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रविवारीः आठवां फेरा

एक ओर लोग इंटरनेट की विभिन्न वेबसाइटों की सहायता से यह जानकारी निकालते रहे हैं कि भ्रूण के लिंग की जानकारी कैसे हासिल की जाए तो दूसरी ओर कन्या भ्रूण हत्या के धंधे में संलिप्त लोग अपने लालच के लिए सस्ती अल्ट्रासाउंड तकनीकों और मशीनों को विदेशों से हासिल करते रहे हैं। इसमें भी इंटरनेट उनकी मदद करता रहा है। सिर्फ इंटरनेट ही नहीं, अल्ट्रासाउंड मशीनों की आसान पहुंच ने भी देश में लाखों लड़कियों की गर्भ में ही बलि ली है। पर समाज इससे बेपरवाह रहा है।
Author December 4, 2016 00:22 am

इंटरनेट और मोबाइल जैसी नई तकनीकी और सोशल मीडिया जैसे साइबर मंच एक तरफ हमारे जीवन को आसान और सुगम बना रहे हैं तो दूसरी तरफ इनके दुरुपयोग का दायरा भी बढ़ता जा रहा है। भ्रूण परीक्षण को भले ही भारत में गैरकानूनी दर्जा दिया जा चुका है, मगर नई तकनीक कई तरह के चोर दरवाजे खोल रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस दिशा में कड़े कदम उठाने के निर्देश भारत सरकार को दिए हैं। इस बारे में बता रही हैं मनीषा सिंह।

