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उत्तर प्रदेश चुनाव: बिजनौर में दो कुनबों के बीच फंस गई भाजपा, बुदेलखंड में भी मुश्किल है राह

भाजपा का टिकट न मिलने पर उन्होंने इस सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है।
Author बिजनौर | February 1, 2017 03:26 am
पीएम नरेंद्र मोदी। PTI Photo by Manvender Vashist

जिले की बढ़ापुर सीट पर भाजपा के दो दिग्गज आमने-सामने हैं। भाजपा ने यहां टिकट मुरादाबाद जिले की ठाकुरद्वारा सीट से सांसद सर्वेश कुमार के बेटे सुशांत को दिया है। इस सीट से अभी तक वरिष्ठ भाजपाई नेता इन्द्रदेव लड़ते रहे हैं। भाजपा का टिकट न मिलने पर उन्होंने इस सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। दरअसल क्षत्रियों के दो ताकतवर कुनबों की दस साल से चली आ रही लड़ाई भाजपा के लिए भारी पड़ गई है। 2012 के चुनाव में यहा से भाजपा ने टिकट इन्द्रदेव सिंह को दिया था तो उनकी मुखालफत के लिए भाजपा नेता सर्वेश कुमार ने अपनी पत्नी साधना सिंह को महान दल से मैदान में उतार दिया था।

नतीजन दोनों हार गए थे और बसपा के मो गाजी इन्द्रदेव से लगभग 27,000 वोटों से जीत गए थे। मजेदार बात यह है कि 2012 के जिस चुनाव में सर्वेश सिंह की पत्नी साधना सिंह भाजपा उम्मीदवार इन्द्रदेव सिंह के खिलाफ बढ़ापुर बिजनौर से चुनाव लड़ रही थी। उसी वक्त सर्वेश सिंह खुद भाजपा के ही टिकट पर ठाकुरद्वारा से चुनाव लड़े रहे थ। ठाकुरद्वारा और बढ़ापुर दोनों ही मुरादाबाद संसदीय क्षेत्र में आते हैं। सर्वेश सिंह ठाकुरद्वारा से चुनाव जीत गए थे।
2014 में भी लोकसभा चुनाव के दौरान इन्द्रदेव व सर्वेश सिंह दोनों ही ठाकुरद्वारा ने मुरादाबाद लोकसभा सीट से टिकट मांगा था। टिकट सर्वेश सिंह को मिल गया था। इन्द्रदेव सिंह बागी होकर बसपा में चले गए थे और उन्होंने 2014 में वहां के बसपा उम्मीदवार का चुनाव लड़ाया था। वैसे अफजलगढ़ वर्तमान में बढ़ापुर क्षेत्र से इन्द्रदेव सिंह पांच बार विधायक बन चुके हैं इन्द्रदेव सिंह और सर्वेश सिंह के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा 2009 के संसदीय चुनाव से शुरू हुई जबकि दोनों ही मुरादाबाद लोकसभा से भाजपा का टिकट मांग रहे थे।

सूखी माटी किसका करेगी तिलक

सुनील कुमार शर्मा

बुंदेलखंड की राननीति में उतार-चढ़ाव तो कई हुए किन्तु 1996 से 2012 तक बारी-बारी सभी दलों का बुंदेलखंड के मतदाताओं ने राजतिलक किया। परन्तु बुंदेलखंड की दुर्दशा ज्यो की त्यों रही। यहां न तो रोजगार सृजन के लिए प्रयास हुए और न ही किसानों के लिए सिंचाई के लिए समुचित पानी मिला। आज भी बुंदेलखंड के पिछड़ेपन मे यही मुद्दे सामने हैं।

बुंदेलखंड के मतदाताओं ने सभी दसों को भरपूर समर्थन दिया। भाजपा को 1996 मे 7 और बसपा को भी 7 विधायक दिए। उस समय बसपा भाजपा की सरकारें बनीं किन्तु बुंदेलखंड के पिछड़ेपन को दूर नहीं किया जा सका। इसके बाद 2002 मे बसपा को सर्वाधिक 8 सीटें प्राप्त हुई। सपा को 6 सीटें मिलीं। भाजपा को 4 तथा कांग्रेस को 3 सीटें मिली थीं। 2002 मे पहले बसपा फिर सपा की सरकार बनी। इस सरकार में भी बुंदेलखंड के विकास के लिए कोई ठोस पहल नहीं हुई। वर्ष 2007 मे बुंदेलखंड की 21 सीटों मे से 13 सीटें बसपा ने जीत कर रेकार्ड बनाया। 2007 मे बसपा की सरकार बनी। तीन कैबिनेट व दो राज्यमंत्री बुंदेलखंड से बनाए गए। किन्तु दुर्भाग्य फिर रहा कि बुंदेलखंड के गरीब किसानों की मजबूती तथा नवयुवकों को रोजगार दिलाने की पहल पूर्ण बहुमत वाली सरकार ने नहीं की। 2012 मे सपा को पहली बार 8 सीटें प्राप्त हुर्इं। सरकार सपा की बनी। 2017 में चुनावी घोषणा के पूर्व इस सरकार ने युवाओं व किसानों को निराश किया।

बुंदेलखंड मे 1986 मे औद्योगिक हब उरई व झांसी में बना था। उरई 101 फैक्ट्रियां लगाई थीं जिसमें 95 फीसदी बंद पड़ी हैं। खैरात मे भले ही सरकारें कुछ वितरण कर दें लेकिन उद्योग लगाने के लिए ठोस रणनीति नहीं बन सकी। बुंदेलखंड में आए दिन किसान सूखे की मार से टूटता जा रहा है। तंगहाली से वह आत्महत्या को मजबूर है लेकिन सरकारों ने सिंचाई की व्यवस्था न करने से आज किसान मजवूत नहीं हो सका। अब फिर से मतदान के लिए बुंदेलखंड की सूखी माटी राजतिलक करने को तैयार है।

 

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