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संपादकीयः विवाद की नहर

सतलुज यमुना संपर्क नहर लंबे समय से पंजाब और हरियाणा के बीच तीखे विवाद का विषय रही है। यह नहर दोनों राज्यों के बीच दिसंबर 1981 में हुए जल समझौते की देन है।
Author November 12, 2016 03:03 am
सरयू-यमुना संपर्क (एसवाइएल) ।

सतलुज यमुना संपर्क नहर लंबे समय से पंजाब और हरियाणा के बीच तीखे विवाद का विषय रही है। यह नहर दोनों राज्यों के बीच दिसंबर 1981 में हुए जल समझौते की देन है। लेकिन पंजाब की अनिच्छा के कारण नहर का निर्माण-कार्य अधर में रहा है। आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की कोशिशें नाकाम हो गर्इं तो मामला अदालत में गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी पंजाब ने आनाकानी में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस मामले में, पंजाब में किसी भी पार्टी की सरकार रही हो, सबका रवैया एक जैसा रहा है, क्योंकि कोई भी पार्टी यह जोखिम मोल लेना नहीं चाहती कि वह पंजाब के हितों पर समझौता करती नजर आए। लिहाजा, सतलुज-यमुना संपर्क नहर का मामला एक बहुत भावनात्मक मुद््दा तथा राजनीतिक दलों के लिए एक दूसरे से बढ़त बनाने का खेल हो गया है। ऐसे में राजनीतिक आम सहमति से समाधान ढूंढ़ना बहुत पहले करीब-करीब असंभव हो गया था। पर समस्या यह है कि अदालत के फैसले को भी सहजता से स्वीकार करने के लिए पंजाब की पार्टियां राजी नहीं हैं।

 

 
वर्ष 2004 में कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार द्वारा बनाए गए कानून को सर्वोच्च अदालत ने असंवैधानिक ठहरा दिया है। इस कानून के जरिए पंजाब की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 1981 के जल बंटवारा समझौते को रद््द करने की कोशिश की थी। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि समझौते को एकपक्षीय तरीके से समाप्त नहीं किया जा सकता। इस तरह अदालत ने अपने पिछले फैसलों को ही दोहराया है। जनवरी 2002 में अदालत ने पंजाब को एसवाइएल का निर्माण पूरा करने का निर्देश दिया था। इसके खिलाफ पंजाब की अपील भी अदालत ने खारिज कर दी थी। 2004 में पंजाब ने समझौता निरस्तीकरण अधिनियम बना कर तमाम जल समझौते रद््द करने की घोषणा की। मामला राष्ट्रपति के पास गया। राष्ट्रपति ने इस पर सुप्रीम कोर्ट की राय मांगी थी। इसी प्रक्रिया के तहत सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने ताजा फैसला सुनाया है, राय मांगे जाने के बारह साल बाद। इसके सिवा सर्वोच्च अदालत का कोई दूसरा फैसला नहीं हो सकता था, क्योंकि वैसी सूरत में फैसला जल समझौते के खिलाफ तो होता ही, खुद अदालत के अपने पूर्व के आदेशों से उलट होता। बहरहाल, अदालत का ताजा निर्णय आते ही एक बार फिर पंजाब की राजनीति गरमा गई है। फिर, इस बार तो विधानसभा चुनाव भी नजदीक हैं।

फैसले से नाराज कैप्टन अमरिंदर सिंह ने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने का एलान कर दिया। फिर उन्हीं की तर्ज पर राज्य के कांग्रेसी विधायकों ने अपनी विधायकी छोड़ने की घोषणा कर दी। जाहिर है, यह ‘त्याग’ खासकर विधानसभा चुनाव के मद््देनजर बढ़त लेने की कोशिश की है। इस होड़ में पीछे न रहने की मंशा जताते हुए अकाली नेताओं ने कहा है कि वे पंजाब से एक बूंद पानी नहीं ले जाने देंगे। जब अमरिंदर सरकार ने जल समझौता रद््द करने का इकतरफा कानून बनाया था, तब पंजाब के साथ ही हरियाणा में भी कांग्रेस की सरकार थी, और केंद्र में भी। फिर भी, दोनों राज्य आमने-सामने हो गए थे, और केंद्र मूकदर्शक रहा था। इस बार फिर वैसी ही हालत है, जब पंजाब की सरकार में भाजपा साझेदार है और हरियाणा तथा केंद्र में भी उसी की सरकार है। पंजाब के तमाम राजनीतिक इस बात का रोना रोते हैं कि उनका राज्य खुद पानी की कमी से जूझ रहा है। लेकिन अच्छा होगा कि वे हायतौबा मचाने के बदले जल प्रदूषण रोकने तथा भूजल को बचाने पर जोर दें। इससे पंजाब का कहीं ज्यादा भला होगा।

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  1. प्रकाश सुथार
    Nov 11, 2016 at 10:29 pm
    Poor politics has always been doing by our fool and foul so-called Leaders. They always work anything for their mean.
    (0)(0)
    Reply
    सबरंग