ताज़ा खबर
 

उत्तर प्रदेश चुनाव: सपा को सता रहा है भितरघात का खौफ, कांग्रेस की दी सीटों पर बढ़ रहा है असंतोष

चार माह तक लगातार मुलायम परिवार में सत्ता के लिए हुए संघर्ष ने समाजवादी पार्टी को खेमों में बांट दिया है।
Author लखनऊ | February 13, 2017 04:04 am
सुल्तानपुर चुनावी रैली में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव। (REUTERS/Pawan Kumar/24 Jan, 2017)

चार माह तक लगातार मुलायम परिवार में सत्ता के लिए हुए संघर्ष ने समाजवादी पार्टी को खेमों में बांट दिया है। इसी खेमेबाजी ने विधानसभा चुनाव के पहले अखिलेश यादव की पेशानी पर बल पैदा कर रखा है। वे जिलों में तैनात पार्टी के कार्यकर्ताओं पर आंखें बंद कर भरोसा करने का साहस नहीं बटोर पा रहे हैं। जबकि यह चुनाव उनकी साख का सवाल बनकर उभरा है। सौ से अधिक विधानसभा सीटों को कांग्रेस के लिए छोड़ने और 37 मौजूदा विधायकों को टिकट न देने के फैसले ने अखिलेश यादव को नई मुसीबत में डाल रखा है इस मुसीबत से पार पाना सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए आसान नहीं है।  कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के बाद समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से 100 सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ीं। सपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘इन सौ सीटों पर अखिलेश यादव ने बिना कुछ किए भितरघातिये पैदा कर दिए। पार्टी के ये वे नेता थे जिन्होंने पांच सालों तक लगातार टिकट की आस में इन सीटों पर कड़ी मेहनत की थी। इतना ही नहीं कांग्रेस के लिए छोड़ी गई सौ सीटों में से एक तिहाई को बिना लड़े सपा ने भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को परोस दीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि 27 सालों से उत्तर प्रदेश में वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस के लिए सौ सीटों पर जीत दर्ज करना, दिवास्वप्न देखने से अधिक कुछ नहीं।

इन सौ सीटों के अलावा अपने 37 विधायकों का टिकट काटकर अखिलेश यादव ने प्रदेश की इन सीटों पर सपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे नए प्रत्याशियों की जीत की डगर बेहद कठिन कर दी। उन्होंने अपने ही उच्च शिक्षा राज्यमंत्री शारदा प्रताप शुक्ल, राज्यमंत्री स्वतंत्रप्रभार विजय मिश्र, पांच बार के विधायक और परिवहन राज्यमंत्री मानपाल सिंह, बाल विकास और पुष्टाहार तथा ऊर्जा व बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री वसीम अहमद का भी टिकट काट दिया। इनके अलावा कई पूर्व मंत्री भी अखिलेश की जद में आकर टिकट से दावा गंवा बैठे। नारद राय, अंबिका चौधरी को साइकिल से उतर कर हाथी की सवारी करने पर विवश होना पड़ा। इन दोनों ही नेताओं का कुसूर सिर्फ इतना था कि वे मुलायम सिंह यादव और शिवपाल सिंह यादव के करीबी माने जाते थे। भितरघात के परिलक्षित होने वाले उपरोक्त कारणों के अलावा प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर शिवपाल सिंह यादव के समर्थकों की संख्या भी खासी है। समाजवादी पार्टी से ढाई दशक से जुड़े ये वे नेता और कार्यकर्ता हैं जिन्होंने शिवपाल सिंह यादव के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद अखिलेश समर्थक युवा नेताओं से जिलों में मोर्चा लिया था और उनका डटकर विरोध किया था। प्रदेश अध्यक्ष से शिवपाल यादव के सिर्फ जसवंतनगर से सपा प्रत्यशी की हैसियत तक पहुंचने से उनके समर्थक खासे निराश बताए जाते हैं। इस बाबत वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक राघवेंद्र त्रिपाठी कहते हैं, ‘मुलायम सिंह यादव और शिवपाल समर्थकों का विरोध अखिलेश यादव के लिए विधानसभा की कई सीटों पर सियासी सबक का कारण बन सकता है। 147 सीटों पर एक साल पहले जिन लोगों ने साक्षात्कार दिया। एक वर्ष से वे अपने क्षेत्र में काम भी कर रहे थे। उनमे से किसी एक को अखिलेश यादव ने टिकट नहीं दिया। ऐसे में उनकी चुनाव में भूमिका दरअसल होगी क्या? यह बताने की आवश्यकता नहीं है।’

हालांकि मुलायम सिंह यादव अपने भाई शिवपाल के विधानसभा क्षेत्र जयवन्तनगर से चुनाव प्रचार शुरू करने जा रहे हैं। वे यह दावा भी कर रहे हैं कि शिवपाल 11 मार्च के बाद कोई राजनीतिक दल नहीं बनाएंगे लेकिन सपा में कौन कब अपने बयान से पलट जाय और कितनी बार पलट जाय, यह कह पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है। समाजवादी पार्टी में भितरघात का चलन पुराना है। कई असफल टिकटार्थियों ने 2012 में विधानसभा चुनाव के दौरान अपने साथियों के खिलाफ प्रचार किया था और उन्हें हराने के लिए कार्यकर्ताओं को लामबंद करने की पुरजोर कोशिश की थी। इस बात का खुलासा खुद प्रो. राम गोपाल यादव ने उस वक्त सपा के प्रदेश मुख्यालय पर मुलायम सिंह यादव के समक्ष किया था। उसी पुरानी पटकथा का दोहराव रोकने की इस वक्त समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता कोशिश कर रहे हैं। उन्हें अपने इस प्रयास में कामयाबी कितनी मिलेगी, इसकी तस्दीक चुनाव परिणाम करेंगे।

 

 

पीएम मोदी के 'रेनकोट' वाले बयान का स्‍मृति ईरानी ने किया बचाव, बोलीं- 'कांग्रेस ने गिराया बहस का स्‍तर'

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.