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आमने-सामने- अब जिंदगी की हकीकत पर लिखी जा रही हैं किताबें : आल्टर

फिल्म अभिनेता और लेखक टॉम आल्टर अपनीएक लघु फिल्म को लेकर चर्चा में हैं।
लेखक टॉम अल्टर

फिल्म अभिनेता और लेखक टॉम आल्टर अपनीएक लघु फिल्म को लेकर चर्चा में हैं। उन्होंने यह लघु फिल्म पुस्तकालयों के प्रति युवाओं का ध्यान खींचने के लिए बनाई है। उन्होंने इस फिल्म की शूटिंग मसूरी में की है और वे इसे इसी महीने रिलीज करने जा रहे हैं। अपनी कई फिल्मों तथा क्रिकेट पर लिखी एक पुस्तक के कारण टॉम आल्टर बेहद चर्चित हुए थे। गांधी, सल्तनत, कर्मा, दूध का कर्ज, परिंदा, मंगल पांडेय जैसी चर्चित फिल्मों सहित टॉम आल्टर ने चार सौ से ज्यादा फिल्मों में काम किया है। 22 जून 1950 को मसूरी में जन्मे टॉम आल्टर की भारतीय संस्कृति पर अच्छी-खासी पकड़ है। मसूरी उनकी जन्म और कर्मस्थली दोनों है। मसूरी की यादें उनके जहन में बसी है। टॉम आल्टर के दादा और पिता अमेरिका से 1916 में भारत आए और यहीं के होकर रह गए। पिछले दिनों हरिद्वार की अंग्रेजी लेखिका मोना वर्मा की एक पुस्तक क्राउन आॅफ व्हाइट फील्ड का विमोचन करने के सिलसिले में टॉम आल्टर हरिद्वार आए थे। उनसे जनसत्ता ने बातचीत की।

सवाल : अंग्रेजी-हिन्दी साहित्य में लिखी जा रही पुस्तकों के प्रति आजकल पाठकों के रूझान में कमी सी दिखाई दे रही है और वे इसका क्या भविष्य देखते हैं?
’ हां, बेशक पाठकों की तादाद में कुछ कमी आई है, परंतु पुस्तकों की गुणवत्ता में कमी नहीं है। आजकल की पुस्तकों की गुणवत्ता और ज्यादा बढ़ी है। प्राचीन ग्रंथों महाभारत तथा अन्य ग्रंथों को लेकर सीरियल और फिल्में बन रही हैं। इस ओर लोगों की रुचि बढ़ती जा रही है।
सवाल : जो साहित्य लिखा जा रहा है उसे आप किस दृष्टि से देखते हैं?
’ अभी जो साहित्य लिखा जा रहा है, उसमें मुझे कोई कमी नहीं दिखाई दे रही है। कितनी संख्या में लोग किताबें पढ़ रहे हैं, उसकी कोई अहमियत नहीं है। अगर अच्छे लोग पढ़ रहे हैं तो अच्छी बात है। कहानियों की कई अच्छी पुस्तकें लिखी जा रही हैं। जिंदगी की जो असलियत है आजकल उस बारे में कहानी-किस्से लिखे जा रहे हैं। इस ओर लेखन होना अच्छा संकेत है।
सवाल : लेखन में आप मौजूदा राजनीति का कितना प्रभाव देखते हैं?
’ राजनीति का समाज के ऊपर भी प्रभाव पड़ा है, तो लेखक के ऊपर पड़ रहा है। फिल्मों में भी पड़ा है। आज आप कोई भी फिल्म देखिए राजनीति की समस्या उस फिल्म में आ ही जाती है। पहले अमिताभ बच्चन अपनी फिल्मों में कई राजनीतिकों को मार देते थे। वह असलियत नहीं थी। अब जो राजनीतिक की भूमिका में आते हैं, आप उन्हें मार नहीं सकते। हकीकत में भी उन्हें नहीं मार सकते हैं। आज की हमारी फिल्मों में कल्पना नहीं है।
सवाल : फिल्म और साहित्य में राजनीति के दखल को आप किस दृष्टि से देखते हैं?
’यह एक बड़ा सवाल है। मैं कैसे एक जुमले में इसका जवाब दूं। राजनीति के अलावा भी पूरा एक जीवन है, जिसमें राजनीति का कोई लेना-देना नहीं हैं। हमारे यहां राजनीति को बहुत अहमियत दी जा रही है,जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। हमारा जो साधारण जीवन है, उसकी ज्यादा अहमियत है। जैसे क्रिकेट में हम आइपीएल को ज्यादा बढ़ावा देते हैं उसी तरह राजनीति को भी ज्यादा बढ़ावा दे रहे हैं। प्रधानमंत्री क्या काम कर रहे हैं, उन्हें अपना काम करने दीजिए। हमारा जीवन क्या है, इसकी ज्यादा अहमियत है।
सवाल : कश्मीर की समस्या का क्या हल है?
’ देखिए, हमें इसकी बुनियाद पर जाना चाहिए। पीछे… एकदम पीछे। कश्मीर हिन्दुस्तान का हिस्सा कब और कैसे बना, हमें इसकी गहराई में जाने की जरूरत है, जब तक हम इस चीज को नहीं समझेंगे तब तक हम इसका हल नहीं खोज पाएंगे। आज से 70 साल पहले कश्मीर को लेकर जो हालात बने थे, उन्हें आज देखने और समझने की जरूरत है। आज फिर से कश्मीर का इतिहास पढ़ने की जरूरत है।

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