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फ़िल्म समीक्षा ‘दम लगा के हईशा’ : फ़िल्म में दम है

निर्देशक-शरद कटारिया, कलाकार-आयुष्मान खुराना, भूमि पेडणेकर, संजय मिश्रा, सीमा पाहवा, अलका अमीन, शीबा चड्ढा। फिल्म उद्योग और आम जीवन में भी खूबसूरती का एक खास पैमाना है- विशेषकर स्त्री की खूबसूरती का। वैसे कालिदास का मेघ अपनी प्रिया को जब तन्वी श्यामा शिखरिदशना कहता है तो सुंदर स्त्री की अपनी परिभाषा भी देता है। यानी […]
Author March 1, 2015 11:05 am
निर्देशक-शरद कटारिया, कलाकार-आयुष्मान खुराना, भूमि पेडणेकर, संजय मिश्रा, सीमा पाहवा, अलका अमीन, शीबा चड्ढा।

निर्देशक-शरद कटारिया, कलाकार-आयुष्मान खुराना, भूमि पेडणेकर, संजय मिश्रा, सीमा पाहवा, अलका अमीन, शीबा चड्ढा।

फिल्म उद्योग और आम जीवन में भी खूबसूरती का एक खास पैमाना है- विशेषकर स्त्री की खूबसूरती का। वैसे कालिदास का मेघ अपनी प्रिया को जब तन्वी श्यामा शिखरिदशना कहता है तो सुंदर स्त्री की अपनी परिभाषा भी देता है। यानी सुंदर औरत वो है जो पहले तो छरहरी हो (बाकी विशेषताएं भी बताता है)। औरत के सौंदर्य की ये समझ सदियों से चली आ रही है। पर ये एक पैमाना ही है सचाई नहीं क्योंकि सुंदरता सिर्फ अनुपात नहीं है। मोटी औरत भी खूबसूरत हो सकती है। शरद कटारिया की इस फिल्म की मूल बात यही है। बतौर निर्देशक ये उनकी पहली फिल्म है। इससे पहले वे कई फिल्मों के संवाद लिख चुके हैं। शरद ने इस फिल्म में बतौर निर्देशक और बतौर कहानीकार भी मौलिकता दिखाई है।

फिल्म में केंद्र में बीसवी सदी के आखिरी दशक का हरिलार है। वहां एक लड़का रहता है प्रेम (आयुष्मान खुराना) जो दसवीं से आगे की पढ़ाई नहीं कर सका और कैसेट की दुकान चलाता है, जो दरअसल उसके पिता (संजय मिश्रा) की है। प्रेम की शादी का रिश्ता आता है। वो खुद तो नहीं चाहता लेकिन पिता के दबाव की वजह से उसे शादी करनी पड़ती है। जिस लड़की संध्या (भूमि पेडणेकर) से उसकी शादी होती है उसमें वैसे तो कोई कमी नहीं है। वो शिक्षिका भी बनने वाली है लेकिन थोड़ी मोटी है। जाहिर है कि प्रेम की निगाह में शादी बेमेल है। वो भले दसवीं से आगे की पढ़ाई नहीं कर पाया लेकिन शादी तो माधुरी दीक्षित (उस जमाने की ड्रीम गर्ल) से होनी चाहिए। खैर शादी के बाद पति पत्नी में मनमुटाव शुरू हो जाता है और बात बढ़ती है, तलाक की स्थिति आ जाती है। खैर मामला सुलटाने की कोशिशें होती हैं और इसी में पूरी फिल्म निकल जाती है।

ये अपनी तरह की हास्य फिल्म है और कई दृश्य बड़े मजेदार हैं। एक दृश्य में प्रेम संध्या को अपने कंधे पर लादकर एक कार्यक्रम में भी भाग लेता है। फिल्म में कुमार शानू के गाने लगातार बजते हैं जो उस दौर की मानसिकता को पकड़नेवाले हैं। आयुष्मान खुराना तो अपनी भूमिका में जमे हैं लेकिन सबसे अधिक दिल को छूती हैं भूमि पेडणेकर जो अपने अंदाज में बेहद देसी लगी हैं हालांकि वे मुंबई की रहनेवाली हैं। आज के दौर में जब आम जीवन में भी ग्लैमर का प्रभाव बढ़ रहा है और शादी में भी फिल्मी संस्कृति छा रही है, ये फिल्म एक अलग तरह की सोच और समझ देने वाली है और साथ ही भरपूर मनोरंजन करनेवाली भी।

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