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कहानीः पानी का कोई अधिकार नहीं होता

सिर्फ बात तो की थी, वह भी फोन पर। बात भर करने से कोई गलतफहमी हो सकती है, तो मेरा क्या कसूर है। गलतफहमियां ये लोग खुद पाल लेते हैं और फिर सारी गलती हम औरतों के सिर मढ़ देते हैं। सोचते-सोचते मेरे दांत भिंच गए थे, कनपटी की नसें उभर आई थीं। ये क्या मतलब है, ये हरकतें, ये गलतफहमियां पुरुषों के ‘जीन्स’ में ही होती हैं क्या?
Author December 4, 2016 00:30 am

कृष्णा शर्मा 

इन्होंने किचन में आकर मुझे फोन पकड़ाया- ‘तुम्हारा फोन है’, तो मुझे थोड़ा अजीब-सा लगा। आमतौर पर जब मैं किचन में होती हूं, ये फोन उठा लेते हैं। मैंने ‘किसका है, तुम्हीं बात कर लेते न’ जैसी निगाहों से देखा, तो इन्होंने हल्के-से मुस्कराते हुए फोन मुझे लगभग जबर्दस्ती पकड़ा दिया। मैंने हड़बड़ी में हैलो बोला तो उधर से आलोक की आवाज थी। अभी आधे घंटे पहले तो इससे बात हुई थी! मेरे मुंह से अनायास निकल पड़ा- ‘हां बोलो’। मेरे बोलने के लहजे में कुछ ऐसा था कि वह एकदम संभल गया- ‘कुछ कर रही थी क्या?’ मैंने बहुत ठंडी आवाज में कहा- ‘हां किचन में हूं।’ मेरे ठंडे स्वर से वह शायद भांप गया था- ‘सॉरी सॉरी, मैं कल बात करता हूं, कोई खास बात नहीं थी।’ आधे घंटे के भीतर उसका तीसरी बार फोन करना मुझे बहुत अजीब लगा था। इतना लिजलिजा है क्या यह, मैंने बेकार ही फोन कर लिया था। सोचते-सोचते मैंने देखा कि मेरे हाथ सलाद काटते हुए कुछ ज्यादा ही तेज चलने लगे थे। प्रेशर कुकर के वेट को ऊपर करके मैंने अनजाने ही स्टीम निकाल दी। पता नहीं सब्जी में नमक डाला था या भूल गई। सब्जी को चखते हुए मैंने भरसक अपने को सामान्य करने की कोशिश की।

आलोक को मैं नहीं जानती थी। पिछले हफ्ते बैंक में अचानक रश्मि मिल गई थी। हम कॉलेज में साथ-साथ पढ़ते थे। उसी से कॉलेज की बातें याद करते-करते आलोक के बारे में पता चला। उसने बहुत याद दिलाने की कोशिश की कि ऐसा था, क्लास में अक्सर कहां बैठता था, उसके ग्रुप में कौन-कौन था। उसने बहुत याद दिलाने की कोशिश की, लेकिन मैं ठीक-ठीक याद नहीं कर पाई कि वह कौन-सा लड़का था, जिसे रश्मि आलोक कह रही है। ‘फेसबुक’ की कृपा से उसने पुराने संगी-साथी खोज निकाले थे। आलोक भी शायद उसे कहीं फेसबुक पर टकरा गया था। खाने की मेज पर बैठने तक मैं सामान्य नहीं हो पाई थी। हालांकि कुछ भी ऐसी बात नहीं हुई थी, जिसे मैं जरा भी असामान्य कह सकूं, लेकिन रह-रह कर मैं खुद अपने ‘चुप्पा’ स्वभाव को बिल्कुल सही होने का प्रमाण-पत्र दिए जा रही थी। पतिदेव ने जिस तरह मुस्कुराते हुए मुझे फोन पकड़ाया था वह कुछ न कहते हुए भी इतना तो बता ही गया था कि आधे घंटे के भीतर तीन बार फोन आना उन्हें बिल्कुल सामान्य नहीं लगा था। न उन्होंने कुछ पूछा, न मैंने अपने आप कुछ सफाई दी थी, लेकिन माहौल में कुछ तो ‘असामान्य’ हो गया था। वे कुछ पूछ लेते तो मैं संभवत: बिल्कुल समान्य हो ही जाती। उनका आलोक के बारे में कुछ भी बात न करना मुझे परेशान कर रहा था। अपने आप उसके बारे में कुछ बताना उस समय मुझे सफाई देना लग रहा था। मैं चाहती थी कि वे कुछ भी पूछें, आलोक के बारे में कुछ भी बात करें, लेकिन न जाने क्यों वे उस बारे में कुछ भी बात करने से बचते लग रहे थे। पता नहीं क्यों मैं बहुत बुरी तरह उखड़ गई थी।

