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संपादकीयः तेल की धार

पेट्रोल और डीजल के दाम में भारी बढ़ोतरी से साफ है कि आम आदमी पर महंगाई का एक और कोड़ा पड़ेगा। पेट्रोल की कीमत अस्सी रुपए लीटर तक पहुंच गई है।
Author September 15, 2017 02:11 am
(Reuters)

पेट्रोल और डीजल के दाम में भारी बढ़ोतरी से साफ है कि आम आदमी पर महंगाई का एक और कोड़ा पड़ेगा। पेट्रोल की कीमत अस्सी रुपए लीटर तक पहुंच गई है। यह तब हुआ है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम न्यूनतम स्तर पर हैं। जुलाई 2014 में, जब मोदी सरकार सत्ता में आई, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल एक सौ बारह डॉलर प्रति बैरल था, जो अब आधे से भी नीचे यानी चौवन डॉलर प्रति बैरल पर आ चुका है। फिर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इतनी बढ़ोतरी क्यों हो रही है, यह समझ से परे है। पेट्रोलियम मंत्री ने साफ कर दिया है कि सरकार इस मामले में कुछ नहीं कर सकती, सब कुछ तेल कंपनियों के हाथ में है। उनकी इस बात से साफ है कि पेट्रोल और डीजल के दामों पर काबू पाने में सरकार ने पूरी तरह हाथ खड़े कर दिए हैं और आम आदमी को तेल कंपनियों के रहमोकरम पर छोड़ दिया है। बल्कि पेट्रोलियम मंत्री ने यह और कह दिया कि जीएसटी परिषद अब पेट्रोलियम उत्पादों को भी जीएसटी के दायरे में लाने पर विचार करे। गौरतलब है कि जीएसटी लागू होने के बाद जिन वस्तुओं के सस्ता होने की उम्मीद थी, वे अभी तक महंगी मिल रही हैं। सरकार की ओर से इसका कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है कि जीएसटी के मुताबिक बाजार में उचित मूल्य पर चीजें मिलें। ऐसे में अगर पेट्रोलियम उत्पाद जीएसटी के हवाले हो गए तो दाम तय करने की क्या व्यवस्था होगी, स्पष्ट नहीं है।

सवाल है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल फिलहाल अगर चौवन डॉलर प्रति बैरल है तो पेट्रोल अस्सी रुपए लीटर क्यों बिक रहा है। दरअसल, इसके पीछे करों का खेल है। केंद्र और राज्य अपनी जेबें भरने के लिए जम कर उत्पाद शुल्क वसूल रहे हैं। पिछले तीन सालों में ग्यारह बार उत्पाद शुल्क बढ़ाया गया। यानी डीजल पर तीन सौ अस्सी फीसद और पेट्रोल पर एक सौ बीस फीसद तक यह कर बढ़ा। इसके अलावा मूल्य वर्धित कर (वैट) की मार अलग से है। पेट्रोल पर सबसे ज्यादा उनचास फीसद वैट महाराष्ट्र में है। इस वक्त छब्बीस राज्य पेट्रोल पर पच्चीस फीसद से ज्यादा वैट वसूल रहे हैं। यह उनकी मोटी कमाई का जरिया है। यानी उत्पाद शुल्क से सरकारें अपना खजाना भरती रही हैं और मार आम आदमी झेल रहा है।

समस्या यह है कि तेल के दाम कैसे तय हों, इसकी अभी तक कोई तर्कसंगत और पारदर्शी प्रणाली नहीं बनी है। तेल कंपनियां लंबे समय से भारी घाटे का रोना रो रही थीं तो सरकार ने पिंड छुड़ाने के लिए कमान तेल कंपनियों को ही सौंप दी। इसका नतीजा यह हुआ कि अब तेल कंपनियां तो घाटे से उबर गई हैं, तब भी पेट्रोल-डीजल सस्ते नहीं हो रहे। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने ही तेल की कीमतों में बेहताशा बढ़ोतरी को मुद्दा बनाया था और उत्पाद शुल्क और वैट में वृद्धि पर रोक लगाने की मांग करते हुए नई प्रणाली पर जोर दिया था। पर अब इस पर सरकार मौन है। तेल के दाम बढ़ने का सीधा मतलब है हर क्षेत्र में महंगाई का बढ़ना और इसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ेगा। महंगाई पर काबू पाना सरकार का लक्ष्य है, पर ताजा आंकड़ों के मुताबिक वह बढ़ी है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों को इसी तरह बेलगाम बढ़ने दिया गया तो सरकार की चुनौतियां और बढ़ेंगी।

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  1. Abhishek Bharti
    Sep 16, 2017 at 5:03 am
    Manipulative editorial. GST shall help lowering the price. And deregulation was the need of the hour so implemented by UPA II. With crucial information hidden, it seems to be fanning some agenda....
    (0)(1)
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