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दिल्ली का दर्पदलन करना होगा…

कहने, सुनने और समझने की इस कड़ी में जनसत्ता के पहले मेहमान हैं राज्यसभा सांसद व राकांपा नेता देवीप्रसाद त्रिपाठी।
Author December 4, 2016 06:37 am

किसी भी समाज और संस्कृति का सबसे अहम हिस्सा संवाद होता है। सत्ता, समाज, साहित्य और संस्कृति के विभिन्न आयामों से संवाद की छोटी सी कोशिश हमने बारादरी शृंखला से शुरू की है। कहने, सुनने और समझने की इस कड़ी में जनसत्ता के पहले मेहमान हैं राज्यसभा सांसद व राकांपा नेता देवीप्रसाद त्रिपाठी। राजनीति में साहित्य की मशाल की अगुआई करने वाले त्रिपाठी राजनीतिक दलों में आई वैचारिक गिरावट को लेकर चिंतित रहते हैं तो राजनीति में साहित्य और संस्कृति के सवालों से बढ़ती दूरी के खिलाफ खुद सबसे पहले खड़े होते हैं। बहुवचन की राजनीति के पैरोकार त्रिपाठी कहते हैं कि हाशिये पर पड़ा अंतिम आदमी जब तक सत्ता और साहित्य से नहीं जुड़ेगा तब तक लोकतंत्र बेमानी है और इसके लिए दिल्ली का दर्पदलन करना होगा।

अनिल बंसल: त्रिपाठीजी, आप लोगों ने 1999 में मुद्दा उठाया था कि विदेशी मूल का कोई व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री नहीं होना चाहिए। मगर आपमें से किसी ने कानून में, संविधान में संशोधन के लिए निजी विधेयक पेश नहीं किया कि ऐसा प्रावधान हो कि भारत में जन्म से नागरिक होने वाला व्यक्ति ही अमुक अमुक पदों पर रहे। वह पहल नहीं हो सकी।

देवीप्रसाद त्रिपाठी: वह पहल होनी चाहिए। दुनिया के तमाम देशों में ऐसे कानून हैं। भारत में भी बन सकता है, बनना चाहिए। बहुत से लोग कहते हैं कि उसकी आवश्यकता इसलिए नहीं है कि अभी उसकी संभावना नहीं है। मेरा कहना है कि संभावना तो कभी भी बन सकती है। संभावनाओं के आधार पर संविधान नहीं बनते। संविधान तो देश को चलाने का एक ढांचा है और उसको उसी दृष्टि से बनाना चाहिए।

सूर्यनाथ सिंह: राजनीति में रहते हुए साहित्य में भी आपकी लगातार रुचि बनी रही। साहित्य कैसे मदद करता है आपको राजनीति में।

देवीप्रसाद त्रिपाठी: साहित्य विचार, भाषा, भाव के स्तर पर तो मदद करता ही है, अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसलिए आप देखेंगे कि जितने भी प्रमुख सांसद हुए हैं, भारत का संविधान बनने के बाद से, उसके पहले खैर आजादी की लड़ाई को तो छोड़ ही दीजिए, वह सब आपको पता है, वे सबके सब बौद्धिक रुझान से भरे रहे। और उनकी बातचीत में, अनकी अभिव्यक्ति में साहित्य और कई में तो संगीत की बहुत गहरी पैठ रही है। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि मधु लिमये जैसे प्रखर सांसद को शास्त्रीय संगीत की बहुत गहरी समझ थी। ऐसे बहुत सारे लोग आपको भारतीय राजनीति के इतिहास में दिखेंगे।… पर हमारे यहां अभी स्थिति कई अर्थों में निराशाजनक इस रूप में है कि पहले साहित्य से, कलाओं से, बौद्धिक वर्ग से, राजनीतिक समुदाय का निरंतर संपर्क बना रहता था। भारत के कई प्रदेशों में अब भी बना हुआ है। बंगाल, केरल, कर्नाटक आदि में बना हुआ है। हिंदी प्रदेशों में स्थिति बहुत दुखद है। जहां कल्पना कीजिए कि अज्ञेय जैसा साहित्यकार के अंतिम संस्कार के समय कोई प्रमुख राजनेता था ही नहीं। डॉ कर्ण सिंह और मैं, दो व्यक्ति थे। इससे दुखद और कुछ हो सकता है! शर्मनाक। महादेवी वर्मा की मृत्यु के बाद वहां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को जबर्दस्ती भेजना पड़ा। तो हमारे क्षेत्र में, हिंदी क्षेत्र में साहित्य और राजनीति का रिश्ता करीब-करीब टूट गया है।