उस रात मैं ढंग से सो नहीं पाई। सिर्फ इतनी तो बात थी कि कॉलेज के दिनों की थोड़ी याद ताजा कर ली जाए। पति को जब-तब लैपटॉप खोले हुए फेसबुक पर अपने पुराने दोस्तों से चैट करते देख कर न जाने कब मेरे मन में भी पुराने दिनों में थोड़ा घूम आने की इच्छा हिलोरें लेने लगी थी। मैंने रश्मि से यों ही बड़े हल्के-फुल्के अंदाज में फेसबुक को सौतन कह दिया, तो उसने तत्काल अपने टेबलेट पर फेसबुक खोल दी थी। मुझे तो फेसबुक पर जाना बस खेल-सा लगा था। मैं अपने को कोसने लगी- पता नहीं क्यों मेरी मति मारी गई थी, जो खेल-खेल में यह पंगा ले लिया। सुबह उठी तो थोड़ा फ्रेश थी। हालांकि रात को कोई और बात नहीं हुई थी, लेकिन फिर भी माहौल में एक चुप्पी-सी थी। ये अपने काम पर चले गए, मैं अपने लेक्चर्स की तैयारी में लग गई। मैं क्लास में थी तो आलोक का फोन आया। फोन साइलेंट मोड पर था। क्लास के बाद फोन बैग से निकाला तो देखा आलोक की तीन मिस्ड कॉल थीं। सोचा, अच्छा ही हुआ कि फोन साइलेंट था, खुद ही समझ जाएगा। फिर खयाल आया कि कल एक एनजीओ, जिससे वह जुड़ा था, के बारे में कुछ बता रहा था, उसमें ‘वुमन इंपावरमेंट’ पर मेरा लेक्चर करवाना चाहता था, कहीं उसी के बारे में तो मुझसे डेट-टाइम तय करना नहीं चाह रहा था। खैर, अगर सचमुच लेक्चर करवाना चाहता होगा तो फिर से फोन कर लेगा- मैंने सोचा।

शाम को सोकर उठी तो देखा कि फिर उसके दो फोन आए हुए थे। मुझे लगा, पता नहीं क्या सोचता होगा। फोन क्यों नहीं उठा रही। फिर कल कोई भी तो ऐसी बात नहीं हुई थी, जिसको वह फोन न उठाने का कारण मान सके। खूब सारी पुरानी बातें की थी, पुराने दोस्तों-सहेलियों के बारे में जानकारियों का आदान-प्रदान किया था, तमाम टीचर्स की छोटी-छोटी आदतों को याद कर-कर के खूब हंसे थे, फिर किसी दिन मिलते हैं कह कर बात किसी तरह खत्म की थी। ये घर में घुसे तो मेरी आलोक से ही फोन पर बात हो रही थी। इनके आते ही मैंने जल्दी-जल्दी बात खत्म की और चाय की तैयार में जुट गई। ये कमरे से ही अपने दफ्तर की दिन भर की सारी बातें बताते रहे- जब तक कि मैं चाय लेकर इनके सामने नहीं खड़ी हो गई- ये उठ कर बाथरूम में चेंज करने के लिए चले गए। बाथरूम से ये फोन पर बात करते ही निकले और पूरी चाय फोन पर ही खत्म हो गई।

