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संपादकीयः पार्टी और परिवार

उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के भीतर छह महीने पहले शुरू हुई अंदरूनी खींचतान नित नए रंग बदल रही है। पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने अपने चचेरे भाई रामगोपाल यादव का निष्कासन रद्द कर दिया है।
Author November 19, 2016 02:05 am

उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के भीतर छह महीने पहले शुरू हुई अंदरूनी खींचतान नित नए रंग बदल रही है। पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने अपने चचेरे भाई रामगोपाल यादव का निष्कासन रद्द कर दिया है। उन्हें पिछले 24 अक्तूबर को भाजपा से सांठगांठ करने और अनुशासनहीनता के आरोप में बाहर का दरवाजा दिखा दिया गया था। रामगोपाल उस वक्त राज्यसभा में सपा के नेता, पार्टी प्रवक्ता और राष्ट्रीय महासचिव थे। अब वे फिर से सभी पदों पर बहाल कर दिए गए हैं। सोमवार को रामगोपाल यादव इटावा में एक प्रेस-कॉन्फ्रेंस के दौरान यह कह कर फूट-फूट कर रोने लगे थे कि वे अपने को अब भी सपा का हिस्सा मानते हैं। उन्होंने निकाले गए सभी नेताओं को वापस लेने की मांग की थी और कहा था कि उन्हें अवैधानिक तरीके से निकाला गया है। मुलायम सिंह यादव ने तब रामगोपाल के बयानों को बेमतलब करार दिया था। अब अगर तीन दिन के भीतर ही सपा मुखिया ने उन्हें फिर से पार्टी में शामिल कर लिया है तो इसके पीछे का कुछ गणित समझा जा सकता है।

मुलायम सिंह की समस्या यह है कि वे अक्सर यह भूल जाते हैं कि अपने परिवार के मुखिया हैं या सरकार के या फिर पार्टी के या फिर तीनों के। इस वजह से वे अक्सर घालमेल करते हैं। रामगोपाल शुरू से ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खेमे के माने जाते रहे हैं और अब भी वे खुलकर आगामी चुनाव में उन्हें मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश करने की मांग कर रहे हैं। इस बात के पूरे इमकान हैं कि रामगोपाल की वापसी के लिए अखिलेश यादव ने जोर लगाया हो और उनकी बात की अनसुनी करना कठिन हो गया हो। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश के आसन्न विधानसभा चुनाव ने भी सपा मुखिया को मजबूर किया होगा कि पार्टी में कोई दरार न पड़े, न दिखे। लेकिन सवाल है कि जून से ही सपा के भीतर जो नई-नई पैंतरेबाजी और खदेड़ने-पकड़ने का खेल महीनों से चलता रहा है, क्या उससे पार्टी की छवि को बट्टा नहीं लगा है? यह सवाल ज्यादा पैनेपन के साथ उभर रहा है, क्योंकि राज्य में बसपा और भाजपा जैसे प्रतिद्वंद्वी दल अपनी तैयारी को लेकर सतर्क हैं। वास्तव में, पार्टी के भीतर एक ही परिवार के इतने सदस्यों की मौजूदगी और उन सब का शीर्ष पदों पर होना कलह का बड़ा कारण हो गया है। वे अक्सर किसी लोकतांत्रिक संगठन या चुने हुए प्रतिनिधि की तरह नहीं, बल्कि इस तरह व्यवहार करते हैं मानो किसी राजकुल के हों और राज्य उनकी जागीर हो।

यह तमाशा पिछले जून में तब शुरू हुआ, जब मुलायम सिंह के भाई शिवपाल यादव ने बाहुबली और जेल में बंद विधायक मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के विलय को हरी झंडी दे दी। लेकिन इसके फौरन बाद ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दबाव में उस फैसले को वापस लेना पड़ा। तब से लेकर अब तक निकालने और शामिल करने का ऐसा नाटक चल रहा है कि याद रखना मुश्किल है कि किसने किसको निकाला और किसने किसको शामिल किया। इस बीच, शिवपाल ने एक बार फिर यह घोषणा की है कि कौमी एकता दल का विलय कर लिया गया है। लब्बोलुआब यह कि सपा अपने एक फैसले की धुंध से बाहर आती है तो उस पर दूसरी धुंध छा जाती है।

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