भारतीय महिला पहलवान गीता फोगाट ने हाल में अपनी शादी में सात की जगह आठ फेरे लिए। यह आठवां फेरा उन्होंने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के संकल्प के तहत लिया। इससे उन्होंने समाज में बिगड़ते लिंगानुपात के प्रति अपनी चिंता जाहिर की। यह आठवां फेरा एक प्रतीकात्मक पहल है। अगर इसका असर तकनीक के क्षेत्र में भी हो सके तो यह एक और श्रेष्ठ पहल होगी। बेटी बचाओ के इस संकल्प में हमारे आम समाज को भी सहयोग करना चाहिए। असल में, देखने में आ रहा है कि समाज कन्या भ्रूण हत्या के मकसद से आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर रहा है। वैसे तो ऐसे मामलों में विज्ञान और तकनीक को कठघरे में लाना उचित नहीं प्रतीत होता है, क्योंकि उनका आविष्कार तो असल में मानवता की बेहतरी के लिए हुआ है। लेकिन जैसे-जैसे तकनीक आगे बढ़ रही है, पता चल रहा है कि उसका ज्यादा इस्तेमाल कुछ नकारात्मक चीजों के लिए हो रहा है। जैसे इंटरनेट से हमारा जीवन कई मामलों में आसान हुआ है पर इसका एक पक्ष यह है कि कई बार यह गलत कार्यों में भी सहायक हो रहा है। इंटरनेट पर तमाम भ्रूण लिंग परीक्षण का विज्ञापन कर रहे हैं। इसी चिंता से रूबरू होते हुए हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और याहू आदि सर्च इंजनों को निर्देश किया कि वे भ्रूण परीक्षण से जुड़ी सूचनाओं और विज्ञापनों को हटा लें।
यह एक विडंबना ही है कि हमारे देश में भ्रूण परीक्षण पर कानूनन प्रतिबंध होने के बावजूद उसके कई चोर रास्ते लोगों ने तलाश लिए हैं। एक ओर लोग इंटरनेट की विभिन्न वेबसाइटों की सहायता से यह जानकारी निकालते रहे हैं कि भ्रूण के लिंग की जानकारी कैसे हासिल की जाए तो दूसरी ओर कन्या भ्रूण हत्या के धंधे में संलिप्त लोग अपने लालच के लिए सस्ती अल्ट्रासाउंड तकनीकों और मशीनों को विदेशों से हासिल करते रहे हैं। इसमें भी इंटरनेट उनकी मदद करता रहा है। सिर्फ इंटरनेट ही नहीं, अल्ट्रासाउंड मशीनों की आसान पहुंच ने भी देश में लाखों लड़कियों की गर्भ में ही बलि ली है। पर समाज इससे बेपरवाह रहा है। इसमें ज्यादा बड़ी समस्या तब पैदा हुई, जब लोगों को इंटरनेट और सोशल मीडिया की मदद भी मिलने लगी। दरअसल, समाज में लड़का और लड़की के बीच भेदभावपूर्ण मानसिकता के चलते इस कारोबार को बढ़ावा मिल रहा था। प्रसव-पूर्व परीक्षण से पता चल जाता है कि शिशु कन्या है तो महिलाओं को गर्भपात के लिए मजबूर किया जाता है। इसी का नतीजा है कि देश के कई राज्यों में लड़के और लड़कियों का अनुपात लगातार बिगड़ता गया है। इससे प्रतीत होता की तकनीक का इस्तेमाल भी आखिरकार स्त्रियों के विरोध में जा रहा है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि सेरोगेसी की तकनीक और अल्ट्रासाउंड मशीनों ने लोगों को वह सुविधा दे दी है कि अपने बच्चे के लिंग का चयन कर सकें, उसके लिंग का पता लगा सकें और अगर वह बेटी है तो उसे गर्भ में ही मारने के प्रबंध कर सकें। हो सकता है कि भविष्य में डीएनए तकनीकों के सहारे लोग अपनी इस सोच के मुताबिक कि उन्हें बेटा ही चाहिए, गर्भ में ही बच्चे को डिजाइन भी करा लें। लेकिन गर्भ की स्थिति और विकृतियों का पता लगाने के मकसद से इंटरनेट से लेकर अल्ट्रासाउंड मशीनों के जैसे-जैसे इस्तेमाल हो रहे हैं, उनके बारे में तो शायद इनके आविष्कर्ताओं ने भी नहीं सोचा होगा। अल्ट्रासाउंड के अलावा मोबाइल और इंटरनेट रूपी जिन तकनीकों का हाल के वर्षों में प्रयोग बढ़ा है, वे भी ऐसा लगता है कि हमारे पितृसत्तात्मक समाज के दबाव में हैं। मोबाइल, रेडियो-टीवी, इंटरनेट यानी सोशल मीडिया व्हाट्सएप जैसे मंचों से लेकर अल्ट्रासाउंड मशीनों तक के आविष्कार में कहीं यह उल्लिखित नहीं रहा है कि उन्हें सिर्फ स्त्री के विरोध में इस्तेमाल किया जाएगा। हमारे देश में ये सब के सब स्त्रियों के खिलाफ कुचक्र रचते नजर आते हैं। अल्ट्रासाउंड मशीनें इसलिए बनीं कि अजन्मे शिशु की विकृतियों की गर्भ में जांच हो सके ताकि समय पर इलाज कर उन्हें दूर किया जाए, पर तकरीबन पूरे देश में वे कन्या भ्रूण हत्या के घृणित काम में सहायक बन गर्इं। सरकार ने देश में कन्या भ्रूण हत्या के बढ़ते मामलों को देखते हुए लिंग परीक्षण को अपराध घोषित कर रखा है, लेकिन अल्ट्रासाउंड जांच करने वाले क्लीनिकों ने गर्भ की विकृतियों की जांच की आड़ में चोरी-छिपे यह सच जानने और बताने का काम अब तक जारी रखा है। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। कहा गया कि मोबाइल हाथ में आने से स्त्री सशक्तीकरण में तेजी आएगी, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित होगी, लेकिन जब उसमें कैमरे लगे तो वे लड़कियों के फोटो लेने और कुछ वहशियों के हाथों मे पहुंचकर ब्लैकमेलिंग का औजार बन गए।
इंटरनेट पर तो इसके और भी बुरे पहलू दिखाई दे रहे हैं। वहां साइबर बुलिंग जैसी परेशानी खड़ी हो गई है जिसमें डराने-धमकाने या आॅनलाइन दुर्व्यवहार, गंदी या
अश्लील भाषा का इस्तेमालए तस्वीरों या धमकियों से स्त्रियों और बच्चों को तंग करने की कोशिश हो रही है। साइबर बुलिंग भारत के संदर्भ में अब कितनी बड़ी चुनौती बन गई है, इसकी पुष्टि कंप्यूटर सॉफ्टवेयर कंपनी-माइक्रोसॉफ्ट के एक सर्वेक्षण से होती है। माइक्रोसॉफ्ट के अनुसार भारत में पचास फीसद से ज्यादा बच्चे, ज्यादातर लड़कियां इंटरनेट पर साइबर बुलिंग की शिकार होती हैं और अधिकतर मामलों में उन्हें मालूम नहीं होता कि इसका सामना कैसे किया जाए। इन घटनाओं के फलस्वरूप वे अवसाद, अकेलापन जैसी समस्याओं की चपेट में आ रही हैं और कई मामलों में तो नौबत आत्महत्या तक की आ जाती है।
वैसे कहने को तो हमारी सरकार पिछले लंबे समय से स्त्री पक्षधरता का रुख बनाए हुए है। जहां तक संभव हो पा रहा है, सरकार, पुलिस प्रशासन और कानून के स्तर पर वे सारे उपाय कर रही हैं, जिससे महिलाओं की तरक्की, सम्मान और सुरक्षा तय हो सके। लेकिन जब मसला तकनीक के ऐसे इस्तेमाल की आती है जिसमें उनका दुरुपयोग बाधित होता हो और यह सुनिश्चित होता हो कि वे सारी तकनीकें स्त्री सुरक्षा-सम्मान आदि में ही सहायक साबित हों न कि उन्हें प्रताड़ित करने में, तो सरकार इस मोर्चे पर विवश नजर आती है। इसका एक उदाहरण पिछले साल भी मिला था। एक समाजसेवी साबू मैथ्यू जॉर्ज ने सुप्रीम कोर्ट में यह जनहित याचिका दी थी कि सरकार इंटरनेट पर लिंग परीक्षण से संबंधित किट्स व टूल्स मुहैया कराने और उनके क्लीनिकों के विज्ञापनों पर रोक क्यों नहीं लगा रही है, जबकि देश में लिंग परीक्षण करना गैरकानूनी है।

