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संपादकीयः अभिव्यक्ति की मर्यादा

पिछले कुछ समय से यह चिंता मुखर हुई है कि सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग हो रहा है और इस पर रोक लगाई जानी चाहिए।
Author October 7, 2017 03:04 am
Express Representational image

पिछले कुछ समय से यह चिंता मुखर हुई है कि सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग हो रहा है और इस पर रोक लगाई जानी चाहिए। इस मसले पर अब सुप्रीम कोर्ट ने भी चिंता जताई है और सोशल मीडिया में बेलगाम टिप्पणियों पर काबू पाने के लिए नियम बनाने पर जोर दिया है। साथ ही, कोर्ट ने इस मामले को संविधान पीठ को सौंप दिया है। दरअसल, वरिष्ठ सपा नेता आजम खान की टिप्पणियों से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में यह सवाल उठा कि आखिर किसी मुद्दे पर तथ्यों की पड़ताल किए बगैर सार्वजनिक रूप से राय जाहिर करते हुए उसके असर की परवाह क्यों नहीं की जाती है। ऐसी लापरवाह गतिविधियों में अदालत की कार्यवाही को भी नहीं बख्शा जाता है। हाल के दिनों में कई जानी-मानी हस्तियों या नेताओं के नाम से या उनके हवाले से फेसबुक और ट्विटर जैसे मंचों पर ऐसी टिप्पणियां आर्इं जो किसी सम्मानित पद पर बैठे व्यक्ति की गरिमा को चोट पहुंचाती थीं। फिर जैसे ही उन पर विवाद खड़ा हुआ, उन टिप्पणियों को हटा लिया गया या फिर उनके लिए माफी मांगने की औपचारिकता पूरी कर ली गई। लेकिन सच यह है कि किसी भी ऐसी टिप्पणी के आते ही आम लोगों के बीच जो भ्रम फैलना होता है, वह फैल चुका होता है। अदालत में वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने यहां तक कहा कि सोशल मीडिया पर इतनी गलत सूचनाओं और भाषा का इस्तेमाल किया जाता है कि उन्होंने अपना ट्विटर खाता बंद कर दिया है।

यह सब इसलिए भी चल रहा है कि इस पर रोक लगाने के लिए फिलहाल कोई सख्त कानूनी प्रावधान नहीं है। इसलिए अदालत का यह कहना उचित है कि कोई ठोस कानूनी पहल हो, ताकि अफवाह या गलत जानकारी फैलाने, भद््दी भाषा में बात करने, गाली-गलौज करने या किसी व्यक्ति को अपमानित करने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाई जा सके। यह किसी से छिपा नहीं है कि महिलाओं के सम्मान को चोट पहुंचाने से लेकर धर्म और जाति से जुड़े मामलों पर बेलगाम टिप्पणियों ने कैसे हालात पैदा किए हैं। हाल के दिनों में फर्जी तस्वीरों और वीडियो के जरिए लोगों की भावनाएं भड़काने के कई मामले सामने आए। किसी दूसरे देश में हुई हत्या या वहां हुए दंगे आदि की तस्वीरों या वीडियो को यहां का बताते हुए पेश करके अपने देश में उन्माद फैलाने की कोशिश की गई। वाहवाही लूटने के लिए किसी और देश में हुए विकास-कार्य की तस्वीर में फोटोशॉप से हेरफेर करके उसे भारत का बता कर पेश कर दिया गया।

लेकिन आज तकनीक की दुनिया बहुत आगे जा चुकी है और मामूली प्रयासों से फर्जी या फोटोशॉप की गई तस्वीर और वीडियो की हकीकत का पता लगाया जा सकता है। कुछ वेबसाइटों के अलावा व्यक्तिगत स्तर पर भी कई लोग अपने फेसबुक या ट्विटर खाते के जरिए फर्जी खबरों और तस्वीरों या निराधार जानकारियों की असलियत उजागर कर रहे हैं। इसके बावजूद आज सोशल मीडिया के मंचों पर ज्यादातर लोगों और खासतौर पर महिलाओं को जिस तरह कई बार बेहद अप्रिय हालात का सामना करना पड़ता है, उसके मद््देनजर एक कानूनी प्रावधान वक्त की जरूरत है। मगर यह याद रखा जाना चाहिए कि करीब ढाई साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने सूचना एवं प्रौद्योगिकी कानून की जिस धारा 66-ए को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया था, उसे सरकारों और पुलिस ने गैरजरूरी तरीके से अपनी मनमानी का हथियार बना लिया था। इसलिए अगर कोई नई कानूनी व्यवस्था हो तो यह ध्यान रखने की जरूरत होगी कि वह वाजिब और स्वतंत्र अभिव्यक्तियों को दबाने का हथियार न बने।

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