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सीटों पर विवाद के बाद अकेले उतरने की तैयारी में लोकदल

उत्तर प्रदेश में सपा, कांग्रेस व लोकदल के बीच होने वाला गठबंधन परवान चढ़ने से पहले ही हाशिए पर जाता नजर आ रहा है।
Author मेरठ | January 20, 2017 03:48 am
अजीत सिंह और रालोद महासचिव जयंत चौधरी (दाएं)। (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश में सपा, कांग्रेस व लोकदल के बीच होने वाला गठबंधन परवान चढ़ने से पहले ही हाशिए पर जाता नजर आ रहा है। कांग्रेस उन दस सीटों पर अपना दावा ठोक रही है जहां लोकदल अपने को मजबूत मानता है। इन सीटों को लेकर गठबंधन में रालोद के शामिल होने को लेकर पेंच फसता नजर आ रहा है। सीटों के विवाद के चलते लोकदल अब विधानसभा चुनाव में अकेले ही चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है।  हालांकि राजनैतिक जानकारों का कहना है कि अगर गठबंधन में लोकदल शामिल नहीं होता है तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पहले चरण में होने वाले चुनाव में सपा, कांग्रेस व लोकदल को नुकसान का खतरा है। इसका सीधा फायदा सपा व बसपा को मिलेगा। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद मुसलमान लोकदल से पूरी तरह छिटक गया था। लेकिन अगर सपा, कांग्रेस व लोकदल के बीच गठबंधन होता तो कयास लगाए जा रहे थे कि मुसलमान भाजपा को हराने के लिए एकतरफा इस गठबंधन का साथ देता। लेकिन इस गठबंधन के न होने पर मुसलमान सपा, कांग्रेस के साथ ही बसपा के मुसलिम उम्मीदवारों को अपना समर्थन देगा।

सपा, कांग्रेस व लोकदल के बीच जिन सीटों को लेकर विवाद बना हुआ है उनमें मेरठ की सिवालखास व सरधना के साथ ही मुजफ्फरनगर की खतौली, शामली, चरथावल व मथुरा की मांट व सादाबाद समेत दस सीटे हैं। 2012 में लोकदल 46 विधानसभा सीटों पर चुनाव मैदान में था। लेकिन उसके उम्मीदवार खतौली, छपरौली, खैर, बरोली, मोदीनगर, इगलास, छाता, बलदेव व मांट सीट पर ही जीत दर्ज कर पाए थे। सिवालखास, सरधना, बागपत व बडौत समेत करीब 12 सीटों पर लोकदल के उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे थे। पिछला विधानसभा चुनाव कांग्रेस व लोकदल ने मिल कर लड़ा था। लेकिन लोकदल के 46 उम्मीदवारों में से केवल नौ उम्मीदवार ही चुनाव में जीत हासिल कर सके थे। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव इस बार राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण माने जा रहे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस, सपा व लोकदल गठबंधन की राह पर चल रहे थे। कांग्रेस का भी मानना था कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को शिकस्त देनी है तो अकेले चुनाव मैदान में न उतरकर गठबंधन के साथ चुनाव मैदान में उतरा जाए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में करीब दो दर्जन विधानसभा सीटे ऐसी हैं जहां जाट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव में जाटों के एक बड़े तबके ने भाजपा को वोट किया था। लेकिन इन विधानसभा चुनाव में जाट बिरादरी जाट आरक्षण, नोटबंदी व कुछ दूसरे मुद्दों को लेकर भाजपा से नाराज नजर आ रहा है। वैसे पहला इतिहास भी देंखे तो जाट बिरादरी अजित सिंह को एक बार सबक देने के बाद फिर से अजित के साथ नजर आती है।

सपा, कांग्रेस व लोकदल के बीच होने वाले गठबंधन में रार भी उन सीटों को लेकर हुई जहां जाट भारी तादाद में हैं और कांग्रेस पर अपना दावा ठोक रही है। गठबंधन के तहत अजित को 28 से 30 सीट देने की बात तय हो गई थी। लेकिन आधे से अधिक वो सीटें दी जा रही थीं जहां गठबंधन बेहद कमजोर रहता। अब लोकदल का कहना है कि वह अकेले ही चुनाव मैदान में उतरेगा। हालांकि जानकारों का यह भी मानना है कि ये लोकदल की दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकती है या मजबूरी भी।

 

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