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दुर्दिन में चाय बागान

हैरानी का विषय यह है कि जिस उत्तराखंड हिमालय से अंग्रेजों ने चाय उद्योग की शुरुआत की थी और जिसकी चाय के दीवाने दुनिया भर में थे, वहां की चाय का प्रमुख उत्पादकों में कहीं नाम नहीं है।
Author February 14, 2016 02:42 am
गोरखताल में एक चाय बागान

जयसिंह रावत

गुणवत्ता के लिहाज से श्रेष्ठ होते हुए भी उत्तराखंड के पौने दो शताब्दी पुराने ऐतिहासिक चाय बागान मरणासन्न हैं। देहरादून के बागानों सहित भीमताल, कौसानी, इनागिरी, बेरीनाग, रानीखेत, ग्वालदम और भवाली आदि के जंगलों में चाय के पौधे खरपतवार की तरह खड़े नजर आते हैं। इन बचे-खुचे चाय बागानों के मालिकों को चाय की बजाय जमीन बेचने में ज्यादा मुनाफा नजर आ रहा है। लेकिन टी-प्लांटेशन एक्ट की वजह से बागान मालिक न तो इन्हें बेच पा रहे हैं और न ही इनका सही रखरखाव कर रहे हैं। बागानों के प्रति मालिकों की अनिच्छा को देखते हुए भूमाफिया भी सक्रिय हो रहे हैं। दूसरे राज्यों में चाय बागानों की स्थिति इसलिए अच्छी है, क्योंकि वहां इसे पर्यटन से जोड़ दिया गया है। साथ में उसका प्रचार-प्रसार भी ठीक से हो रहा है।

दक्षिण भारत में नीलगिरी की पहाड़ियों का चाय बागानों बड़े पैमाने पर पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। ब्रिकी के आधुनिक तरीके अपना कर वहां की चाय देश विदेश में धूम मचा रही है। कोन्नूर से लेकर डोडाबेटा और ऊटी तक ‘टी-पार्कों’ में देशी- विदेशी पर्यटकों का हुजूम देखा जा सकता है। दरअसल, वहां का पर्यटन विभाग ही वहां की चाय का विपणन भी कर रहा है। नीलगिरी की तरह, असम के मनास राष्ट्रीय पार्क में प्रवेश द्वार पर ही ‘आपका स्वागत चाय बागान करता है’ की इबारत दिख जाएगी। हर जगह चाय बागान और पर्यटन एक दूसरे के पूरक नजर आते हैं। इन चाय बागानों में फिल्मों की शूटिंग भी खूब होती है। जबकि उत्तराखंड के बागानों से रौनक गायब हुए अर्सा बीत चुका है और अब इनमें वीरानगी छाई रहती है।

मालिकों के लिए बोझ साबित हो रहे इन बागानों पर केंद्र और राज्य सरकार की नजरें भी टिकी हैं। इससे पहले देहरादून के मोहकमपुर में केंद्र सरकार ने चाय बागान की जमीन अधिग्रहीत कर उसमें भारतीय पेट्रोलियम संस्थान का विशाल भवन और संस्थान के कर्मचारियों की कालोनी बनाई थी। उसके बाद देहरादून टी-गार्डन की 256 एकड़ जमीन 1981 में भारतीय सैन्य अकादमी के हवाले कर दी गई। इस मामले में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार भी कहां पीछे रहने वाली थी? उसने बंजारावाला टी-एस्टेट को टिहरी बांध विस्थापितों के लिए अधिग्रहीत कर लिया। देहरादून की गोरखपुर टी-एस्टेट की जमीन पर पर डिफेंस कालोनी की इमारतें उग आर्इं।

इसी तरह कुमाऊं के बेरीनाग चाय बागान की कारखाने की जगह एक आवासीय कालोनी बनी। अब बेरीनाग टी-कंपनी ध्वस्त हो चुकी है और चौकोड़ी बागान में चाय के पुराने पौधों से ही थोड़ी मात्रा में चाय का उत्पादन होता है। देहरादून की ताजा आबोहवा तो पहले से ही देश-विदेश के लोगों को आकर्षित करती रही है, लेकिन 2000 में यहां राजधानी बनने के बाद जमीनों के भाव आसमान छूने लगे हैं और इस स्थिति में सबकी निगाह इन बागानों पर टिकी हुई है। ये बागान, जो कभी आबादी से काफी दूर होते थे, आज आबादी से घिरे हुए हैं। कहीं-कहीं तो आबादी और सरकारी संस्थान बागानों के अंदर ही दाखिल हो गए हैं। इनमें कई बागानों का अस्तित्व बस राजस्व दस्तावेजों में ही सीमित होकर रह गया है।

1863-64 में आई डेनियल की पहली भूबंदोबस्त रिपोर्ट के अनुसार उस समय देहरादून में 1700 एकड़ में चाय बागान थे। जीआरसी विलियम्स के ‘मेम्वॉयर आॅफ दून’ में विवरण के अनुसार 1870 तक देहरादून जिले में आर्केडिया, हरबंशवाला, एनफील्ड, बंजारावाला, लखनवाला, कॉलागढ़, गुडरिच, न्यू गुडरिच, वेस्टहोपटाउन, निरंजनपुर, अंबाड़ी, रोजविले, चार्लविले, हरभजनवाला, गढ़ी, दुरतावाला और अंबीवाला, नत्थनपुर और निरंजनपुर नाम के उन्नीस चाय बागान थे, जो कि 2024.2 एकड़ में फैले हुए थे। इन बागानों से लगभग 2.97 लाख पौंड चाय का उत्पादन होता था। उसके बाद देहरादून के चाय बागानों की सख्या तिहत्तर तक पहुंच गई थी, लेकिन आजादी के बाद चाय उद्योग के पतन की शुरुआत हुई। 1951 तक यहां के बागानों की संख्या घट कर पैंतालीस रह गई। आज एक दर्जन बागान भी मौजूद नहीं हैं और जो हैं भी वे मरणासन्न हैं।