‘वुमन इंपावरमेंट’ पर भाषण देने के लिए आलोक ने मुझे जबर्दस्ती राजी तो कर लिया था, लेकिन कब, कहां भाषण होना है, सुनने वाले कौन होंगे, कितनी देर बोलना होगा, मुझे पता नहीं था। तीन दिन तक आलोक का फोन नहीं आया तो मैंने सोच लिया कि वैसे ही भाषण-वाषण की बात कर दी होगी। बोलने से पहले एक तरह का दबाव तो होता ही है- फोन न आने से मैंने उस दबाव से अपने आपको मुक्त कर लिया था। चौथे दिन उसका फोन आया- ‘कार्यक्रम का डिटेल तो मालूम चल गया?… क्यों मैंने एसएमएस कर तो दिया था, आज कार्ड छप कर भी आ गए हैं, तो वह भी कूरियर कर रहा हूं, कल मिल जाएगा।’ वह एक सांस में बोल गया था। ‘ओह, एसएमएस मुझसे मिस हो गया होगा। दरअसल, दिन भर फ्लैट बुक कराने के इतने मैसेज आते हैं कि उन्हें देखने-पढ़ने के लिए भी घंटा भर चाहिए। चैक कर लूंगी।’ मैंने एकदम सहज होते हुए कहा था। लेकिन वह फोन भी तो कर सकता था, मैंने सोचा। खैर, अगले दिन मुझे कार्ड मिल गया। मुख्य वक्ता के रूप में मुझे भाषण देना था। अब तो थोड़ी ढंग से तैयारी करनी ही होगी। फिर मैंने संकट मोचन को याद किया।
इन जनाब का नाम राघव है, पर मैं संकट मोचन ही कहती हूं। क्योंकि मेरे हर संकट का उपाय इनके पास है। इस बार भी यही काम आए। पूरे विस्तार से पहले वुमन एंपावरमेंट पर बोले और फिर उसी क्रम से चार-पांच किताबें भी देखने को कहा, इस सूचना के साथ कि ये सब हमारी लाइब्रेरी में हैं। एक रूपरेखा तो राघव के बोलने से ही बन गई थी, बाकी सोचा लाइब्रेरी जाकर पूरा करूंगी। मन में जो भय था कि कैसे शुरू करें वह अब समाप्त हो गया था। उसकी जगह उत्साह ने ले ली थी।

फिर आलोक का फोन आ गया- ‘कार्ड मिल गया न?’ मैं अभी ठीक से हां कह भी नहीं पाई थी कि उसने एकदम पूछा- ‘अच्छा आओगी कैसे?’ मैं अभी कुछ कहती कि फिर अपने आप बोल पड़ा- ‘तुम्हें गाड़ी लेने आ जाएगी, कोई दिक्कत नहीं होगी, तुम बस यह बता दो कि तुम्हें घर से पिक करना है या कॉलेज से।’ मुझे कुछ बोलने का मौका ही नहीं दिया, मुझे हैरत भी होती थी कि दो साल साथ-साथ पढ़ते हुए जिससे मेरी कभी एक बार भी बात नहीं हुई थी, उसको एक बार फोन करने भर से वह कैसे इतनी बेतकल्लुफी से बात करता है। आप से तुम पर आ गया। उसका इतना अनौपचारिक होना मुझे खटक गया- ‘मैं अपनी गाड़ी से पहुंच जाऊंगी, और समय से पहुंच जाऊंगी।’ मैंने अपनी तरफ से भरसक औपचारिक होने की कोशिश की। वह शायद और भी बात करने के मूड में था, लेकिन मेरे दो टूक और औपचारिक स्वर से झटका-सा खा गया- ‘मैं तो इसलिए कह रहा था कि जगह ढूंढने में कहीं आपको मुश्किल न हो, चलिए कोई बात नहीं।’ मेरे बेरुखी वाले अंदाज से वह एकदम तुम से आप पर आ गया था।

