March 23, 2017

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डिप्रेशन के जिक्र पर रो पड़ीं दीपिका पादुकोण, कहा- मेरी मां नहीं होती तो मैं यहां नहीं होती

बॉलीवुड एक्‍ट्रेस दीपिका पादुकोण सोमवार को एक कार्यक्रम के दौरान डिप्रेशन के बारे में बात करते वक्‍त रो पड़ीं।

बॉलीवुड एक्‍ट्रेस दीपिका पादुकोण एक कार्यक्रम के दौरान डिप्रेशन के बारे में बात करते वक्‍त रो पड़ीं।

बॉलीवुड एक्‍ट्रेस पादुकोण सोमवार को एक कार्यक्रम के दौरान डिप्रेशन के बारे में बात करते वक्‍त रो पड़ीं। रूंधे गले से उन्‍होंने कहा, ”दो साल पहले मेरा परिवार मुझे देखने आया था। वे जाने ही वाले थे और मैं अपने बैडरूम में अकेली थी। मेरी मां आई और पूछा सब ठीक है क्‍या। मैंने कहा, हां। उन्‍होंने फिर पूछा काम या किसी और बात से परेशानी तो नहीं। मैंने कहा नहीं। उन्‍होंने मुझसे कई बार पूछा तो मैं भावुक हो गई और मेरी आंखों में आंसू आ गए।” गालों पर आंसुओं को पोंछते हुए दीपिका ने कहा, ”मैं मां से कहना चाहती थी कि यदि तुम नहीं होती तो मैं यहां नहीं होती। हमेशा मेरा साथ देने के लिए धन्‍यवाद। मेरी बहन, पिता और दोस्‍तों ने को धन्‍यवाद जिन्‍होंने मेरा खूब साथ दिया।” विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर सोमवार को उनकी पहल से बनाए गए ‘लिव लव लॉफ फाउंडेशन’ ने एक देशव्यापी जागरूकता अभियान शुरू किया।

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‘दोबारा पूछो’ नाम का यह अभियान मानसिक स्वास्थ्य विषय पर समाज की मुख्यधारा के बीच बहस शुरू करने और इस बीमारी को लेकर समाज में फैली गलत धारणा को तोड़ने के लिए शुरू किया गया है। इस मौके पर दीपिका ने बताया कि उनके लिए इस स्टिग्मा से बाहर निकलना आसान नहीं था। कार्यक्रम में मौजूद स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्री अनुप्रिया पटेल ने भी इस मुद्दे पर विचार रखे। दीपिका बताती हैं कि कई दिनों तक सोच-विचार के बाद तय किया गया कि मनोचिकित्सक की मदद ली जाए। वे कहती हैं कि भले ही कम संख्या में, लेकिन इस बीमारी से बाहर निकलने के विकल्प मौजूद हैं। जैसे दिल की बीमारी का, मधुमेह का या बुखार का इलाज होता है उसी तरह मानसिक बीमारी का भी इलाज है। इसको सही ढंग से समझने की दरकार है। वे कहती हैं कि कामयाबी की अंधी दौड़ में हम असंवेदनशील होते जा रहे हैं। इसलिए संवेदना को बचाए रखना होगा।

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दीपिका ने आगे कहा कि यह समझना जरूरी है कि आज हम बहुत प्रतिस्पर्धी बन गए हैं, जोकि एक अच्छी बात है लेकिन हम अपने आसपास के लोगों को लेकर कम संवेदनशील भी हुए हैं। इस बीमारी से अपने संघर्ष की कहानी बयां करते हुए दीपिका कार्यक्रम के दौरान रो पड़ीं और कहा कि आपके पास परिवार जैसी संस्था और दोस्त होने चाहिए, जो आपके लिए हर समय खड़े हों। इससे अवसादग्रस्त व्यक्ति को इससे उबरने में मदद मिलती है।

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इस मौके जाने-माने लेखक प्रसून जोशी ने कहा कि मानसिक अवसाद से निस्वार्थ व प्रेम के बूते ही पार पाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि पहले के समय में दादी, नानी, मौसी, बुआ सहित तमाम रिश्तों से मिलने वाला बेपनाह प्यार बच्चों को एकाकीपन व मानसिक अवसाद से बचाए रखता था। आज संयुक्त परिवार नहीं हैं तो वह प्यार भी नहीं मिल रहा।

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First Published on October 11, 2016 8:53 am

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