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दलबदल के दलदल में धंस गए मुद्दे

उत्तराखंड में इस बार विधानसभा चुनाव में आया राम गया राम की राजनीति के कारण सूबे के जनसरोकारों से जुड़े मुद्दे गायब दिखाई दे रहे हैं।
(Express Photo)

उत्तराखंड में इस बार विधानसभा चुनाव में आया राम गया राम की राजनीति के कारण सूबे के जनसरोकारों से जुड़े मुद्दे गायब दिखाई दे रहे हैं। सूबे की जनता इस विधानसभा चुनाव में अपने को ठगा महसूस कर रही है। जो नेता कांग्रेस सरकार की छत्र छाया में सत्ता की मलाई चाटते रहे वे चुनाव के ऐन मौके पर सूबे में भाजपा की सरकार बनने की संभावनाओं को देखते हुए, एक ही झटके में कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता जो पिछले पांच साल से भाजपा के बूूते विधायक या मंत्री बनने का सपना संजोए हुए थे, उनके सपने को बागी कांग्रेसी पूर्व विधायकों ने एक ही झटके में चकनाचूर कर दिया। आज भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता और नेता पार्टी हाईकमान को जमकर कोस रहे हैं। साथ ही राज्य की जनता इस पाला बदल से असमंजस में है। उत्तराखंड के गठन से लेकर अबतक 16 साल में राज्य में मुख्य रूप से पलायन, बेरोजगारी, अशिक्षा, पिछड़ापन, स्थायी राजधानी तथा महिला सशक्तिकरण के मुद्दे मुख्य रहे हैं। इन मुद्दों को लेकर हर चुनाव में हर राजनीतिक दल मतदाताओं को अपने घोषणा पत्र में सुंदर सपने दिखाता है। परंतु सरकार बनने के बाद राजनीतिक दल इन मुद्दों को भुला देते है।

विधानसभा चुनाव में हर राजनीतिक दल एक दूसरे पर दल बदल करवाने और भ्रष्टाचार के मुद्दे जोर शोर से उठाता है, परंतु जिस दल की सरकार राज्य में बनती है वहीं दल भ्रष्टाचार और अन्य मुद्दों को भूलकर अपने निहित स्वार्थों को पूरा करने में लग जाता है। उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन से जुड़े डा0 प्रदीप जोशी कहते हैं कि गैरसैण में यदि स्थायी राजधानी बनती है तो पहाड़ों का विकास होगा। कांग्रेस और भाजपा गैरसैण के मुद्दे पर नूरा कुश्ती लड़ रहे हैं। यदि गैरसैण स्थायी राजधानी बनती है तो सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा और कांग्रेस को होगा क्योंकि दोनों ही दल सत्ता पाने के बाद राजनीति के दलालों के चंगुल में फंसकर राज्य का दोहन करने में जुट जाते हैं।

पर्यावरण के लिए समर्पित भाव से लड़ने वाली संस्था मातृ सदन के संस्थापक स्वामी शिवानंद सरस्वती का कहना है कि उत्तराखंड में सबसे बड़ा मुद्दा पर्यावरण और नदियों के खनन से जुड़ा है। उनका मानना है कि उत्तराखंड के 16 साल में उत्तराखंड में हर राजनीतिक दल ने यहां के पर्यावरण-नदियों के साथ खिलवाड़ किया है। उनका कहना है कि उत्तराखंड में खनन माफिया और शराब माफिया सत्ता चलाने वालों पर हावी रहता है। खनन और शराब दो ऐसे कमाने के धंधे है जो राजनेताओं को रातोरात अमीर बना देते हैं। इस बार जन आंदोलन से जुड़े लोग शराब, खनन, बेरोजगारी, महिला सशक्तिकरण, अशिक्षा और गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाने के मुद्दे जनता के सामने उठाकर दलों को परेशानी में डाल सकते हैं।

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