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संपादकीयः सहयोग का सफर

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के भारत दौरे में सबसे ज्यादा चर्चा बेशक बुलेट ट्रेन के शिलान्यास की हो रही हो, लेकिन दोनों देशों के बीच जिस तरह कई अन्य पहलुओं पर बातचीत और सहयोग की संभावना बनी है, उसका महत्त्व बहुत ज्यादा है।
Author September 15, 2017 02:07 am

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के भारत दौरे में सबसे ज्यादा चर्चा बेशक बुलेट ट्रेन के शिलान्यास की हो रही हो, लेकिन दोनों देशों के बीच जिस तरह कई अन्य पहलुओं पर बातचीत और सहयोग की संभावना बनी है, उसका महत्त्व बहुत ज्यादा है। खासतौर पर द्विपक्षीय संबंध, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ आतंकवाद से निपटने के मसले पर दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच भविष्य में बेहतर परस्पर सहयोग की जमीन बनी है। हाल के दिनों में अल-कायदा, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों और उनके पाकिस्तानी ठिकानों के मुद्दे पर भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह कूटनीतिक पहलकदमी की है, उसका असर भी जापानी प्रधानमंत्री के इस दौरे पर साफ देखने में आया है। गुजरात के गांधीनगर में हुई बैठक के बाद जो साझा बयान जारी हुआ, उसके मुताबिक दोनों नेताओं ने पाकिस्तान से यह मांग की कि वह 2008 के मुंबई हमले और 2016 के पठानकोट हमले के लिए जिम्मेदार आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करे। जाहिर है, पाकिस्तान के ठिकानों से काम करने वाले आतंकी संगठनों के मसले पर भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह की कूटनीतिक कामयाबी मिली है, उसमें जापान को भी इस मसले पर साथ लाना एक बड़ी उपलब्धि है।

गौरतलब है कि हाल ही में चीन में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में जारी संयुक्त घोषणा पत्र में भी भारत को लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों का नाम शामिल कराने में सफलता मिली थी। आमतौर पर व्यापार जैसे मामलों में द्विपक्षीय सहयोग के लिहाज से उपयुक्त माना जाने वाला देश जापान जिस तरह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर भारत के साथ खड़ा दिखा है, वह आने वाले दिनों में बदलती अंतरराष्ट्रीय राजनीति की झलक है। इसके अलावा, ज्यादा दिन नहीं हुए जब डोकलाम में सैनिकों की तैनाती के मसले पर भारत और चीन के बीच तनातनी की स्थिति पैदा हो गई थी। यों भी, हाल के दिनों में भारत-प्रशांत क्षेत्र में जिस तरह चीन ने आक्रामक तेवर अख्तियार किया हुआ है, उसके मद्देनजर भारत और जापान के बीच आपसी सहयोग को बढ़ावा देने पर बनी सहमति न सिर्फ दोनों देशों के बीच संबंधों के एक नए युग की शुरुआत का संकेत है, बल्कि यह चीन के प्रभाव को भी संतुलित करेगा। अब देखना है कि यह कूटनीतिक पहलकदमी आर्थिक मोर्चे पर भारत के पक्ष में जापान से और ज्यादा क्या हासिल कर पाती है।

लेकिन इस सबके बीच अगर बुलेट ट्रेन की शुरुआत की बुनियाद को अहमियत मिली है, तो यह स्वाभाविक भी है। दरअसल, लंबी दूरी की इस तेज रफ्तार ट्रेन को लेकर चर्चा काफी समय से चल रही थी। मगर इसमें लगने वाले धन और संसाधनों से लेकर तकनीक की उपलब्धता के सवाल पर बात अब तक ठहरी हुई थी। अब एक लाख दस हजार करोड़ की अनुमानित लागत से चलने वाली बुलेट ट्रेन के लिए जापान की ओर से जिस तरह नाममात्र के ब्याज पर बड़ी आर्थिक मदद मिली है, वह भारत में तकनीकी ढांचे को भी मजबूत करेगी। हालांकि इतने बड़े खर्च से भारत में बुलेट ट्रेन की शुरुआत में ऊर्जा झोंकने पर सवाल भी उठ रहे हैं। खासतौर पर ऐसे समय में जब रेल सेवाएं पटरी से उतरी हुई दिख रही हैंं, लगातार हादसों के चलते ट्रेन से सफर को जोखिम भरा माना जाने लगा है, उसमें मौजूद खामियों को दूर करने के नाम पर अगर संसाधनों और धन की कमी की दलील दी जाए और दूसरी ओर इतने बड़े खर्च से बुलेट ट्रेन की शुरुआत की जाए तो सरकार की प्राथमिकता पर सवाल उठेंगे।

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