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रम्य रचनाः रेल में ओम शांति

एक समय था कि हवाई जहाज की आवाज आ जाए तो उसे आकाश में उड़ता देखने के लिए खाना छोड़ देते थे। वही समय था जब रेल के प्रथम श्रेणी के डिब्बों को उसी हसरत भरी निगाह से देखते थे, जैसे प्रेमिका को देखा करते थे।
Author March 20, 2016 02:58 am
(File Photo)

प्रेम जनमेजय

एक समय था कि हवाई जहाज की आवाज आ जाए तो उसे आकाश में उड़ता देखने के लिए खाना छोड़ देते थे। वही समय था जब रेल के प्रथम श्रेणी के डिब्बों को उसी हसरत भरी निगाह से देखते थे, जैसे प्रेमिका को देखा करते थे। समय बदलता है तो कुत्ता हो, घूरा हो या आदमी, उसके भी दिन बदलते हैं।
धन्य हैं बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाली हमारी संतानें जिन्होंने बुढ़ापे में हमारा समय बदल दिया। धन्य है हमारी भारतीय रेल, जिसने सीनियर सिटीजन के बदले समय को, चार नहीं तो दो चांद लगा ही दिए। रेल विभाग को कम से कम सीनियर सिटीजन के मामले में बाजार की सही समझ है। एक खरीदो और दूसरा मुफ्त पाओ की सुविधा दी है।

सीनियर हो चुके पति-पत्नी लगभग एक के किराए में दो वाली यात्रा करते हैं। और मुझ जैसे सेकेंड एसी का किराया देकर प्रथम श्रेणी का आनंद उठाते हैं। मित्रो, कभी आपको वीआइपी न होते हुए भी वीआइपी होने का सुख उठाना है तो राजधानी से प्रथम श्रेणी में यात्रा कर देखिए। प्रथम श्रेणी में जो मान सम्मान मिलता है उसे देख कर आप हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं कि मैं इस योग्य भी हूं कि नहीं। कुछ घंटे के इस मान-सम्मान में आप संतान की उपेक्षा, मित्र का पीठ में भोंका छुरा तक भूल जाते हैं। वीआइपी सम्मान आपको अटेंडेंट से टूटी-फूटी अंगरेजी बोलने को, अच्छी अटैची ले जाने को और ‘सभ्य’ स्वर में बात करने को विवश करता है। वैसे इस मुगालते में मत रहें कि यह वीआइपी सुविधा आपके लिए है।

यह तो उनके लिए है, जो उठते-जागते, खाते-पीते हुए आदमी नहीं, वीआइपी होते हैं, सदाबहार वीआइपी। यह तो प्रजातंत्र का आशीर्वाद है, कृपा है कि आप इसका लाभ उठा लेते हैं वरना आप भी महात्मा गांधी की तरह डिब्बे से कचरे की तरह फेंक दिए जाते। प्रथम श्रेणी में दो ही हों और आपको कूपा मिल जाए तो यात्रा का आंनद दोगुना हो जाता है। कुछ देर के लिए लगता है जैसे हमारा सर्वाधिकार सुरक्षित है। अगर कूपा न मिले और चार का केबिन मिले, तो आपकी यात्रा का आंनद सहयात्री पर निर्भर करता है। अगर कोई खर्राटाधारी आ जाए, या फिर पति-पत्नी और बात-बात पर रोने वाला उनका नन्हा मुन्ना/ मुन्नी, आ जाए तो वह रोता है और आप गाते हैं- नींद क्यों रात भर नहीं आती। हम दोनों पति-पत्नी जब यात्रा करते हैं तो यही कामना करते रहते हैं कि हमें कूपा देना, ‘प्रभु’।

प्रथम श्रेणी आरक्षण के मामले में भी वीआइपी है। आधे से अधिक सीटें वीआइपी के लिए आरक्षित होती हैं। सेकेंड और थर्ड एसी में तो टिकट आरक्षित करते ही आपको आपका सीट नंबर मिल जाता है, पर इसमें जब तक चार्ट बन नहीं जाता, पता ही नहीं चलता कि आपको कूपा मिलेगा या फिर केबिन। पति/पत्नी का प्यार में चाहे दिल धक-धक न करता हो, पर गाड़ी चलने के तीन घंटे पहले तक करता रहता है कि प्रभु हम दोनों को क्या देंगे? संतों ने कहा है कि अंत समय कुछ नहीं जाता, पर यदि अंत समय वीआइपी आ जाए तो प्रभु कृपा से कूपा उसको चला जाता है।

