December 03, 2016

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चौपालः सवाल और बवाल

नोटबंदी वाकई एक स्वागतयोग्य फैसला है लेकिन क्या अब जनता सरकार से कुछ वाजिब सवाल भी नहींं पूछ सकती? क्या सवाल पूछना ही सरकार को आलोचना जैसा लगने लगा है? देश में जब बारह-तेरह लाख की आबादी पर एक बैंक हो तो यह अव्यवस्था होना लाजिमी था।

Author November 18, 2016 02:13 am
पुराने हजार के नोट।

नोटबंदी वाकई एक स्वागतयोग्य फैसला है लेकिन क्या अब जनता सरकार से कुछ वाजिब सवाल भी नहींं पूछ सकती? क्या सवाल पूछना ही सरकार को आलोचना जैसा लगने लगा है? देश में जब बारह-तेरह लाख की आबादी पर एक बैंक हो तो यह अव्यवस्था होना लाजिमी था। क्या सरकार को यह मामूली तथ्य मालूम नहींं था फिर क्यों वह इस फैसले से पहले जनता के लिए पर्याप्त नकदी का इंतजाम करने में नाकाम रही? सरकार और हम सबको पता है कि बैंकों की कतार में नोट बदलवाने के लिए कौन लोग दिन-दिन भर परेशान हो रहे हैं! उनमें कुछ लोग दुखी हैं। कुछ चुपचाप अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। कुछ बैंकों की व्यवस्था ठीक न होने पर सवाल उठा रहे हैं। कुछ इसे बिना तैयारी के लिया गया फैसला बता रहे हैं। कुछ फैसले के पक्ष में हैं। यही सब है देश की आम जनता। लेकिन जैसे ही यह आम जनता अपने हालात और परेशानियां बता रही होती है, भीड़ में से राजनीतिक आवाज आती है कि यह मोदीजी का फैसला है, गलत हो ही नहींं सकता; अगर आपको इससे दिक्कत है तो आप देशहित में नहींं, निजी हित में सोच रहे हो और इस फैसले पर आप सवाल नहींं उठा सकते। देश के सैनिक सीमा पर आपके लिए खड़े हैं, आप देश के लिए कतार में भी खड़े नहीं हो सकते! अर्थात एक झटके में एक ही देश के दो नागरिकों को आमने-सामने ला खड़ा किया है। यह है भाजपाइयों की चालाकी! 2014 से पहले तो जैसे देश की जनता को पता ही नहीं था कि उसका ही कोई भाई देश के लिए सीमा पर कड़ा पहरा दे रहा है!

आलम यह है कि आप सवाल पूछोगे बाद में, मुंह पहले बंद करा दिया जाएगा। मतलब आपको खांसी है तो बजाय दवा देने के, आपका मुंह बंद कर दिया जाएगा और ‘राष्ट्रवादी’ आपको डराएंगे। हम सब ‘ट्रोल/ ट्वीट’ के जमाने में बड़े हो रहे हैं और ये ट्रोल्स और कुछ नहीं राजनीतिक गुंडागर्दी है। कोई कुछ बोलने या अपनी बात रखने की कोशिश करता है तो दस लोग तभी न जान कहां से एक साथ आएंगे, आपका मजाक बनाएंगे, फिर आपको डरा-धमका कर चुप करा दिया जाएगा। इससे आप आगे कभी सवाल पूछने की हिम्मत नहीं करेंगे और असल मुद्दों पर कभी बहस होगी नहीं!

सरकार बताए कि कतार में खड़े जो लोग मर रहे हैं उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह अव्यवस्था कितने समय और रहने वाली है? क्या एसबीआई ने 53 लोगों का 7000 करोड़ कर्ज सही में माफ किया और उसमें विजय माल्या के 1300 करोड़ हैं या नहीं? आखिरकार इस आर्थिक अराजकता के लिए कौन जिम्मेदार है? हम नहीं पूछते कि कर्नाटक में भाजपा नेता की बेटी की 500 करोड़ की शादी पर खर्च हुआ पैसा काला धन था या नहीं। मोदीजी की गाजीपुर और गोवा की रैलियों के खर्चे का भुगतान क्रेडिट कार्ड से हुआ या नकद, और नकद हुआ तो इतना नकद आया कहां से? जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछने की परंपरा का गला घोंट कर हम अपने लोकतंत्र का फायदा कर रहे हैं या इन राजनीतिक दलों का, यह सवाल आज हम सबके सामने है।
’हर्ष चेतीवाल, बहादुरगढ़, हरियाणा

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First Published on November 18, 2016 2:12 am

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