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उत्तर प्रदेश चुनाव: पिछड़ों की उम्मीदवारी से अगड़े नेताओं में मारामारी

लोकसभा चुनाव में हिंदुत्व की आंधी भाजपा के पक्ष में इतनी तेज थी कि किसी ने यह नहीं देखा कि पार्टी ने किस बिरादरी का उम्मीदवार बनाया है, पर विधानसभा चुनाव ने इस लामबंदी को बिखेर कर रख दिया है।
Author उरई | February 1, 2017 03:06 am
भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (Source: PTI File)

सुनील कुमार शर्मा

भाजपा में एक वर्ग भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक के खिलाफ पूरी पार्टी ओबीसी के हवाले करने जैसी भड़ास निकाल रहा हो लेकिन अगर बुंदेलखंड में ही प्रत्याशियों के चयन का जातिगत विश्लेषण किया जाए तो इस धारणा के पैर कहीं नजर नहीं आते। बुंदेलखंड की 19 सीटों में से पांच अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हैं जबकि शेष 14 सीटों में से 7 पर सामान्य वर्ग के और इतनी ही सीटों पर आबादी ज्यादा होने के बावजूद ओबीसी के उम्मीदवार तय किए गए हैं।
लोकसभा चुनाव में हिंदुत्व की आंधी भाजपा के पक्ष में इतनी तेज थी कि किसी ने यह नहीं देखा कि पार्टी ने किस बिरादरी का उम्मीदवार बनाया है, पर विधानसभा चुनाव ने इस लामबंदी को बिखेर कर रख दिया है। दरअसल लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा उत्तर प्रदेश में हर चुनाव में इतनी पिछड़ती जा रही थी कि उसका वजूद ही खत्म माना जाने लगा था। लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान तब्दीली नजर आने लगी थी लेकिन फिर भी पार्टी के लोग आश्वस्त नहीं थे कि यूपी में उनको कितनी सीटें हाथ लग पाएंगी इसलिए टिकट को लेकर तब ऐसी मारकाट पैदा नहीं हुई थी।

1989 के पहले तक प्रदेश में बुंदेलखंड जैसे अंचलों में अनारक्षित सीटों पर कुछ ही जातियों के उम्मीदवार प्रभावशाली मानकर तय किए जाने की परंपरा थी लेकिन बाद में लोकतंत्र में जब हाशिए पर छिटकी हुई जातियों का उभार हुआ तो न केवल उनकी दावेदारी भी बढ़ने लगी बल्कि इन जातियों के विधायकों की भी अच्छी खासी संख्या नजर आने लगी।भाजपा के पुनरोदय को जो वर्ग पुरानी स्थिति की बहाली मान रहा है उसने टिकट के बंटवारे के समय पार्टी के लिए समस्या पैदा कर दी। भाजपा नेतृत्व ने पार्टी पर ऐसे लोगों के हावी होने की वजह से उन्हें काफी हद तक समाहित किया। सामान्य वर्ग में इसी कारण आधी सीटें देनी पड़ीं। सात सवर्ण उम्मीदवारों में झांसी, महोबा, बांदा और चित्रकूट में ब्राह्राण और कालपी, हमीरपुर व बबीना में क्षत्रिय उम्मीदवार बनाए गए। सामान्य वर्ग में भी वैश्य वर्ग में पार्टी के प्रति जबर्दस्त नाराजगी है। इस समुदाय का कहना है कि उसे एक भी सीट नहीं दी गई है, जबकि एक समय बुंदेलखंड में उरई की सीट समाज के कद्दावर नेता दिवंगत बाबूराम एमकॉम के पास रहती थी।

ओबीसी में दो सीटें कुर्मी, लोध बिरादरी को और दो कुशवाहा बिरादरी को दी गई हैं जबकि एक सीट अति पिछड़े समुदाय में प्रजापति समाज के उम्मीदवार को मिली है। भाजपा नेतृत्व हिंदुत्व के आधार पर किए गए धु्रवीकरण का सत्यानाश होते देख घबराया हुआ है। सबसे बड़ा खतरा तो यह है कि कई क्षेत्रों में सामान्य वर्ग के निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में उतारकर पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी को नुकसान भी पहुंचाया जा सकता है। ऐसी सूरत से बचने के लिए भाजपा नेतृत्व ने मध्य प्रदेश के प्रभावशाली कैबिनेट मंत्री नरोत्तम मिश्रा को तमाम इलाकों में पार्टी के लोगों को समझाने के लिए भेजा।

 

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