रात को खाने के बाद टीवी के सामने बैठे चैनल बदल रही थी कि फोन बजा। देखा तो रश्मि का फोन था। इस समय रश्मि का फोन, मुंह से एकदम निकल गया- ‘क्या हुआ?’ ‘क्यों इस समय फोन नहीं कर सकती क्या?’ रश्मि बोली तो अपनी बेवकूफी का अहसास हुआ। हालचाल पूछने की रस्म अदायगी के बाद रश्मि ने जब थोड़ा छेड़ने के स्वर में कहा कि आजकल बड़े भाषण देने में लगी है, तो मेरा माथा ठनका- भाषण! कौन-सा भाषण?’ मैंने यों ही अनभिज्ञता जताई तो पता चला कि उसे आलोक ने कार्यक्रम के बारे में सब कुछ बताया हुआ है। बात शुरू तो रश्मि ने मजाक से की थी- ‘क्या बात है, ये क्या चक्कर चलाया है, दिन में एकाध बार आलोक किसी न किसी बहाने फोन कर ही लेता है, और किसी न किसी तरह तेरा जिक्र ले ही आता है।’ लेकिन बात करते रश्मि थोड़ा संजीदा हो गई थी- ‘मुझे कुछ अजीब लग रहा है, शुरू-शुरू में तो मैंने जयादा ध्यान नहीं दिया, लेकिन अब मुझे सब कुछ एकदम ‘नार्मल’ नहीं लग रहा है।’

नार्मल तो तो मुझे भी नहीं लग रहा था, लेकिन सब कुछ इतना अनायास हुआ था कि मैं कुछ भी नहीं कर सकती थी। तीन-चार दिन तो बीस बरस पहले की बातें याद करने में ही निकल गए और फिर आलोक ने मेरा भाषण तय कर दिया- पता नहीं बातों-बातों में कैसे यह जान लिया था कि मैं ‘वुमन इंपारवमेंट’ को लेकर इतनी ‘कमिटेड’ हूं। मुझे कोई भी कहीं भी कभी भी बुलाएगा, तो मैं पहुंच जाऊंगी। मुझे लगा उसने मेरी इसी कमजोरी को बड़ी चालाकी से ‘एक्सप्लायट’ किया है। रश्मि से बात करने के बाद तो एक बार मैं सचमुच डर गई। क्या रोग पाल लिया है मैंने। लेकिन मैंने किया ही क्या है? सिर्फ बात तो की थी, वह भी फोन पर। बात भर करने से कोई गलतफहमी हो सकती है, तो मेरा क्या कसूर है। गलतफहमियां ये लोग खुद पाल लेते हैं और फिर सारी गलती हम औरतों के सिर मढ़ देते हैं। सोचते-सोचते मेरे दांत भिंच गए थे, कनपटी की नसें उभर आई थीं। ये क्या मतलब है, ये हरकतें, ये गलतफहमियां पुरुषों के ‘जीन्स’ में ही होती हैं क्या? ये लोग एकदम इतनी जल्दी एक ही दिशा में क्यों सोचने लगते हैं। कहते हमें हैं और रहते हैं असल में खुद ख्वाबी दुनिया में, खुली आंखों से दिन में स्वप्न देखने की बीमारी लेकर ही पैदा होते हैं। मैं कभी महिलाओं के ताकतवर होने की बात पुरुषों के बरक्स नहीं करती थी, पुरुषों को चुनौती देने के लिए, उन्हें ललकारने, गलियाने के लिए ताकतवर होना मेरी थ्योरी तो नहीं ही थी। बरसों से न केवल मेरा इसमें पूरा विश्वास था, मैं अपने इस विश्वास को सत्य मान कर औरों से लड़ पड़ती थी- लेकिन इस एक अकेले आदमी ने मेरी सोच को ऐसी चुनौती दे डाली कि मैं भीतर तक हिल गई।