मनोज मिश्र: साठ और सत्तर के दशक में वैचारिक राजनीति होती थी, आज यह तय नहीं है कि कौन किस दल के साथ जाएगा, कब किस दल में क्या बदलाव होगा, आप क्या मानते हैं कि आगे आने वाले समय में विचारधारा की राजनीति ही खत्म हो जाए या फिर सिर्फ सत्ता की राजनीति होने लगे, इसे आप कितना जायज मानते हैं।

देवीप्रसाद त्रिपाठी: इस प्रवृत्ति को मैं गलत मानता हूं। विचारशून्य राजनीति संस्कारशून्य होती है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए वह जनता के हित का कोई कार्य नहीं कर सकती। आप वैचारिक दौर की बात कर रहे हैं, बंगाल में, केरल में, जहां उस तरह का वैचारिक उफान भले न बचा हो, पर साहित्य और संस्कृति के प्रति निष्ठा वहां के समाज में है। सवाल है कि समाज अपनी संस्कृति के बारे में कितना जागृत है। आज अगर मृणाल सेन कुछ बोलेंगे, या बड़ा साहित्यकार कुछ बोलेगा बंगाल में, तो कोई राजनेता या मुख्यमंत्री, चाहे जो भी हो, वह उसकी अवहेलना नहीं कर सकता। उसे उसका नोटिस लेना पड़ेगा। केरल में यही होगा, कर्नाटक में यही होगा, महाराष्ट्र के बहुत से हिस्से में यही होगा। हिंदी प्रदेश में ऐसा नहीं होता। स्वार्थ की राजनीति आई है।
हिंदी क्षेत्र की एक अजीब बात है। यहां राजनीति में वामपंथ जितना ही कमजोर है, दुर्बल है, उतना ही हिंदी साहित्य में प्रबल है। खासकर, आलोचना के क्षेत्र में, गद्य के क्षेत्र में, कविता के क्षेत्र में भी है।… एक अजीब सी स्थिति है, भारतीय साहित्य के क्षेत्र में भी जहां वामपंथ मजबूत रहा, बंगाल में, वहां भी पिछले तीन दशकों में- उसके पहले तो था- साहित्य में वामपंथी दृष्टिकोण उतना मजबूत नहीं है। मलयालम में भी नहीं है, जितना हिंदी में है, जिस क्षेत्र में वामपंथी आंदोलन बहुत कमजोर रहा है।… ऐसा क्यों है, इसका विश्लेषण करना होगा। हिंदी आलोचना खासतौर से जितनी विकसित है, मुझे नहीं लगता उतनी दूसरी भाषाओं में विकसित नहीं है। इन सबके बावजूद हिंदी अपने क्षेत्रों में कोई हिंदी चेतना विकसित नहीं कर पाई। हिंदी संस्कृति जैसी कोई चीज हिंदी क्षेत्रों में नहीं है। इसीलिए हिंदी के बड़े साहित्यकार के प्रति वह सहज सम्मान नहीं है, जो बांग्ला में, मलयालम में है।

मुकेश भारद्वाज: कांग्रेस पर सदा से यह इल्जाम रहा है कि उसने अपनी बौद्धिकता लेफ्ट के पास गिरवी रख दी है। अब एक ऐसी सरकार आई है, जिसका दावा है कि उसकी अपनी बौद्धिक शाखा है, तो एक सोचे-समझे तरीके से जो शिक्षा का भगवाकरण हो रहा है, उस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है।