इस मामले पर सरकार को दिए नोटिस का जो जवाब कोर्ट को मिला था, उसके मुताबिक सरकार के सूचना तकनीक विभाग ने इनसे संबंधित वेबसाइटों और इंटरनेट पर मौजूद इनके विज्ञापनों पर यह कहते हुए रोक लगाने से इनकार कर दिया था कि तकनीकी तौर पर उनके हाथ बंधे हैं। वजह यह है कि लिंग परीक्षण भले ही भारत में अवैध काम हो, लेकिन यह दूसरे देशों में अपराध नहीं है। इसके अलावा वेबसाइटों पर इनसे संबंधित जो जानकारियां होती हैं, वे दुनिया भर के लोगों को ध्यान में रखकर पेश की जाती हैं। साथ ही, ऐसी वेबसाइटें देश के बाहर से संचालित होती हैं।
यह लाचारगी तकनीक के दूसरे सभी मामलों में नजर आ सकती है क्योंकि उन सभी तकनीकों के इस्तेमाल के कई सार्थक पहलू भी हैं और उन्हें सिर्फ स्त्री के विरोध या उसे नुकसान पहुंचाने के इरादे से नहीं बनाया गया है। पर जरूरी हो तो ऐसी चीजों पर कोई रोक कैसे लगती है, पड़ोसी देश चीन इसके कई उदाहरण पेश कर चुका है। वह जब-तब सर्च इंजन गूगल का अपने यहां संचालन रोक देता है, उससे बेहतर सर्च इंजन पेश कर देता है या फिर उन्हें अपने देश की जरूरतों और कानूनों के दायरे में रहकर काम करने को मजबूर कर देता है। हमारी सरकार स्त्री पक्षधरता की अपनी मंशा को और ठोस स्वरूप देते हुए वैसे ही काम नहीं कर सकती, जैसे चीन करता है। लेकिन यह सिर्फ कानून और सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता है। कानून बन जाना और उसे अमल में लाना एक बात है, यह जरूरी भी है। पर इससे ज्यादा जरूरी यह है कि बेटी के जन्म के विरोध से लेकर उसे पुरुष के शासन में चलने को मजबूर करने की जो सड़ीगली परंपरा हमारे समाज में व्याप्त है, उस पर भी प्रभावी रोक लगे। यह भी तय किया जाए कि अगर कहीं लड़कियां अपने ऊपर हो रहे अन्याय, छेड़छाड़ या शोषण का विरोध कर रही हैं और उन्हें प्रकाश में ला रही हैं तो धीरज के साथ उनकी बात सुनी जाए। यह नहीं कि जिन तकनीकों का इस्तेमाल उन्होंने अपने साथ हुए जुल्म को सामने लाने में किया है, दोगुनी ताकत से उन्हीं के प्रयोग से स्त्री को कुचल दिया जाए। हमारे समाज की यही मानसिकता तकनीकों को भी कठघरे में ला रही है और इसी वजह से उनके इस्तेमाल की सजग नीति बनाने की मांग कर रही है। समाजशास्त्रियों को इस पर अवश्य विचार करना चाहिए कि आखिर नई तकनीकें कैसे स्त्री का वास्तविक पक्ष उजागर कर सकती हैं और कैसे न्याय और तरक्की में उनका साथ दे सकती हैं। ०

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