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गोवा में सभी जगह हुआ था EVM वीवीपीएटी का प्रयोग, पर नहीं निकली थी केवल ‘कमल’ की पर्ची 

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी 'ईवीएम' आखिर क्यों 'इलेक्शन विवाद मशीन' बनती जा रही है?
Author गोवा | April 6, 2017 09:33 am
वेरीफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल मशीन (फाइल फोटो)

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ‘ईवीएम’ आखिर क्यों ‘इलेक्शन विवाद मशीन’ बनती जा रही है? अब केवल सफाई से बात बनती नहीं दिख रही, क्योंकि ईवीएम के मत सत्यापन पर्ची यानी वोटर वेरीफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) से जुड़ने के बाद जो सच्चाई सामने है, उससे निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है। ईवीएम से अगर छेड़छाड़ हुई, तो यह जनता की ताकत से खिलवाड़ है। ‘प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्’ वाले अंदाज में, रही-सही कसर, शुक्रवार 31 मार्च को तब पूरी हो गई, जब मप्र के भिंड में होने वाले उपचुनाव का जायजा लेने पहुंचीं प्रदेश की मुख्य निर्वाचन अधिकारी सलीना सिंह ने ‘वीवीपीएटी’ की परीक्षा के लिए मीडिया की मौजूदगी में डेमो के लिए दो अलग-अलग बटन दबाए और दोनों ही बार पर्चियां ‘कमल’ की निकलीं।

 
लेकिन उससे भी बड़ा सच यह है कि गोवा में 4 फरवरी को हुए विधानसभा चुनाव में सभी जगह ‘वीवीपीएटी’ का उपयोग किया गया, पर वहां सब कुछ ठीक-ठाक रहा! ऐसे में ईवीएम पर विपक्ष के सवालों का जवाब जरूरी है। अब प्रश्न है कि ईवीएम सच या वीवीपीएटी? जाहिर है, जो दिखता है वो सच है, लेकिन जो नहीं दिखा उसे कैसे सच मानें?
 
सवाल आसानी से सुलझता नहीं दिख रहा, क्योंकि सवाल विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनावों की पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वास का है। एक और दिलचस्प तथ्य यह भी कि वर्ष 2009 में ‘ईवीएम’ पर खुद भाजपा की ओर से दिग्गज नेता नेता लालकृष्ण आडवाणी और सुब्रमण्यम स्वामी ने भी कई आरोप लगाए थे।
 
स्वामी सर्वोच्च अदालत भी गए, जहां 9 अक्टूबर 2013 को ‘ईवीएम’ में ‘वीवीपीएटी’ लगाने और हर वोटर को रसीद जारी करना वाली मांग पर सुनवाई करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को व्यवस्था देते हुए कहा कि ‘वीवीपीएटी’ स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनावों के लिए अपरिहार्य है तथा भारत निर्वाचन आयोग को इस प्रणाली की सटीकता सुनिश्चित करने के लिए ईवीएम को ‘वीवीपीएटी’ से जोड़ने के निर्देश दिए।
 
दरअसल ‘वीवीपीएटी’ मतपत्र रहित मतदान प्रणाली का इस्तेमाल करते हुए, मतदाताओं को फीडबैक देने का तरीका है। इसका उद्देश्य इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की निष्पक्षता पुष्टि है। ये ऐसा प्रिंटर है जो ‘ईवीएम’ से जुड़ा होता है। वोट डालते ही एक पावती निकलती है जो मतदाता के देखते ही एक कन्टेनर में चली जाती है। पर्ची पर क्रम संख्या, नाम, उम्मीदवार का चुनाव चिन्ह दर्ज होता है। इससे वोट डालने की पुष्टि होती है और वोटर को चुनौती देने की अनुमति भी मिलती है।
 
2014 के आम चुनाव में ‘ईवीएम’ में पावती रसीद लागू करने की योजना चरणबद्ध तरीके से लागू करने के निर्देश दिए थे, ताकि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित हो। जिस पर आयोग ने कहा कि सभी 543 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में इस प्रणाली को लागू करने के लिए 14 लाख ‘वीवीपीएटी’ मशीनों की जरूरत होगी, जिसके लिए समय बहुत कम है। ऐसे में 2019 के आम चुनावों के पहले इन्हें लगा पाना संभव नहीं होगा। इसके लिए 1500 करोड़ रुपयों की भी जरूरत पड़ेगी।
 
अभी 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के बाद, चाहे उप्र के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव या मायावती हों, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, पंजाब को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हों, सभी ने ‘ईवीएम’ मशीन पर छेड़छाड़ के आरोप लगाए थे, जबकि अक्टूबर 2010 में सर्वदलीय बैठक में ‘ईवीएम’ इस्तेमाल के लिए व्यापक सहमति बनाते हुए कई राजनैतिक दलों ने ‘वीवीपीएटी’ का सुझाव दिया था, तभी से संभावना तलाशी जाने लगीं।
 
लेकिन जब इसके अनिवार्य इस्तेमाल की तैयारियां क्रमश: अमल में आने लगीं, तभी मप्र में यह सब हो गया। यह संयोग ही कहा जाएगा जो इसी 24 मार्च शुक्रवार को ‘ईवीएम’ से छेड़छाड़ मामले में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से 4 हफ्तों में जवाब मांगा ही था कि अगले ही शुक्रवार 31 मार्च को मप्र में कैमरों की मौजूदगी में ‘वीवीपीएटी’ की अलग कहानी कैद हो गई।
 
अब सवाल यह भी उठेगा, मशीन का आधिकारिक अंतिम उपयोग कहां हुआ था। जाहिर है, इसे कई कानूनी पहलुओं से जोड़ा भी जाएगा।
इधर, चुनाव आयोग यह दावा करता रहा है कि ‘ईवीएम’ मशीनों से तब तक छेड़छाड़ नहीं की जा सकती, जब तक उनकी टेक्निकल, मैकेनिकल और सॉफ्टवेयर डिटेल गुप्त रहें, तो क्या इसकी गोपनीयता भंग हो चुकी है? सवाल बहुत हैं, जिन पर आयोग व राजनीतिक दलों के बीच लंबी माथापच्ची होगी। पर विडंबना यही है कि दिखने वाली मशीन से विवाद उठा है।
 
‘ईवीएम’ की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए जहां जर्मनी ने इसे प्रतिबंधित किया था, वहीं इसी नक्शे कदम पर नीदरलैंड्स ने प्रतिबंधित किया। इटली ने भी नतीजों को आसानी से बदलने का आरोप लगाते हुए इसे चुनाव प्रक्रिया से ही हटा दिया, जबकि आयरलैंड ने संवैधानिक चुनावों के लिए ‘खतरा’ तक बता दिया। अमेरिका के कैलीफोर्निया सहित दूसरे राज्यों ने भी बिना पेपर ट्रेल के ‘ईवीएम’ के उपयोग से मना कर दिया। लेकिन हमारे देश में पेपर ट्रेल के डेमों में आई गड़बड़ी को लेकर सबकी निगाहें आयोग, सुप्रीम कोर्ट और राजनीतिक दलों पर है।
 
आखिर सवाल दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जनता की ताकत के साथ कथित ‘खिलवाड़’ का जो है, साथ ही यह देखना अहम होगा कि चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट में मत सत्यापन पर्ची की हकीकत पर अब क्या कहता है।

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