इस बार भी अंत समय कूपा वीआइपी को चला गया और मुझे और पत्नी को केबिन मिला। यह तो मालूम था कि आएगा आने वाला, पर यह नहीं मालूम था कि कौन आएगा? दिल धक-धक करने लगा। समय डरा रहा था और हम डर रहे थे कि कौन डिस्टर्ब करने वाला आता है।
रेलगाड़ी रेंगने लगी। अभी तक कोई नहीं आया था। हमने संतोष की सांस ली। आप जानते ही हैं कि आज के समय में संतोष की सांस का जीवन ही कितना होता है। आप संतोष की सांस लेते हैं कि चलो प्याज सस्ता हो गया, पर पता चलता है कि दाल महंगी हो गई। आप संतोष की सांस लेते हैं कि पेट्रोल सस्ता हो गया, पता चलता है कि उस पर टैक्स लग गया। हमारी भी संतोष की सांस क्षणभंगुर थी। धड़धड़ाते और बड़बड़ाते हुए पति-पत्नी और उनकी चार साल की वो ने प्रवेश किया। प्यार में मैं से तुम और तुम से तू होता है, पर वे केवल तू ही तू कर रहे थे। मुद्दा था कि किसके कारण ट्रेन छूट जाती। सामान रखते हुए और उसके बाद अपनी तशरीफ रखने के बाद भी वे तू तू की बहस में उलझे रहे। एक अंतहीन तू तू। ऐसी तू तू आपने अक्सर टीवी चैनलों की बहसों में देखी होगी। ऐसी बहस में दूसरे का गिरेबान झांका जाता है और सिद्ध किया जाता है कि हम तो गिरेबान रखते ही नहीं हैं। बेचारी बच्ची, आम आदमी-सी भावशून्य आंखों संग मूक थी। अब रोज-रोज की बातों पर आदमी कितना भाव दे।

अचानक पति-पत्नी को ध्यान आया कि उनके साथ उनकी बेटी भी है। पिता ने उसके हाथ में आई-टच पकड़ाया और बोला- गो अपस्टेयर।’ इससे पहले बच्ची कुछ समझती, पिता ने उसे ऊपर की बर्थ पर जमा दिया। वह शांत भाव खिलौने में मस्त हो गई। इस बीच जूस आया। दोनों ने जूस पिया और ठंडे हुए। बेटी से पूछा तो उसने नो किया और उसके नो का सम्मान किया गया। फिर फोन आया। पति ने फोन पर दो टूक बात की। पत्नी ने पूछा- एवरीथिंग इस फाईन?’ पति ने सिर हिलाया। बिटिया ने पूछा- हाउ इज मिंकू पापा!’ पिता ने कहा- ही इज फाईन डॉल!’ बिटिया ने कहा- आई मिस हिम पापा!’ पिता ने समाधान दिया- एनजॉय यूअर गेम।’ और वह चाबी की गुड़िया-सी एनजॉय करने लगी।
मेरी पत्नी को मेरे ही नहीं, दूसरे के फटे में भी टांग घुसेड़ेने की आदत है। यहां भी उसने घुसेड़ा- बड़ी प्यारी बच्ची है। कितनी शांत और इंडिपेंडेंट। आपने अच्छी ट्रेनिंग दी है। कितने साल की है।
– फोर ऐंड ए हाफ ईयर की। यू नो आंटी मैं ड्रेस डिजायनर हूं और विकास मेरी मदद करते हैं। हम दोनों अपना बिजनेस एस्टेबलिश करना चाहते हैं। पांच साल पहले शुरू किया। पर बीच में यह पैदा हो गई। हमारे पास टाईम नहीं है। कोई आॅपशन नहीं था। छह महीने की थी, इसे अलग कमरे में अकेले सोने की आदत डाली। कपड़े चेंज करने से खाना खाने तक का काम खुद करती है। मेड है, बट यू नो ये कितनी रिलायबल होती हैं।
– यह तुम लोगों के बिजनेस ट्रिप में साथ ही जाती है?
– नहीं आंटी, वो तो हमारी मेड को अचानक जाना पड़ा।
– घर में कोई बड़ा-बूढ़ा होगा। उसके पास नहीं छोड़ते।
– आंटी मेरे मम्मी-पापा स्टेट्स में भाई के पास हैं। ही नीड्स देम। और यू नो कि वहां सर्वेंट रखना कितना महंगा है।
मुझे लगा कि पुरुष जाति को भी इस सामाजिक समस्या में अपना योगदान देना चाहिए। मैंने विकास से पूछा- और तुम्हारे माता-पिताजी, विकास बेटे!
– अंकल पापा बहुत बीमार रहते हैं। मम्मी उन्हीं की देखभाल में रहती हैं। ऐंड हमारा दो बेड रूम का स्माल हाउस है। साथ रहें तो वे लोग हमें देखेंगें या हम उन्हें।
– और इसका भाई किसके पास रहता है।
– यह अकेली है, इसका कोई भाई नहीं है।
– पर ये कह रही थी कि मिंकू को मिस कर रही है।
– मिंकू हमारा पेट है। सिक्स मंथ की थी, तबसे इसके साथ है। उसी के साथ बिजी रहती है। यू नो कि पेट को ट्रेन में साथ लाना कितना मुश्किल है। हमारे वहां पेट्स की क्रेच है, वहीं छोड़ आए हैं। हम भी उसे मिस कर रहे हैं।’
अचानक पत्नी ने ईयर प्लग अपने कानों में ठूंस लिया। पति ने कम्पयूटर पर नजरें गड़ा दी। इतना ही संवाद बहुत था। इतनी ही दखलअंदाजी बहुत थी। ओम शांति। संवादहीनता की शांति। ऐसी शांति पसर गई, जो हमें भयभीत कर रही थी। पहले हम डर रहे थे कि सहयात्रियों के आने से हम डिस्टर्ब न हों, पर अब डर लग रहा था कि कहीं वे डिस्टर्ब न हों। चुप्पी भी कितना डिस्टर्ब करती है!

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