December 07, 2016

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साइंटिस्ट बनना चाहते थे अनुराग कश्यप, तो निर्देशक कैसे बन गए? जानिए पूरी कहानी

स्टेज क्लीनर से मशहूर बॉलीवुड डायरेक्टर तक, जानिए कैसा रहा अनुराग कश्यप का सफर।

फिल्म निर्माता-निर्देशक अनुराग कश्यप जब दिल्ली के थ्यागराज स्टेडियम में एक कार्यक्रम के दौरान युवाओं से रूबरू हुए तो उनके लिए यह एक अद्भुत मौक था।

फिल्म निर्माता-निर्देशक अनुराग कश्यप जब दिल्ली के थ्यागराज स्टेडियम में एक कार्यक्रम के दौरान युवाओं से रूबरू हुए तो उनके लिए यह एक अद्भुत मौक था। अनुराग ने अपने पुराने दिनों की और अपने स्ट्रगलिंग डेज के बारे में कई बाते साझा कीं। उन्होंने बताया कि दिल्ली के एक टॉप कॉलेज से ग्रेजुएशन करने से पहले मैंने एक साइंटिस्ट बनने की प्लानिंग की थी। ऑप्शन्स ज्यादा होते ही नहीं थे तब, या तो साइंटिस्ट बन जाओ या यूपीएससी क्लीयर कर लो। उन्होंने बताया कि किस तरह उन्हें इंडस्ट्री में जगह बनाने के लिए शुरू में अजीब चीजें करनी पड़ीं। उन्होंने बताया कि मैंने बॉम्बे के पृथ्वी थिएटर से काम करना शुरू किया, तब मैं स्टेज साफ किया करता था। मुझे पता चला कि लोग अपना मुफ्त योगदान देते हैं, तो मैंने लिखना शुरू कर दिया। यह मेरे सबसे अच्छी स्किल्स में से था और उन दिनों मैं एक दिन में 100 पेज तक लिख डालता था। मैं उस वक्त न तो इसके पैसे लेता था, और न हीं कोई कर्ज।

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अनुराग ने बताया कि उसी दरमयां सैटेलाइट टीवी आ गया और मैं नहीं जानता था कि डेली सोप्स के लिए कंटेंट कैसे बनाते हैं। शांति और स्वाभिमान जैसे शो का मैं हिस्सा बना पर आप कहीं पर भी मेरा नाम नहीं देखेंगे। और आखिर में किसी ने मुझे मेरे काम के लिए क्रेडिट दिया, यह थी फिल्म ‘सत्या’। अनुराग ने फैन्स को बताया कि आपके हर चुनाव का एक नतीजा आता है। मैंने चुनाव किए और उनके नतीजों का सामना किया। चाहे यह बॉम्बे वेल्वेट बनाना रहा हो या कोई ट्वीट करना। उन्होंने बताया कि जब मुझे पैसे की जरूरत थी तो मैंने दिल्ली के एक कॉल सेंटर में भी काम किया जो कि उन दिनों पैसा कमाने के सबसे आसान तरीकों में से एक था। अनुराग ने युवाओं को सलाह दी कि ग्रोथ आपकी तब होती है जब आप सवाल पूछने से घबराते नहीं हो। कई बार हम लोग सोचते हैं कि मजाक उड़ेगा इसलिए सवाल पूछते ही नहीं हैं। मैं कभी नहीं घबराता, और यही वह चीज है जिसने मुझे सिनेमा के बारे में इतना कुछ सिखा दिया है।

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अनुराग ने बताया कि मेरे पिता चाहते थे कि मैं MBA करूं, वह इस बात को बार-बार कहते रहते थे। मुझे कहा जाता था कि मैं बॉम्बे के लोगों द्वारा मूर्ख बनाया जा रहा हूं। कई सालों बात जब मेरी फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर रिलीज हुई और कान में सलेक्ट हुई तो मैंने पापा को फोन किया और कहा- पापा, सोच रहा हूं MBA कर लूं। और तब पापा ने जवाब दिया- बेटा जहां बैठे हो वहीं बैठे रहो, सही जा रहे हो।

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First Published on October 25, 2016 11:26 am

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