मैं समय रहते ही कार्यक्रम में पहुंच गई थी। हॉल लगभग भरा हुआ था। हॉल में घुसते ही हाथ जोड़ कर एक अधेड़ से व्यक्ति ने स्वागत किया- जवाब में मैंने भी हाथ जोड़े। सीधे जाकर बैठ गई। ‘मैं आलोक’- वही अधेड़ व्यक्ति मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। ‘ओह’ अच्छा-अच्छा तनाव के बावजूद मैंने चेहरे पर मुस्कान लाने की भरसक कोशिश की थी- ‘मैं कनुप्रिया’ मैंने कहा तो उसने कहा- ‘मैं तो देखते ही पहचान गया था, कॉफी या चाय- क्या लेंगी आप?’ ‘आप’ सुन कर थोड़ा प्रकृतिस्थ हो गई थी, लेकिन यह व्यक्ति बीस बरस पहले क्लास का कौन-सा लड़का था। मैं ‘लोकेट’ नहीं कर पा रही थी। कॉफी आई तो वह भी साथ में आकर बैठ गया। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था कि इससे क्या बात करूं। वह कार्यक्रम, एनजीओ और आयोजकों के बारे में बताता रहा, मैं हूं हां भी करती रही, लेकिन मैंने उसकी किसी भी बात का शायद ही ढंग से उत्तर दिया हो। उसकी बातों से साफ चापलूसी वाला भाव टपक रहा था, लेकिन सबसे ज्यादा मुझे खटक रहा था उसकी यह जताने की कोशिश कि उसने ही कार्यक्रम के लिए मेरा नाम सुझाया था।

वह आयोजकों में से किसी को बुला लाया- ‘देखिए कनुप्रिया जी को किसी और कार्यक्रम में भी जाना है, इसलिए सबसे पहले यही अपना वक्तव्य देंगी।’ मैं उसकी तरफ देखती रह गई- हद तो तब हो गई जब उसने कहा कि तुम्हारे भाषण के बाद यहां से कहीं कॉफी पीने चलेंगे। यह तो हद से भी आगे बढ़ा जा रहा है, ‘नहीं मुझे सीधे घर जाना है’, मेरे मुंह से कदम निकल गया। कॉफी पीने चलने के लिए कहते समय उसके चेहरे का जो भाव था, उसने मुझे इतना पेरशान कर दिया था कि मुझे लगा कि मैं अभी कार्यक्रम छोड़ कर चली जाऊं। उसका साथ चल कर कॉफी पीने को कहना न जाने क्यों बहुत क्षुद्र और टुच्चा लगा था। अगर उस कार्यक्रम और अपने चारों तरफ इतने लोगों के होने की परवाह न होती, तो उसी समय उसके साथ कॉफी पीने का ऐसा मतलब समझाती कि फिर वह कभी किसी को कम से कम कॉफी पीने चलने के लिए कहने से पहले सौ बार सोचता। मैं खून का घूंट पीकर रह गई।
मैंने सबसे बाद में बोलना तय किया था। उस दिन कुछ ऐसा हुआ कि मैं वह सब कुछ बिल्कुल नहीं बोली, जो सोचा था, जिसकी तैयारी की थी। सामने आलोक बैठा था और मैं बोले जा रही थी- कमजोर हम कहां हैं, कमजोर तो वे हैं, जिन्होंने हमें कमजोर मानने की गलतफहमी पाल रखी है। अपने को बहुत ताकतवर मानने वालों की सारी ताकत हमारे एक बार बात कर लेने पर न जाने कहां बिला जाती है, सख्त चट्टान का दम भरने वाले मोम ही नहीं हो जाते- बिल्कुल पानी हो जाते हैं। जिनका अपना कोई निश्चित आकार भी नहीं होता, जिस पात्र में डालो वैसे ही हो जाते हैं, इतने तरल कि उनको मनमर्जी से जो चाहे ‘शेप’ दे दो, ये बेचारे वैसे ही ढल जाने को मजबूर हैं।… पता नहीं ऐसा ही क्या-क्या मैं बोल गई थी। बोलने से पहले जितने आवेश में थी, मुझे लगा कि बोलने के बाद चेहरे पर अगर कोई भाव था तो वह औरतों को अबला मानने वालों के प्रति केवल दया का भाव था। मैंने सोचा था कि कार्यक्रम खत्म होते ही सीधे घर भागूंगी, लेकिन पता नहीं क्यों ड्राइवर को खान मार्केट चलने को कह दिया। आज अकेले, बिल्कुल अकेले बरिस्ता में कॉफी पीऊंगी। घर फोन करने के लिए पर्स से फोन निकाला तो आलोक की मिस्ड कॉल थी। नंबर डिलीट करने के लिए आॅप्शन पर गई, तो लगा कि कमजोर लोगों को ‘बुक’ में रहने ही देना चाहिए, इनसे ही तो अपने ताकतवर होने का अहसास होता है। ०

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