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Film Review ‘बरखा’: मजबूरियों के पुराने अंदाज

निर्देशक : शादाब मिर्जा कलाकार : सारा लॉरेन, ताहा शाह, प्रियांशु चटर्जी, पुनीत इस्सर   इस फिल्म को देखने के बाद आप इसके निर्देशक से यह सवाल जरूर पूछना चाहेंगे कि भाई क्या मजबूरी थी कि आपने इस फिल्म को बनाने का फैसला किया? या आपको किस कीड़े ने काटा था कि ऐसी फिल्म बनाई? […]
Author March 29, 2015 15:19 pm
Film Review: ‘बरखा’ (फोटो: बॉलीवुड हंगामा)

निर्देशक : शादाब मिर्जा
कलाकार : सारा लॉरेन, ताहा शाह, प्रियांशु चटर्जी, पुनीत इस्सर

 

इस फिल्म को देखने के बाद आप इसके निर्देशक से यह सवाल जरूर पूछना चाहेंगे कि भाई क्या मजबूरी थी कि आपने इस फिल्म को बनाने का फैसला किया? या आपको किस कीड़े ने काटा था कि ऐसी फिल्म बनाई? क्या आप उस कीड़े का नाम बताएंगे कि लोगों को बताया जा सके कि ऐसे कीड़े से सावधान रहें?

यह एक लड़की की मजबूरी की कहानी है। इसमें बरखा (सारा लॉरेन) नाम की एक लड़की है जो हिमाचल प्रदेश में रहती है। जतिन (ताहा शाह) नाम का एक नौजवान, जो फोटोग्राफर है, इस लड़की को पहली बार ही देखकर उस पर इस तरह फिदा हो जाता है कि उससे शादी करना चाहता है। इसलिए वह उस जगह पर ठहर भी जाता है।

लेकिन मामला इतना आसान नहीं क्योंकि इसके बाद इस कहानी में कई तरह के पेचोखम पैदा होते हैं। बरखा की जिंदगी कई तरह के रास्तों से गुजरती है।

हिमाचल से मुंबई तक की। बरखा मुंबई में जाकर एक बार में डांसर बन जाती है। वहां भी उसका एक इश्क होता है लेकिन वह किसी अंजाम तक पहुंचे उसमें बाधाएं आ जाती हैं। उसका बार डांसर होना उसके खिलाफ जाता है।

प्रेम, शादी और धोखे की राहों से चलती-फिरती यह कहानी किसी तरह अपनी मंजिल पर पहुंचती है। लेकिन यह सब इतने ढीले-ढाले अंदाज से होता है कि दर्शक का हौसला पस्त हो जाता है। समझ में नहीं आता कि आप किसे कोसें, अपने आपको या इसके निर्देशक को।

फिल्म बनाने का अंदाज बहुत पुराना है। इसे देखते हुए आपको लगता है कि इसकी कहानी पचास साल पहले की लिखी हुई है और निर्देशक का तरीका भी चालीस साल पुराना लगता है। एक दुखियारी लड़की के दर्द को भुनाने की कोशिश यहीं दिखती है। लेकिन तय मानिए कि इस दर्द के ग्राहक नहीं हैं।

PHOTOS:  बड़े पर्दे पर ‘बरखा’ क्या बन पाएगी ‘नॉटी नंबर 1′

सारा लॉरेन खूबसूरत हैं मगर निर्देशक न तो उनकी खूबसूरती को भुना पाता है और न उनसे अभिनय करा पाता है। यही हाल ताहा शाह और प्रियांशु चटर्जी का है। फिल्म के कुछ गानों के बोल जरूर अच्छे हैं। लेकिन वे भी लोगों के लबों पर लंबे समय तय तक नहीं टिक पाएंगे।

जाहिर है कि जब तक इस फिल्म का कैमरा हिमाचल में केंद्रित रहता है तो इसके दृश्य कुछ लुभावने लगते हैं। लेकिन जैसे ही कैमरा मुंबई पहुंचता है सिनेमेटोग्राफर की कल्पनाशीलता को डंक मार देता है।

दूसरा सवाल आप पूछ सकते हैं कि इस तरह की फिल्म रिलीज कैसे हो जाती है। आखिर फिल्म रिलीज कराना भी एक किस्म का धंधा है।

जवाब है कि आजकल बच्चों की परीक्षाएं चल रही होती हैं। इसलिए कई बड़े निर्माता अपनी फिल्में रिलीज नहीं करते क्योंकि उनके बॉक्स आॅफिस पर लुढकने का डर रहता है। और इसी वजह से उन निर्देशकों और निर्माताओं को मौके मिल जाते हैं जो किसी तरह फिल्म बना लेते हैं और निर्माता-निर्देशक की फेहरिश्त में अपने नाम लिखा लेना चाहते हैं।

 

 

 

 

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