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DU: खतरे में 80 फीसद तदर्थ शिक्षकों की नौकरी

दिल्ली विश्वविद्यालय में सालों से अध्यापनरत 80 फीसद तदर्थ शिक्षकों की नौकरी खतरे में पड़ गई है।
Author December 4, 2016 02:23 am

दिल्ली विश्वविद्यालय में सालों से अध्यापनरत 80 फीसद तदर्थ शिक्षकों की नौकरी खतरे में पड़ गई है। विश्वविद्यालय की विद्वत परिषद में शिक्षकों की पक्की नौकरी के लिए यूजीसी की ओर से तय किए गए नए मानक (संशोधन-4) को कथित स्वीकृति दिए जाने के बाद तदर्थ शिक्षकों के स्थायित्व का आंदोलन अब आर-पार की लड़ाई में बदल गया है। विद्वत परिषद के निर्वाचित 26 शिक्षक सदस्यों में से 22 ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर इस मुद्दे पर एसी बैठक में बिना बहस किए एकतरफा फैसला लेने का आरोप लगाते हुए प्रति कुलपति जेपी खुराना से जवाब तलब किया है। इतना ही नहीं डूटा ने कुलपति को सोमवार तक का समय देते हुए पूछा है कि वे सालों से पढ़ा रहे शिक्षकों को समायोजित करेंगे या नहीं? सूत्रों की मानें, तो कुलपति से पूछा गया है कि सालों से पढ़ा रहे शिक्षकों को लेकर यूजीसी के चौथे संशोधन में बीच का रास्ता निकालने के पक्षधर वो हैं या नहीं? इसके बाद सोमवार शाम डूटा व एडहॉक शिक्षकों की सभा बुलाई गई है, जिसमें आंदोलन की रूपरेखा की घोषणा की जाएगी।

माना जा रहा है कि अगर बात नहीं बनी तो कैंपस एक बार फिर जंतर-मंतर में बदल जाएगा। दरअसल बिना बहस किए एकतरफा फैसला लिए जाने का विरोध कर रहे शिक्षकों का कहना है कि एक कमेटी गठित कर सालों से पढ़ा रहे शिक्षकों को समायोजित करने के लिए तय मानक में ढील दी जानी चाहिए। यूजीसी के नए मानक को तब तक लागू नहीं किया जाना चाहिए जब तक कमेटी रपट न दे दे। सूत्रों के मुताबिक, विद्वत परिषद के सदस्यों मसलन डॉ शशि शेखर सिंह, डॉ रुद्राशीष, प्रो हंसराज सुमन सहित 22 शिक्षक प्रतिनिधियों ने कुलपति से पूछा है कि एकतरफा कार्यवाही क्यों की गई? उन्होंने विश्वविद्यालय से कहा है कि तदर्थ शिक्षकों के स्थायित्व पर लिए गए निर्णय को पास न माना जाए। इतना ही नहीं, एडहॉक महिला शिक्षकों को प्रसव के दौरान मातृत्व अवकाश न दिए जाने के मुद्दे को राष्ट्रीय महिला आयोग व राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में उठाकर विश्वविद्यालय को घेरने की भी तैयारी है। इसका अलटीमेटम भी विश्वविद्यालय प्रशासन को दिया जा चुका है। विश्वविद्यालय को इस बाबत भेजे पत्र में कहा गया है कि देश के अन्य विश्वविद्यालय व दूसरे स्थानों पर मातृत्व अवकाश दिए जाने का प्रावधान है तो डीयू के कॉलेजों में ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों? यह सीधे-सीधे मानवाधिकार के हनन का मामला है।

उधर अनशन व भूख हड़ताल के बाद तदर्थ शिक्षकों ने आम सभा कर कहा कि यह उनके जीवन का सवाल है। उन्होंने आंदोललन के लिए अदालत से लेकर कैंपस और सड़क से लेकर संसद तक का विकल्प खुला रखा है। उन्होंने कहा कि आइआइटी व आइआइएम में तीन साल के बाद कोई तदर्थ नहीं रहता, वहां स्वत: स्थायी बनने का प्रावधान है। फिर डीयू में 10-12 साल के पीड़ितों को कतार में क्यों रखा गया है? तदर्थ शिक्षक ईसी में प्रस्ताव पारित कर जो जहां कार्यरत है उसे वहीं पक्का करने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने यूजीसी की ओर से तय किए गए नए मानक (50:30:20 फार्मूला) को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का उल्लंघन बताते हुए कहा कि कोई भी नियम पिछली तारीख से लागू नहीं होता। यह आगे के लिए लागू होता है। उन्होंने दावा किया कि वे सालों से पढ़ा रहे हैं और रिक्तियां कई सालों की है। लिहाजा नया नियम उन पर लागू नहीं होगा। पूर्व डूटा अध्यक्ष आदित्य नारायण मिश्र ने कहा यूजीसी का नया निर्देश 80 फीसद तदर्थ शिक्षकों को बाहर करने के लिए लाया गया है। डूटा अध्यक्ष नंदिता नारायण ने कहा, ‘हमने तदर्थ शिक्षकों के सामूहिक स्थायीकरण के लिए विश्वविद्यालय से विधिवत निपटान कराने की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है, सोमवार तक कुलपति के फैसले का इंतजार है।’

बता दें कि दिल्ली विश्वविद्यालय संसद के विशेष अधिनियम से बनी एक स्वायत्त संस्था है, जिसकी विद्वत परिषद ऐसे फैसले लेने के लिए अधिकृत है और वह ऐसा कर सकती है। विश्वविद्यालय के कानूनी पहलुओं के जानकारों की मानें तो ऐसा कई बार हो चुका है। दिल्ली विश्वविद्यालय में ही 1977, 1987, 1998 और 2003 में विद्वत परिषद ने अपनी अनुशंसा से तब के तदर्थ शिक्षकों को स्थायी किया था। शिक्षकों का कहना है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने इस बाबत आए एक फैसले में साफ कहा है कि नियमित और वित्त स्वीकृत पद पर चार महीने से ज्यादा काम करने वाला व्यक्ति उस पद पर स्थायी नौकरी पाने का हकदार है। 1987 में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि स्थायी पद पर बार-बार तदर्थ नियुक्ति नहीं हो सकती। बता दें कि डीयू में नए कुलपति के आने का बाद स्थायी नियुक्तियां बंद हैं। इस बाबत डीयू के तदर्थ शिक्षक राष्ट्रपति को 2000 से ज्यादा हस्ताक्षरित ज्ञापन सौंप चुके हैं।

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