June 25, 2017

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आज तक कोई भी महिला अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष क्यों नहीं बन सकी, यह चिंता जरूरी और मौजूं है

ओबामा जब अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने तो दुनिया को लगा था कि अमेरिका से उसके उपनिवेशवाद के दौर और श्वेत स्टेलर सोसायटी का दबदबा वाला नस्लवाद अब चला गया है लेकिन शायद वो सिर्फ और सिर्फ एक भ्रम था।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

विश्व में जहां कहीं भी अमेरिका की बात होती है, तो सभी उसे एक अलग सी तरज़ीह के साथ सुनते हैं, या यूं कहें कि अमेरिका की हर बात निराली समझी जाती है। विशेष रूप से यदि हम भारतीयों के संदर्भ में इस तथ्य को विश्लेषित करें तो यह सुनिश्चित है कि भारत में अमेरिका विकास की प्रामाणिकता का ऐसा पैमाना समझा जाता है कि अब हाथ कंगन को आरसी क्या है, जैसा मुहावरा मानो हमने अमेरिका के लिए ही बनाया हो। लेकिन पिछले कुछ दिनों से लगातार अमेरिका में भारतीयों के साथ जो बेहद शर्मनाक नस्लवादी घटनाएं घट रहीं हैं, उनके लिए दो आरसियों को जोड़कर आवर्धक लैंस बनाकर एक सूक्ष्मावलोकन करने की आवश्यकता आ पड़ी है। सबसे बड़ा प्रश्न यही पहले ज़ेहन में उठता है कि क्या मात्र वैज्ञानिक, तकनीकी और औद्योगिक स्तर पर ऊँचाइयां हासिल कर लेने से कोई देश विकासित कहलाने का सही हक़दार है? कतई नहीं, जिसकी सोच में आज भी कहीं नस्लवाद की क्षुद्रता बिलबिलाई हुई है, आज भी जिसकी मानसिकता अपनी गोरी चमड़ी की खाल से बाहर नहीं निकल पाई है, ऐसी तकनीकी अनात्मिक देह वाला रोबोटिक देश विश्व बंधुत्व और विश्व शांति जैसे गूढ़ परालौकिक संवेदनाओं को क्या अनुभूत कर सकेगा।

ओबामा जब अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने तो दुनिया को लगा था कि अमेरिका से उसके उपनिवेशवाद के दौर और श्वेत स्टेलर सोसायटी का दबदबा वाला नस्लवाद अब चला गया है लेकिन शायद वो सिर्फ और सिर्फ एक भ्रम था। इतिहास साक्षी है कि अमेरिकी नस्लवाद का सबसे अधिक शिकार एशियाई अमेरिकी, अफ्रीकी अमेरिकी और लेटिन अमेरिकी होते आए हैं। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने एक बार अपने एक साक्षात्कार में इस बात को स्वीकारा था कि नस्लवाद अमेरिका के डीएनए में है। अमेरिका अपनी नस्लीय मानसिकता से अभी तक नहीं उबरा है और वहां इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं।

अमेरिका में नस्लवाद की जड़ें जितनी गहरी हैं, तो नारीवाद के प्रति उतना ही उथलापन है। वह अमेरिका ही था जिसने सोशलिस्ट पार्टी के आह्वान पर अपने देश की महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिलवाने के लिए 1910 में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन सम्मेलन में महिला दिवस को अन्तर्राष्ट्रीय दिवस का दर्जा दिलवाया था। उस समय अमेरिका में महिलाओं की स्थिति वाकई सशक्तिकरण जैसी प्रक्रिया अपनाए जाने की मोहताज रही होगी। महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता वाला अमेरिका शायद कभी भी वियतनाम युद्ध में वियतनामी महिलाओं के अदम्य साहस से मिली शिकस्त को भुला नहीं पाता होगा। दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में विभिन्न उच्च पदों पर आसीन महिलाएं अपने सशक्त वर्चस्व की स्वयं सिद्धा रही हैं और भारत में तो नारी स्वयं शक्ति का अवतार है तो यहां उसका कैसा सशक्तिकरण?

यह अलग बात है कि भारत में अमेरिका की नकल करने की प्रवृत्ति के चलते पश्चिमी नारीवाद को महिला दिवस का जामा पहनाकर शक्ति को ही शक्ति से सम्पन्न कराने के हास्यास्पद प्रयास किए जाते रहे हैं। जबकि महिला अधिकारों के प्रति उनमें जागरुकता लाना या अपनी हक की लड़ाई लड़ना किसी सशक्तिकरण की परिभाषा के दायरे में नहीं आती। जो सशक्त है वही अपने अधिकारों और अस्मिता की रक्षा के लिए लड़ सकता है। सही मायनो में इसकी आवश्यकता अमेरिका को थी और इसलिए उसने महिलाओं के अधिकारों के सशक्तिकरण के मुद्दों को भले ही अन्तर्राष्ट्रीय दर्जा दिलवा दिया हो लेकिन वास्तव में खुद अमेरिका में महिलाओं की स्थिति आज भी क्या है, इसके वैसे तो कई सबूत मिल जाएंगे, लेकिन दो बड़ी बातें यहां इसकी पुष्टि करने के लिए पर्याप्त हैं कि आज तक भी कोई महिला अमेरिका की राष्ट्राध्यक्ष न बन सकी है और दूसरा सबूत हाल ही में अमेरिकी नौसेना की महिला कर्मचारियों की न्यूड तस्वीरों के लीक होने से स्पष्ट होता है कि वहां महिलाओं की स्थिति कितनी सम्मानजनक है?

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किसी भी देश या व्यक्ति के सद्चरित्र का मूल्यांकन करने के लिए उसके मानवता के प्रति सहृदय दृष्टिकोण और स्त्री सम्मान की भावना जैसे दो मूलभूत बिन्दू पर्याप्त होते हैं। कोई भी राष्ट्र स्वयं को तभी पूर्ण विकसित कहलाने का अधिकारी हो सकता है जो तकनीकी जैसी भौतिक उपलब्धियों के साथ साथ इन दोनों मूलभूत संस्कारों पर भी उतना ही खरा उतरता हो। परमाणु हथियारों की धौंस तो उत्तर कोरिया जैसे देश भी जताते रहते हैं, लेकिन क्या सिर्फ परमाणु शक्ति विकसित होने का परिचायक है? नहीं, फिर यही बात अमेरिका पर भी लागू क्यों नहीं हो सकती कि अंतरिक्ष से लेकर महासागरों और ध्रुवों पर अपना वैज्ञानिक व तकनीकी साम्राज्य फैला पाने वाला विकसित अमेरिका अपनी नस्लभेदी प्रवृत्ति और महिला सशक्तिकरण प्रक्रिया की अतृप्ति के साथ क्या वाकई भौतिक व मानसिक स्तरों पर समग्ररुप से एक विकसित देश कहलाने लायक है…?

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First Published on March 6, 2017 6:27 pm

  1. K
    k m
    Mar 7, 2017 at 10:07 am
    डा सुभ्रता मिश्र का लेख अमेरिकी मानसिकता का सटीक विश्लेषण है।साधुवाद
    Reply
    सबरंग