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संपादकीयः राहत के बावजूद

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ, उनके परिवार और उनकी पार्टी ने राहत की सांस ली होगी, पर यह राहत क्या टिकाऊ साबित हो पाएगी?
Author April 22, 2017 03:51 am
नवाज शरीफ

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ, उनके परिवार और उनकी पार्टी ने राहत की सांस ली होगी, पर यह राहत क्या टिकाऊ साबित हो पाएगी? पूरे पाकिस्तान की निगाह इस पर लगी हुई थी कि पनामा पेपर्स के मामले में वहां का सर्वोच्च न्यायालय क्या फैसला सुनाता है। इस बारे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिलचस्पी कम नहीं थी, क्योंकि फैसले से नवाज शरीफ की सरकार के वजूद या भविष्य पर असर पड़ना था। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ और अन्य कई विपक्षी दलों के नेताओं ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर मांग की थी कि नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद के अयोग्य ठहराया जाए। मांग का आधार पनामा पेपर्स के जरिए हुआ खुलासा था। साल भर पहले खोजी पत्रकारों के एक अंतरराष्ट्रीय समूह ने गुप्त खातों और विदेशों में काला धन जमा करने के बारे में ढेर सारे दस्तावेज उजागर किए थे, जो कि पनामा पेपर्स कहलाए। इस खुलासे में दुनिया भर के कई दिग्गजों के नाम सामने आए। खुलासे के फलस्वरूप नवाज शरीफ, उनके दो बेटों, बेटी और दामाद पर भी काला धन सफेद करने, विदेश में गुप्त रूप से धन जमा करने और चोरी-छिपे देश से बाहर निवेश करने के आरोप लगे।

सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका तो खारिज कर दी, यानी नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद के अयोग्य ठहराने की मांग नामंजूर कर दी, पर संबंधित आरोपों की जांच के लिए एसआइटी यानी विशेष जांच दल के गठन के निर्देश दिए। साथ ही, जांच की समय-सीमा भी निर्धारित कर दी, जिसके मुताबिक एसआइटी को साठ दिनों के भीतर रिपोर्ट देनी होगी। एसआइटी में सेना के भी अफसर होंगे और नागरिक प्रशासन के भी। जाहिर है, सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से नवाज शरीफ को फौरी राहत ही मिली है। एसआइटी जो भी रिपोर्ट दे, इतना तय है कि आगे शरीफ सरकार की राह आसान नहीं होगी। पीटीआइ यानी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के नेता इमरान खान ने शरीफ से इस्तीफे की मांग की है, इस आधार पर कि वे पद पर रहेंगे तो निष्पक्ष जांच नहीं हो सकेगी। पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने तो अदालत के फैसले की निंदा करने में भी संकोच नहीं किया है। यह भी गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला तीन-दो के बहुमत से आया, यानी सुनवाई कर रहे पीठ के दो जज शरीफ को प्रधानमंत्री पद के अयोग्य ठहराना चाहते थे। फैसले से असहमति वाले इन दो जजों में एक, पीठ की अगुआई कर रहे मुख्य न्यायाधीश भी थे।

अगर एसआइटी ने शरीफ और उनके परिवार को बख्श दिया, तो विपक्ष के मौजूदा तेवर को देखते हुए, जांच को प्रभावित करने के आरोप लग सकते हैं। अगर जांच ने पनामा पेपर्स के जरिए हुए खुलासे को सही पाया तो शरीफ से इस्तीफा देने की मांग तो जोर पकड़ेगी ही, साल भर बाद होने वाले संसदीय चुनाव में उनकी पार्टी यानी पाकिस्तान मुसलिम लीग (एन) की संभावनाएं धूमिल पड़ सकती हैं। पर तब पनामा पेपर्स की गूंज पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहेगी, दुनिया के और भी कई देशों में सुनाई देगी। पनामा पेपर्स फिर से चर्चा का विषय बनेगा, कई बड़ी शख्सियतों के खिलाफ जांच की मांग उठेगी। इसलिए शरीफ के खिलाफ एसआइटी की संभावित जांच पर दुनिया भर की नजर रहेगी, जो कि स्वाभाविक है। शरीफदोषी ठहराए जाएं, या अपर्याप्त सबूतों की बिना पर बच जाएं, काले धन के पनाहगाह बने बैंकों के खिलाफ दुनिया भर में आवाज उठनी चाहिए।

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