फीसद फिल्म संगीत बाजार पर काबिज होने के लिए सभी लालायित थे। कई निर्माताओं ने फिल्मों का संगीत बेचने के लिए संगीत कंपनी खोल ली थी। मगर एक एक कर सबने फिल्म संगीत बेचने से खुद को दूर कर लिया। ऐसे फिल्म निर्माताओं में अमिताभ बच्चन (बिग बी), सलीम अख्तर (आफताब म्यूजिक इंडस्ट्री), केसी बोकाड़िया (बीएमबी), मुकेश दुग्गल (प्रिंस आॅडियो), राजीव राय (त्रिमूर्ति) जैसे कई निर्माता थे। मगर इनमें से कोई भी हिंदी फिल्म संगीत बेचने के लिए ज्यादा समय तक सक्रिय नहीं रह पाया। किसी की कंपनी का दीवाला पिट गया (बिग बी)। किसी की हत्या कर दी गई (मुकेश दुग्गल)। किसी पर हमला हुआ (राजीव राय)। यही हाल गुलशन कुमार का हुआ। 12 अगस्त, 1997 को दिनदहाड़े उनकी हत्या कर दी गई।
फिल्म-संगीत बाजार में खुद को चोटी पर पहुंचाने का सपना गुलशन कुमार के जीते पूरा नहीं हुआ। यह सपना पूरा हुआ उनके उनके बेटे भूषण कुमार और भाई किशन कुमार के जरिये। आज टी-सीरीज फिल्म निर्माण औरसंगीत बाजार में अव्वल नंबर की कंपनी है और हर बड़ा निर्माता और कलाकार उसके साथ काम करने के लिए तैयार है। मगर इसे देखने के लिए गुलशन कुमार नहीं हैं।

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