देवीप्रसाद त्रिपाठी: एक विचित्र बात भारत में संभव हुई। पहली बार एक ऐसी सरकार आई है, जिसके प्रमुख दल में कोई बौद्धिक दृष्टि है ही नहीं। देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज-व्यवस्था, नारी के प्रति, दलितों के प्रति, किसी पर भी भारतीय जनता पार्टी या उसके आदि संगठन- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ- में कोई दृष्टि नहीं है। पहली बार ऐसा हुआ है, जब विचारशून्य राष्ट्रवाद की चर्चा करते हुए एक पार्टी सत्ता में आई है। अब इसमें से क्या निकल सकता है! … दुनिया भर के दक्षिणपंथ में आप देखेंगे, तो बहुत से वैचारिक मतभेद उभरे हैं, मगर भारत के दक्षिणपंथ में एक बड़े बुद्धिजीवी का नाम आप बता दीजिए, किसी बड़े साहित्यकार, बड़े पत्रकार का नाम बता दीजिए, जो दक्षिणपंथ की तरफ से आता है। दुर्भाग्य है कि भारत का दक्षिणपंथ, जो शताब्दियों के सभ्यतामूलक समाज में पैदा हुआ है, परंपरागत है, उसमें भी इस तरह का बौद्धिक वर्ग नहीं उभरा, जिसे उभरना चाहिए था। यह बहुत आश्चर्य की बात है। … तो दक्षिणपंथ का यह जो बौद्धिक दिवालियापन है, बहुत गंभीर बात है।… जो कुछ बौद्धिक संपदा भारतीय राजनीतिक समुदाय में रही है वह वामपंथ से आई है, चाहे वे साम्यवादी रहे हों या समाजवादी। यह तथ्य है, लेकिन इसी से समस्या का समाधान नहीं होता। विचार के स्तर पर भारत और समृद्ध होता, अगर दक्षिणपंथ वैचारिक रूप से और समृद्ध होता। मध्यमार्गी राजनीति और समृद्ध होती। उदारवादी राजनीति में भी चिंतन की वह परंपरा नहीं है। यह बहुत गहन चिंतन का प्रश्न है। मेरा मानना है कि जब तक प्रश्नोज्ज्वल नहीं होंगे, तब तक आप उत्तरोज्ज्वल नहीं हो सकते। महत्त्वपूर्ण प्रश्न सही उत्तर के लिए आवश्यक होता है।
जहां तक शिक्षा का प्रश्न है, यह एक सरलीकृत विकल्प है। सरलीकृत विकल्प इस तरह है कि, जैसे पाकिस्तान में पढ़ाया जाता है, भारत की ही संस्कृति पुरानी नहीं है… सब असत्य है। कोई ऐतिहासिक तथ्य उसमें है ही नहीं। उसी तरह आप पढ़ाते जाइए कि पुराने जमाने में भी जहाज चलते थे, हमारे यहां शिवाजी, राणाप्रताप हुए, वेदों में हेलीकॉप्टर भी थे, हमारा विज्ञान कितना विकसित था, ब्रह्मास्त्र था… तो यह सब दृष्टिकोण मैं कहूंगा कि दुर्लभ मूर्खता का उदाहरण है। उसी से शिक्षा का भगवाकरण आरंभ हुआ।

अरविंद शेष: विपक्ष और बौद्धिक केंद्रों से उठे सवाल राजनीतिक दलों की मार्फत जनता तक पहुंचने चाहिए, पर ऐसा नहीं हो पा रहा है। क्या राजनीतिक दल, खासकर विपक्ष की राजनीति इसमें विफल रही है। ऐसा क्यों हो पाया कि सिर्फ डेढ़-दो सालों में मानो आरएसएस का समाज बन गया और डेढ़-दो या तीन-चार दशक तक शासन करने के बावजूद दूसरे दल अपना समाज नहीं बना सके या अपनी विचारधारा का समाज नहीं गढ़ सके।

देवीप्रसाद त्रिपाठी: वैचारिक स्तर पर संप्रेषण न कर पाने की विफलता विपक्षी राजनीति को कमजोर बनाने का कारण रही है। जिस तरह विचार को जनता के बीच जाना चाहिए, जो आपने कहा, बौद्धिक बहस को नीचे ले जाना चाहिए, वह नहीं गई। इसीलिए तो यह हश्र हो रहा है। बहुत कम राजनेता हैं, जिनके माध्यम से वैचारिक बिंदुओं को ठीक से रेखांकित करके जनता तक पहुंचाया जा रहा है। लेकिन यह संभव होगा। मेरा मानना है कि राजनीति सिर्फ प्रमुख राजनीतिक दलों से नहीं आंकी जानी चाहिए। बहुत से समूह आपको इस समय छोटे-छोटे आंदोलन करते हुए, विचारों को प्रसारित करते हुए दिखेंगे, जो अलग-अलग विषयों पर महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं। आपको लगेगा कि बहुत छोटा समूह है। लेकिन वह बड़े व्यापक वर्ग में बौद्धिक चेतना और बहस को ले जा रहा है। मैं आशावादी हूं कि अंतत: यह बात राजनीतिक दलों को फिर से धारदार बनाएगी।