एक जमाना था जब देहरादून की चाय की महक ब्रिटेन तक पहुंचती थी। इसीलिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने असम के बाद उत्तराखंड को चाय बागान के लिए चुना था। असम के बारे में कहा जाता है कि वहां सिंगपो लोग प्राचीन काल से चाय निष्कर्षण या बनाने का काम करते थे। वहां अहोम राजाओं के शासनकाल से जंगली चाय के पौधों से पेय बनता था। 1826 की यांडबू संधि के बाद अंग्रेजों ने चाय बागान अपने हाथ में ले लिए। 1823 में राबर्ट ब्रूस ने वहां के जंगली चाय के पौधों को चीनी चाय की नस्ल के ही पौधे माना था। इन पौधों की वकालत पहले भारतीय चाय बागवान मनीराम दीवान ने अंग्रेजों से की थी। उसी दौरान सहारनपुर बॉटेनिकल गार्डन के अधीक्षक रॉयले की पहल पर उत्तराखंड में भी चाय बागान लगाने की संभावनाएं तलाशी गर्इं।

दस्तावेजों के अनुसार जब 1831 में गर्वनर जनरल लॉर्ड बेंटिक सहारनपुर पहुंचा तो उससे भी रॉयले ने यही सिफारिश की। रॉयले ने 1833 में अपनी पुस्तक ‘बॉटनी आॅफ हिमालयन माउंटेंस’ की भूमिका में भी इसकी चर्चा की है। रॉयले ने 1834 में देहरादून के राजपुर और मसूरी के बीच झड़ीपानी क्षेत्र को चाय बागन लगाने के लिए उपयुक्त बताया था। लॉर्ड बेंटिक ने कोर्ट आॅफ डाइरेक्टर्स की संस्तुति पर भारत में चाय उद्योग की संभावनाओं और विस्तृत योजना तैयार करने के लिए एक समिति का गठन कर लिया। इस समिति ने भी हिमालय के बाहरी क्षेत्र की पहाड़ियों और घाटियों में पाई जाने वाले जंगली पौधों को चीनी चाय के पौधों की ही नस्ल का बताया। इस समिति की सिफारिश पर 1835 में बोहियो चाय के पौधों के बीजों से पैदा नई पौध को अनुकूल जिलों में वितरित किया गया।

जब उत्तराखंड हिमालय को भी असम के साथ ही चाय बागान लगाने के लिए उपयुक्त पाया गया तो रॉयले के उत्तराधिकारी फाल्कोनर ने प्रयोग के तौर पर ब्रिटिश गढ़वाल जिले को चाय बागान लगाने के लिए चुना। 1844 में देहरादून कस्बे के निकट कौलागढ़, जो कि आज देहरादून शहर का ही एक हिस्सा है, में चार सौ एकड़ जमीन पर असम के बाहर पहला चाय बागन लगाने का काम शुरू हुआ। ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन में जब देहरादून में चाय उद्योग जम गया तो कौलागढ़ वाला पहला चाय बागान सरमौर के राजा को बेच दिया गया। उस समय जेम्सन का अनुमान था कि देहरादून जिले में एक लाख एकड़ में चाय बागान लगा कर एक करोड़ पौंड चाय का उत्पादन किया जा सकता है।
आज चीन के बाद भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है।

भारत के सोलह राज्यों में चाय के बागान हैं। इनमें से भी असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में देश का 95 प्रतिशत चाय उत्पादन होता है। हैरानी का विषय यह है कि जिस उत्तराखंड हिमालय से अंग्रेजों ने चाय उद्योग की शुरुआत की थी और जिसकी चाय के दीवाने दुनिया भर में थे, वहां की चाय का प्रमुख उत्पादकों में कहीं नाम नहीं है। उत्तराखंड के चाय विकास बोर्ड ने इस क्षेत्र में नई शुरुआत तो की है मगर उसकी पहल में उत्साह और संकल्प का घोर अभाव नजर आ रहा है। राज्य सरकार के बोर्ड ने प्रदेश के तेरह में से आठ पहाड़ी जिलों में कुल 676 हेक्टेअर क्षेत्र में बागान लगाए, जिसमें से पिछले साल 18,683 किलोग्राम चाय का उत्पादन हुआ। बिक्री मामले में भी चाय बोर्ड फिसड्डी ही साबित हुआ। वह कुल उत्पादित चाय का लगभग पांचवां हिस्सा यानी कि 3500 किलोग्राम ही बेच पाया। इसके अलावा उसके पास पिछले साल की 6,196 किलोग्राम चाय बची हुई थी। चाय बागानों की चार्य की यह बर्बादी भी इसके पतन का कारण बन रही है। अगर समय रहते इन बागानों के बारे में नहीं सोचा गया तो यह जल्द ही इतिहास की चीज हो जाएंगे।

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