पारुल शर्मा: आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए जो आवाज उठती है, चाहे वह फेसबुक के माध्यम से, कार्टून के माध्यम से, और भी तरीके से। उसे फौरन उसे रोक दिया जाता है, उस पर आपका क्या कहना है?

देवीप्रसाद त्रिपाठी: आज के दौर में सबसे बड़ा खतरा असहमति के विरुद्ध सरकारी दहशतगर्दी है। यह सरकारी दहशतगर्दी सिर्फ सरकार नहीं कर रही है। सरकार से जुड़े संगठन कर रहे हैं। ये जो घटनाएं हो रही हैं, भारत में इसके पहले नहीं होती थीं। अगर हुर्इं तो व्यापक समाज ने उसकी निंदा की। और उस समय की सरकारों ने भी उसकी निंदा की। सरकारें उसका समर्थन नहीं कर सकतीं। अभी सरकार ऐसी घटनाओं पर मौन है। अभिव्यक्ति पर हमला असल में व्यक्ति की गरिमा पर हमला है। विचार की स्वतंत्रता पर हमला है।

सुमन केशव सिंह: इसी से जुड़ा सवाल कि आज हालत यह है कि जैसे ही आप सरकार के विरोध में जाते हैं तो एक तबका खड़ा हो जाता है। वह जनता की बात सामने नहीं आने देना चाहता। क्या यह सरकार द्वारा प्रायोजित होता है।

देवीप्रसाद त्रिपाठी: वह एक नीति है। उसी नीति के तहत यह सब हो रहा है कि विरोधी विचारों को, असहमति को, समाप्त करिए। लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा यही होता है। बिना असहमति के लोकतंत्र नहीं हो सकता। सहमति और असहमति लोकतांत्रिक रथ के चक्के हैं। उस असहमति को जारी रख कर ही हम इन हमलों से लड़ सकते हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में कहें तो- कुछ पाते रहे, कुछ खोते रहे, अपना रथ पै हम हांके रहे।… तो यह दृढ़ता हमें बनाए रखनी पड़ेगी।

मृणाल वल्लरी: शिक्षा के भगवाकरण से ज्यादा नुकसान 1990 के बाद शिक्षा का पूंजीकरण होने से हुआ है। शिक्षा आम आदमी से दूर होती गई है। इस खतरे को आप कैसे देखते हैं।

देवीप्रसाद त्रिपाठी: शिक्षा का निजीकरण बड़ी गंभीर समस्या है। हालांकि यह कई अर्थों में होगा ही, क्योंकि हमारी शिक्षण संस्थाओं का कई अर्थों में पतन ही नहीं, अध:पतन हुआ है। आज भारत में, दुर्भाग्य की बात है कि, कितने विश्वविद्यालय चुने जा सकते हैं, जहां पढ़ाई-लिखाई होती हो।… इसके चलते भी निजीकरण हो रहा है। पूंजीकेंद्रित शिक्षा को बढ़ावा मिला। शिक्षा का यह जो वर्ग आधारित ढांचा है, असल में यह इन सब समस्याओं के लिए जिम्मेदार है।… इस वर्गभेद को समाप्त करना जरूरी है। असल में, शिक्षा में समानता से ही समाज में समानता आती है। शिक्षा आपका मस्तिष्क बनाती है, दिमाग बनाती है, चेतना बनाती है। तो क्या वह चेतना यह शिक्षा बना रही है, जो समानता पर आधारित है। जो विवेक पर आधारित हो, जो मूल्यों पर आधारित हो, क्या वैसी शिक्षा मिल रही है। नहीं।

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